‪#‎कटपयादि_पद्धति‬ - © एन एल चतुर्वेदी (नगीना)

प्राचीन भारतीय गणितीय पद्धतियों में एक 'कटपयादि पद्धति' है जिसमें अंकों/संख्याओं को शब्दों और श्लोकों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था। इस प्रकार व्यक्त संख्याओं को स्मरण रखने में बड़ी सुगमता होती थी। ऐसा करने का एक विशेष कारण यह भी था कि प्राचीन काल में वैज्ञानिक, गणितीय, खगोलीय आदि शास्त्र भी संस्कृत भाषा में पद्य में ही लिखे जाते थे और आवश्यकतानुसार संख्याओं के उल्लेख के लिए इस पद्धति का प्रतिपादन किया गया था।
इस पद्धति के अंतर्गत देवनागरी वर्णमाला के सभी व्यंजन वर्णों को 'क', 'ट', 'प' और 'य' चार वर्गों में रखा जाता है। स्मरण रहे कि ये वर्ग संस्कृत के उच्चारण-स्थान आधारित वर्ण-वर्गों से इस अर्थ में भिन्न हैं कि इनमें 'च' और 'त' वर्ग अलग से नहीं होते हैं अपितु वे स्वयं ('च' और 'त' वर्ग) क्रमशः 'क' और 'ट' वर्ग के ही आगे के वर्ण होते हैं। इस प्रकार दो-दो वर्गों को मिलाके ५ के स्थान पर १० वर्णीय २ वर्गों का निर्माण हो जाता है जो इस पद्धति के लिए आवश्यक है। वर्ग के प्रत्येक वर्ण का १ से लेकर क्रमशः ९ तक व ० (शून्य) का अंकीय मान निर्धारित होता है जैसे:-
क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व श ष स ह
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ ०
इस पद्धति में स्वरों का भी अंकीय मान (मात्रा के रूप में न होकर स्वतन्त्र रूप में) 'ञ' व 'न' के सामान शून्य ही होता है। तथा मात्राओं एवं संयुक्त व्यंजन में अपूर्ण व्यंजन का कोई अंकीय मान नहीं होता है।
अब यदि शब्द 'राम' लिखा जाए तो इसका अंकीय मान उक्त तालिका के आधार पर '२५' होगा। अन्य शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि 'कटपयादि पद्धति' का अनुसरण करते हुए '२५' के अंक को 'राम' और 'खश' आदि शब्दों से व्यक्त किया जा सकता है।
विशेष: 'अंकानाम् वामतो गति' सिद्धांत का प्रयोग इस पद्धति में कहीं दिखता है और कहीं नहीं। इसके प्रयोग हेतु कोई स्पष्ट निर्देश नहीं देखा।
© एन एल चतुर्वेदी (नगीना)

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