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February 15, 2012

इलाज -Blow shell to get rid from diseases

यदि पाना हें रोगों से छुटकारा तो शंख बजाइए और रोग भगाइए ; Blow shell to get rid from diseases



(जानिए क्या हें शंख ,इसके प्रभाव और परिणाम)

भारतीय संस्कृति में शंख को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। माना जाता है कि समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक शंख भी था। अथर्ववेदके अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है-शंखेन हत्वारक्षांसि।भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। शंख में ओम ध्वनि प्रतिध्वनितहोती है, इसलिए ओम से ही वेद बने और वेद से ज्ञान का प्रसार हुआ। पुराणों और शास्त्रों में शंख ध्वनि को कल्याणकारी कहा गया है। इसकी ध्वनि विजय का मार्ग प्रशस्त करती है।

शंख का महत्व धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके प्रभाव से सूर्य की हानिकारक किरणें बाधक होती हैं। इसलिए सुबह और शाम शंखध्वनिकरने का विधान सार्थक है। जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र बसु के अनुसार, इसकी ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक व्याप्त बीमारियों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता है। शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे महाऔषधिमाना जाता है।

पूजा, यज्ञ एवं अन्य विशिष्ट अवसरों पर शंखनाद हमारी परंपरा में था। क्योंकि शंख से निकलने वाली ध्वनितरंगों में हानिकारक वायरस को नष्ट करने की क्षमता होती है।
1928 में बर्लिन विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने शंख ध्वनि पर अनुसंधान कर इस बात को प्रमाणित किया था। दरअसल, शंखनाद करने के पीछे मूलभावना यही थी कि इससे शरीर निरोगी हो जाता है। घर में शंख रखना और उसे बजाना वास्तु दोष को भी खत्म कर देता है। यह भारतीय संस्कृति की अनुपम धरोहर है।

मंदिरों में नियमित रूप से और बहुत से घरों में पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, व्रत, कथाएं, जन्मोत्सव के अवसरों पर शंख बजाना शुभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्यो के अनुसार शंख बजाने से आसुरी शक्तियां घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती।
समुद्र मंथन में मिले रत्नों में 6वां —-
समुद्र मंथन के समय मिले 14 रत्नों में छठवां रत्न शंख था। शंखनाद से निकली ध्वनि में अ-उ-म् (ओम्) अथवा ‘ओम्’ शब्द उद्धोषित होता है जहां तक ‘ओम्’ का नाद पहुंचता है वहां तक नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है।

देवतुल्य है शंख —–
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा व सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। पांचजन्य व विष्णु शंख को दुकान, कार्यालय, फैक्टरी में स्थापित करने से व्यवसाय में लाभ होता है।

शंख की उत्पत्ति —-
हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार शंख की उत्पत्ति सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु अग्रि से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्वों से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी गई है। वैसे शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।
पाप नाशक —
शंख को सनातन धर्म का प्रतीक माना जाता है। यह निधि का प्रतीक है। इसे घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है। माना जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल गंगाजल के समान पवित्र हो जाता है। शंख में जल भरकर ओम् नमोनारायण का उच्चारण करते हुए भगवान को स्नान कराने से पापों का नाश होता है। शंख नाद का प्रतीक है। नाद जगत में आदि से अंत तक व्याप्त है। सृष्टि का आरंभ भी नाद से होता है और विलय भी उसी में होता है।
स्वास्थ्य लाभ—–—-शंख बजाना स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभदायक है। इससे पूरक, कुम्भक और रेचक जैसी प्राणायाम क्रियाएं एक साथ हो जाती हैं।
—–सांस लेने से पूरक, सांस रोकने से कुम्भक और सांस छोड़ने की क्रिया से रेचक सम्पन्न हो जाती हैं।
—-हृदय रोग, रक्तदाब, सांस सम्बन्धी रोग, मन्दाग्नि आदि में मात्र शंख बजाने से पर्याप्त लाभ मिलता है।
—-यदि कोई बोलने में असमर्थ है या उसे हकलेपन का दोष है तो शंख बजाने से ये दोष दूर होते हैं। इससे फेफड़ों के रोग भी दूर होते हैं :- जैसे दमा, कास प्लीहा यकृत और इन्फ्लूएन्जा रोगों में शंख ध्वनि फायदेमंद है।

——अगर आपको खांसी, दमा, पीलिया, ब्लडप्रेशर या दिल से संबंधित मामूली से लेकर गंभीर बीमारी है तो इससे छुटकारा पाने का एक सरल-सा उपाय है – शंख बजाइए और रोगों से छुटकारा पाइए।

——शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।
———–शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

शंख के प्रकार —

ये कई प्रकार के होते हैं और सबकी विशेषता एवं पूजन पद्धति भिन्न-भिन्न है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका और भारत में पाए जाते हैं।
दक्षिणावृत्ति शंख (दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है), मध्यावृत्ति शंख (इसका मुंह बीच में खुलता है), वामावृत्ति शंख (यह बाएं हाथ से पकड़ा जाता है)। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गणोश शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देवदत्त शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, वीणा शंख, सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं।

विजय घोष का प्रतीक —-

शंख को विजय घोष का प्रतीक माना जाता है। कार्य के आरम्भ करने के समय शंख बजाना शुभता का प्रतीक है। इसकी नाद को सुनने वाले को सहज ही ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हो जाता है।

वैज्ञानिक पहलू—
शंख ध्वनि से सूर्य की किरणों बाधित होती हैं। अत: प्रात: व सायंकाल में ही शंख ध्वनि करने का विधान है। शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियां, पीलिया, कास प्लीहा यकृत, पथरी आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
ऋषि श्रृंग के अनुसार बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बांधने व शंख जल पिलाने से वाणी-दोष दूर हाते हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक व श्वास रोगी हमेशा शंख बजाए तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं।
आयुर्वेदाचार्य डा.विनोद वर्मा के अनुसार हकलाने वाले यदि नित्य शंख-जल पीएं तो वे ठीक हो जाएंगे।शंख जल स्वास्थ्य, हड्डियों, दांतों के लिए लाभदायक है। इसमें गंधक, फास्फोरस व कैल्शियम होते हैं।
संगीत सम्राट तानसेन ने भी अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर ही गायन शक्तिप्राप्त की थी। अथर्ववेद के अनुसार, शंख में राक्षसों का नाश करने की भी शक्ति होती है।
क्या रहस्य है शंख बजाने का?

—–मंदिर में आरती के समय शंख बजते सभी ने सुना होगा परंतु शंख क्यों बजाते हैं? इसके पीछे क्या कारण है यह बहुत कम ही लोग जानते हैं। शंख बजाने के पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है और शंख बजाने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है।
—–शंख की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस संबंध में हिन्दू धर्म ग्रंथ कहते हैं सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु अग्रि से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्व से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी जाती है।
—-शंख की पवित्रता और महत्व को देखते हुए हमारे यहां सुबह और शाम शंख बजाने की प्रथा शुरू की गई है। शंख बजाने का स्वास्थ्य लाभ यह है कि यदि कोई बोलने में असमर्थ है या उसे हकलेपन का दोष है तो शंख बजाने से ये दोष दूर होते हैं। शंख बजाने से कई तरह के फेफड़ों के रोग दूर होते हैं जैसे दमा, कास प्लीहा यकृत और इन्फ्लून्जा आदि रोगों में शंख ध्वनि फायदा पहुंचाती है।
——शंख के जल से शालीग्राम को स्नान कराएं और फिर उस जल को यदि गर्भवती स्त्री को पिलाया जाए तो पैदा होने वाला शिशु पूरी तरह स्वस्थ होता है। साथ ही बच्चा कभी मूक या हकला नहीं होता।
——यदि शंखों में भी विशेष शंख जिसे दक्षिणावर्ती शंख कहते हैं इस शंख में दूध भरकर शालीग्राम का अभिषेक करें। फिर इस दूध को निरूसंतान महिला को पिलाएं। इससे उसे शीघ्र ही संतान का सुख मिलता है।
—–गोरक्षासंहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्यसंहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्तीशंख को आयुर्वद्धकऔर समृद्धि दायक कहा गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूपहै। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।
—–शंख बजाने से दमा, अस्थमा, क्षय जैसे जटिल रोगों का प्रभाव काफी हद तक कम हो सकता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि शंख बजाने से सांस की अच्छी एक्सरसाइज हो जाती है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, शंख में जल भरकर रखने और उस जल से पूजन सामग्री धोने और घर में छिडकने से वातावरण शुद्ध रहता है।

—–तानसेनने अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर ही गायन शक्ति प्राप्त की थी।
——अथर्ववेदके चतुर्थ अध्याय में शंखमणिसूक्त में शंख की महत्ता वर्णित है।

भागवत पुराण के अनुसार, संदीपन ऋषि आश्रम में श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ। कृष्ण ने समुद्र तट पर शंखासुरको मार गिराया। उसका खोल (शंख) शेष रह गया।

——-माना जाता है कि उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। पांचजन्य शंख वही था। शंख से शिवलिंग,कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। शंख की ध्वनि से भक्तों को पूजा-अर्चना के समय की सूचना मिलती है। आरती के समापन के बाद इसकी ध्वनि से मन को शांति मिलती है।

——कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है।

——शंख की पूजा इस मंत्र के साथ की जाती है——

“”त्वं पुरा सागरोत्पन्न:विष्णुनाविघृत:करे देवैश्चपूजित: सर्वथैपाञ्चजन्यनमोऽस्तुते।”"





January 18, 2012

डायाबिटीस ( Diabetes )

डायाबिटीस ( Diabetes )




भारत में करीब 5 Crore लोग यह रोग से पीड़ित हे

रोज सुबह उठकर 5 मिनिट भ्रस्त्रिका,30 मिनिट कपालभाती ,30 मिनिट अनुलोब विलोम का प्राणायाम करे और उसके साथ नीचे बताये इलाज में से
...

कोई भी एक करे....

लेकिन प्राणायाम सभी इलाज में करना आवश्यक हे


इलाज :

# 100 Gms. मेथी का दाना + 100 Gms. तेज पत्ता ( जिसे हम गरम मसाले में इस्तेमाल करते हे ) + 150 Gms जामुन के बीज का पावडर +250 Gms बेलपत्र के पत्ते का पावडर ....

ये सब को पत्थर में पीस कर पावडर बना लो

अब ये पावडर को एक बार सुबह का नाश्ता और एक बार शाम के खाने के एक घंटे

पहले 1-1 चमच गरम पानी के साथ लो

याद् रखे सुबह और शाम दोनों समय यह दवा ले और खाने के एक घंटे पहले खाये

और यह दवा के इस्तेमाल के दौरान शक्कर का इस्तेमाल ना करे शक्कर की जगह गुड खा सकते हे


यह दवा खाने के 2-3 महीने में ही सुगर लेवल से कम हो जायेगा और फिर जब सुगर लेवल से कम हो जाये तो दवा को बंद करदे लेकिन प्राणायाम को चालू रखे

------

# एक चमच मेथी के दाने को रात भर गुनगुने पानी में भिगो कर रखे सुबह उठकर ये पानी पी जाओ और सभी मेथीदाने को चबा चबा कर खा जाओ


मेथी के पावडर की फंकी कभी मत लो...हमारे यहाँ अक्सर लोग मेथी के दाने की फंकी लेते हे लेकिन यह उतनी असरकारक नहीं हे जितना गुनगुने पानी में भिगाई हुई मेथी को चाबचाबा कर खाना...तो मेथी को रात भर गुनगुने पानी में भिगो कर रखे सुबह उठकर ये पानी पी जाओ और सभी मेथीदाने को चबा चबा कर खा जाओ


December 06, 2011

Why is there a Poison Warning on Toothpaste?

source of DATA:  http://www.fluoridealert.org/toothpaste.html

Fluoride Action Network




January 2005
Don't Swallow Your Toothpaste



As of April 7th, 1997, the United States FDA (Food & Drug Administration) has required that all fluoride toothpastes sold in the U.S. carry a poison warning on the label. The warning cautions toothpaste users to:


"WARNING: Keep out of reach of children under 6 years of age. If you accidentally swallow more than used for brushing, seek professional help or contact a poison control center immediately."

Why the Need for a Warning?


One of the little-known facts about fluoride toothpaste, is that each tube of toothpaste - even those specifically marketed for children - contains enough fluoride to kill a child.

As detailed below, most "Colgate for Kids" toothpastes - with flavors ranging from bubble gum to watermelon - contain 143 milligrams (mg) of fluoride in each tube. This dose of fluoride is more than double the dose (60 mg) that could kill the average-weighing 2 year old child. It is also greater than the dose capable of killing all average weighing children under the age of 9.

Fortunately, however, toothpaste-induced fatalities have been rarely reported in the US. In a review of Poison Center Control reports between 1989 and 1994, 12,571 reports were found from people who had ingested excess toothpaste. Of these calls, 2 people - probably both children - experienced "major medical outcomes", defined as "signs or symptoms that are life-threatening or result in significant residual disability or disfigurement" (SOURCE: Shulman 1997).



Toothpaste could Kill your Child
"Colgate for Kids"toothpaste which, if swallowed, could Kill***

Age of Child   Average Weight   Colgate for Kids      * Dose of Fluoride Percent of


2 years          ~12 kg              60 mg                ~42% of tube

3 years          ~15 kg             75 mg                 ~53% of tube

4 years          ~16 kg             80 mg                 ~56% of tube

5 years         ~ 18 kg             90 mg                  ~63% of tube

6 years          ~20 kg             100 mg                ~70% of tube

7 years          ~22 kg             110 mg                ~77% of tube

8 years          ~25 kg             125 mg                ~87% of tube

9 years         ~28 kg              140 mg                ~98% of tube

*Average weight data obtained here

** Potentially fatal dose = 5 mg of fluoride per kg of bodyweight. This is "the minimum dose that could cause toxic signs and symptoms, including death, and that should trigger immediate therapeutic intervention and hospitalization... This does not mean that doses lower than 5.0 mg F/kg should be regarded as innocuous." (SOURCE: Journal of Dental Research 1987; 66:1056-1060.)

*** The fluoride concentration in Colgate for Kids toothpaste is 1,100 ppm. At 130 grams of paste in the average tube, this equals 143 milligrams of fluoride.



Other problems with fluoride toothpaste

As common sense might indicate, death is not the only concern with fluoride toothpaste. Other potential problems with fluoride toothpaste include:

Gastric Problems

Ingestion of fluoride has been documented to produce symptoms of gastrointestinal discomfort at doses at least 15 to 20 times lower (0.2-0.3 mg/kg) than the doses which can kill (SOURCE: Gessner 1994; Akiniwa 1997). Thus, a 2 year old child may experience gastrointestinal ailments if they ingest a mere 2 to 3 percent of the bubble-gum flavored paste.

Between 1989 and 1994, over 628 people - mostly children - were treated at health care facilities after ingesting too much fluoride from their toothpaste. Gastrointestinal symptoms appear to be the most common problem reported (SOURCE: Shulman 1997).

Moreover, ingestion of fluoride toothpaste may damage the lining of the gastrointestinal tract - even in the absence of symptoms (e.g. nausea). This was revealed by a carefully conducted study on healthy adult volunteers which found that damage to the gastrointestinal wall occurred - in the absence of symptoms - after a single ingestion of just 3 mg of fluoride (SOURCE: Spak 1990). Undoubtedly, some children will periodically ingest 3 mg of fluoride, or more, from toothpaste in single sittings, especially if they have access to the bubble-gum flavored varieties (which are still being heavily marketed for children).

Dental Fluorosis

One of the most visible and well-recognized side-effects of ingesting fluoride toothpaste is a discoloration of teeth called dental fluorosis. Fluoride produces dental fluorosis by damaging the cells (ameloblasts) which produce the tooth's enamel. The resulting discoloration of teeth can range from white spots in the mild forms of the disorder to brownish and black stains in the the moderate and severe forms. (See pictures here)

Children with dental fluorosis - particularly those with the moderate or severe kinds - can experience significant esteem problems from the perceived unattractiveness of their teeth. As one young girl with dental fluorosis told British television:


"When I first saw that my teeth were discolored, I was teased quite a lot, especially in the middle school by people. They used to say, 'oh you don't clean your teeth or anything' and they used to call me 'shit teeth' which did upset me, even though I knew it was fluorosis."

Being that dental fluorosis is such a visible and tangible effect of over-exposure to fluoride, toothpaste companies are becoming increasingly vulnerable to litigation as public awareness of dental fluorosis increases. As a possible harbinger of what lies ahead for the industry, a family in England won a settlement from Colgate to pay for the costs of treating the dental fluorosis which their toothpaste caused.

Increasing Children's Daily Intake of Fluoride beyond Recommended Levels

Since young children do not have well-developed swallowing reflexes, they tend to swallow a large percentage of the toothpaste placed on their brush. In fact, one of the more consistent findings in the recent dental literature, is that some children - even children living in unfluoridated communities - ingest more fluoride from toothbrushing alone than is recommended as the total daily exposure. As noted by Dr. Steven Levy, of the University of Iowa:



"Virtually all authors have noted that some children could ingest more fluoride from dentrifice alone than is recommended as a total daily fluoride ingestion" (SOURCE: Levy 1999).

It is clear therefore that fluoride toothpaste represents a very important source of ingested fluoride for children. The use of fluoride toothpaste may thereby contribute to the various health risks (e.g. dental fluorosis, bone fractures, bone cancer, neurotoxicity) associated with systemic fluoride exposure.


Allergic Reactions

Among some 'hypersensitive' individuals, the use of fluoride toothpaste may produce canker sores and skin rashes in and around the mouth. The evidence pointing to this possibility is compelling, but has received scant attention from the dental community.

Periodontal Disease?

Another potential side effect of fluoride toothpaste has only recently come to light. Research conducted in the 1990s from the US pharmaceutical company Sepracor indicated that the levels of fluoride in toothpaste may be sufficient to cause or contribute to periodontal bone loss. Sepracor's finding is serious because periodontal bone loss is the #1 cause of tooth loss among adults. According to the scientists at Sepracor who conducted the study:



"We have found that fluoride, in the concentration range in which it is employed for the prevention of dental caries, stimulates the production of prostaglandins and thereby exacerbates the inflammatory response in gingivitis and periodontitis.... Thus, the inclusion of fluoride in toothpastes and mouthwashes for the purpose of inhibiting the development of caries [cavities] may, at the same time, accelerate the process of chronic, destructive periodontitis."

Europe: Taking a More Cautious Approach than U.S.

As with water fluoridation, continental western Europe has taken a more precautionary approach with fluoride toothpaste than has so far been the case in the United States.

Due to concerns about children ingesting too much fluoride from toothpaste, many European countries are now utilizing children's toothpastes with significantly lower levels of fluoride (250 - 500 ppm) than adult brands (1,000 ppm+). In the US, meanwhile, the vast majority of children's toothpastes continue to have the same concentration of fluoride (1,000 ppm+) as adult toothpastes (1,000 ppm+).

Interestingly, "despite" the fact that the vast majority of western Europe does not fluoridate its water, and despite the fact that children's toothpaste with lower fluoride levels are more common, Europe's tooth decay rates are as low - if not lower - than the tooth decay rates in the heavily fluoridated United States.

References:

Akiniwa, K. (1997). Re-examination of acute toxicity of fluoride. Fluoride 30: 89-104.



Gessner BD, et al. (1994). Acute fluoride poisoning from a public water system. New England Journal of Medicine 330:95-9.



Levy SM, Guha-Chowdhury N. (1999). Total fluoride intake and implications for dietary fluoride supplementation. Journal of Public Health Dentistry 59: 211-23.



Spak CJ, et al. (1990). Studies of human gastric mucosa after application of 0.42% fluoride gel. Journal of Dental Research 69:426-9.

Shulman JD, Wells LM. (1997). Acute fluoride toxicity from ingesting home-use dental products in children, birth to 6 years of age. Journal of Public Health Dentistry 57: 150-8.

Whitford GM. (1987). Fluoride in dental products: safety considerations. Journal of Dental Research 66: 1056-60.



Fluoride Action Network
802-338-5577
info@fluoridealert.org


                                              Pictures of Dental Fluorosis



















October 19, 2011

डायबिटीज के नियंत्रण की चाबी- अलसी

पिछले कुछ दशकों में भारत समेत पूरे विश्व में डायबिटीज टाइप-2 के रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है व अब तो यह किशोरों और बच्चों को भी अपना शिकार बना रही है। डायबिटीज एक महामारी का रुप ले चुकी है। आइये हम जानने की कोशिश करते हैं कि पिछले कुछ दशकों में हमारे खान-पान, जीवनचर्या या वातावरण में ऐसा क्या बदलाव आया है। शोधकर्ताओं के अनुसार जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं।




 
पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।


अलसी के तेल का अदभुत संरचना और ॐ खंड की क्वांटम भौतिकीः

अलसी के तेल में अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ए.एल.ए.) नामक ओमेगा-3 वसा अम्ल होता है। डा. बुडविज ने ए.एल.ए. और एल.ए. वसा अम्लों की अदभुत

संरचना का गूढ़ अध्ययन किया था। ए.एल.ए. में 18 कार्बन के परमाणुओं की लड़ी या श्रृंखला होती है जिसके एक सिरे से , जिसे ओमेगा एण्ड कहते हैं, मिथाइल (CH3) ग्रुप जुड़ा रहता है और दूसरे से जिसे डेल्टा एण्ड कहते हैं, कार्बोक्सिल (COOH) ग्रुप जुड़ा रहता है। ए.एल.ए. में तीन द्वि बंध क्रमशः तीसरे, छठे और नवें कार्बन परमाणु के बाद होते हैं। चुंकि ए.एल.ए. में पहला द्वि बंध तीसरे और एल.ए. में पहला द्वि बंध छठे कार्बन के बाद होता है इसीलिए इनको क्रमशः ओमेगा-3 और ओमेगा-6 वसा अम्ल कहते हैं। ए.एल.ए. और एल.ए. हमारे शरीर में नहीं बनते, इसलिए इनको “आवश्यक वसा अम्ल” कहते हैं तथा इनको भोजन के माध्यम से लेना आवश्यक है। आवश्यक वसा अम्लों की कार्बन लड़ी में जहां द्वि-बंध बनता है और दो हाइड्रोजन अलग होते हैं, उस स्थान पर इलेक्ट्रोनों का बादलनुमा समुह, जिसे पाई-इलेक्ट्रोन भी कहते हैं, बन जाता हैं और इस जगह ए.एल.ए. की लड़ मुड़ जाती है।




इलेक्ट्रोन के इस बादल में अपार विद्युत आवेश रहता है जो सूर्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड से आने वाले प्रकाश की किरणों के सबसे छोटे घटक फोटोन (जो असिमित, गतिशील, अनंत, जीवन शक्ति से भरपूर व ऊर्जावान हैं और अपना रंग, प्रकृति और आवृत्ति बदल सकते हैं) को आकर्षित करते हैं। ये फोटोन सूर्य से निकल कर, जो 9.3 अरब मील दूर हैं, असीम ऊर्जा लेकर, जीवन की आस लेकर, प्यार की बहार लेकर, खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, अपनी लय, ताल व आवृत्ति बदल कर इलेक्ट्रोन, जो अपने कक्ष में निश्चत आवृत्ति पर सदैव गतिशील रहते हैं, की ओर आकर्षित होते हैं, साथ मिल कर नृत्य करते हैं और तब पूरा कक्ष समान आवृत्ति में दिव्य गुंजन करता है और असीम सौर ऊर्जा का प्रवाह होता है। यही है जीवन का अलसी फलसफा, प्रेम का उत्सव, यही है प्रकृति का संगीत। यही है फोटोन रूपी सूर्य और इलेक्ट्रोन रूपी चंद्र का परलौकिक गंधर्व विवाह, यही है शिव और पार्वती का तांण्डव नृत्य, यही है विष्णु और लक्ष्मी की रति क्रीड़ा, यही है कृष्ण और राधा का अंनत, असीम प्रेम।



पाई-इलेक्ट्रोन कोशिकाओं में भरपूर ऑक्सीजन को भी आकर्षित करते हैं। ए.एल.ए कोशिकाओं की भित्तियों को लचीला बनाते हैं जिससे इन्सुलिन का बड़ा अणु आसानी से कोशिका में प्रवेश कर जाता है। ये पाई-इलेक्ट्रोन ऊर्जा का संग्रहण करते हैं और एक केपेसिटर की तरह काम करते हैं। यही जीवन शक्ति है जो हमारे पूरे शरीर विशेष तौर पर मस्तिष्क, आँखों, मांसपेशियों और स्नायु तंत्र की कोशिकाओं में भरपूर ऊर्जा भरती है। डायबिटीज के रोगी को ऐसे ऊर्जावान इलेक्ट्रोन युक्त अलसी के 30 एम.एल. तेल और 80-100 एम.एल. दही या पनीर को विद्युत चालित हाथ से पकड़ने वाली मथनी द्वारा अच्छी तरह फेंट कर फलों और मेवों से सजा कर नाश्ते में लेना चाहिये। इसे एक बार लंच में भी ले सकते हैं। जिस तरह ॐ में सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है ठीक उसी प्रकार अलसी के तेल में संम्पूर्ण ब्रह्मांड की जीवन शक्ति समायी हुई है। इसीलिए अलसी और दही, पनीर के इस व्यंजन को हम “ॐ खंड” कहते हैं। अलसी का तेल शीतल विधि द्वारा निकाला हुआ फ्रीज में संरक्षित किया हुआ ही काम में लेना चाहिए। इसे गर्म नहीं करना चाहिये और हवा व प्रकाश से बचाना चाहिये ताकि यह खराब न हो। 42 डिग्री सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है।


अलसी की फाइबर युक्त स्वास्थयप्रद रोटीः

अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है व डायबिटीज से शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती है। डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो) 50 प्रतिशत कार्ब, 16 प्रतिशत प्रोटीन व 20 प्रतिशत फाइबर होते हैं यानी इसका ग्लायसीमिक इन्डेक्स गैहूं के आटे से काफी कम होता है। जबकी गैहूं के आटे में 72 प्रतिशत कार्ब, 12.5 प्रतिशत प्रोटीन व 12 प्रतिशत फाइबर होते हैं। डायबिटीज पीडित के लिए इस मिश्रित आटे की रोटी सर्वोत्तम मानी गई है।
डायबिटीज के रोगी को रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स जैसे आलू, सफेद चावल, मेदा, चीनी और खुले हुए या पैकेट बंद सभी खाद्य पदार्थ, जंक फूड, फास्ट फूड, सोफ्ट ड्रिंक आदि का सेवन कतई नहीं करना चाहिये। रोज 4 से 6 बार परन्तु थोड़ा-थोड़ा भोजन करना चाहिये। सांयकालीन भोजन सोने के 4-5 घण्टे पहले ग्रहण करना चाहिये। प्याज, लहसुन, गोभी, टमाटर, पत्तागोभी, मेथी, भिण्डी, पालक, बैंगन, लौकी, ऑवला, गाजर, नीबू आदि हरी सब्जीयां भरपूर खानी चाहिये। फलों में जामुन, सेब, संतरा, अंगूर, पपीता, आम, केला आदि सभी फल खाने चाहिये। खाद्यान्न व दालें भी छिलके समेत खाएं। छिलकों में फाइबर व महत्वपूर्ण विटामिन होते हैं। अंकुरित दालों का सेवन अवश्य करें। रोज सुबह एक घण्टा व शांम को आधा घण्टा पैदल चलना चाहिये। सुबह कुछ समय प्राणायाम, योग व व्यायाम करना चाहिये। रोजाना चुटकी भर पिसी हुई दालचीनी सब्जी या चाय में मिला कर लेना चाहिये।


सर्व विदित है कि क्रोमियम और अल्फा-लाइपोइक एसिड शर्करा के चयापचय में सहायक हैं अतः डाटबिटीज के रोगी को रोज 200 माइक्रोग्राम क्रोमियम और 100 माइक्रोग्राम अल्फा-लाइपोइक एसिड लेना ही चाहिये। अधिकतर एंटीऑक्सीडेंट केप्स्यूल में ये दोनो तत्व होते हैं। मेथीदाना, करेला, जामुन के बीज, आंवला, नीम के पत्ते, घृतकुमारी (गंवार पाठा) आदि का सेवन करें। एक कप कलौंजी के बीज, एक कप राई, आधा कप अनार के छिलके और आधा कप पितपाप्र को पीस कर चूर्ण बना लें। आधी छोटी चम्मच कलौंजी के तेल के साथ रोज नाश्ते के पहले एक महीने तक लें।

डायबिटीज के दुष्प्रभावों में अलसी का महत्वः-



हृदय रोग एवं उच्च रक्तचापः-
डायबिटीज के रोगी को उच्च रक्तचाप, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हार्ट अटेक आदि की प्रबल संभावना रहती हैं। अलसी हमारे रक्तचाप को संतुलित रखती हैं। अलसी हमारे रक्त में अच्छे कॉलेस्ट्राल (HDL Cholesterol) की मात्रा को बढ़ाती है और ट्राइग्लीसराइड्स व खराब कोलेस्ट्रोल (LDL Cholesterol) की मात्रा को कम करती है। अलसी दिल की धमनियों में खून के थक्के बनने से रोकती है और हृदयाघात से बचाव करती हैं। हृदय की गति को नियंत्रित कर वेन्ट्रीकुलर एरिद्मिया से होने वाली मृत्यु दर को बहुत कम करती है।



नैत्र रोगः-


डायबिटीज के दुष्प्रभावों के कारण आँखों के दृष्टि पटल की रक्त वाहिनियों में कहीं-कहीं हल्का रक्त स्राव और रुई जैसे सफेद धब्बे बन जाते हैं। इसे रेटीनोपेथी कहते हैं जिसके कारण आँखों की ज्योति धीरे-धीरे कम होने लगती है। दृष्टि में धुंधलापन आ जाता है। अंतिम अवस्था में रोगी अंधा तक हो जाता है। अलसी इसके बचाव में बहुत लाभकारी पाई गई है। डायबिटीज के रोगी को मोतियाबिन्द और काला पानी होने की संभावना ज्यादा रहती है। ऑखों में रोजाना एक बूंद अलसी का तेल डालने से हम इन तकलीफों से बच सकते हैं। इससे नजर अच्छी हो जाती हैं, रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं तथा धीरे-धीरे चश्मे का नम्बर भी कम हो सकता है।

वृक्क रोगः-


डायबिटीज का बुरा असर गुर्दों पर भी पड़ता है। गुर्दों में डायबीटिक नेफ्रोपेथी नामक रोग हो जाता है, जिसकी आरंम्भिक अवस्था में प्रोटीन युक्त मूत्र आने लगता है, बाद में गुर्दे कमजोर होने लगते हैं और अंत में गुर्दे नाकाम हो जाते हैं। फिर जीने के लिए डायलेसिस व गुर्दा प्रत्यारोपण के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता हैं। अलसी गुर्दे के उत्तकों को नयी ऊर्जा देती है। शिलाजीत भी गुर्दे का कायाकल्प करती है, डायबिटीज के दुष्प्रभावों से गुर्दे की रक्षा करती है व रक्त में शर्करा की मात्रा कम करती है। डायबिटीज के रोगी को शिलाजीत भी लेना ही चाहिये।



पैरः-

डायबिटीज के कारण पैरों में रक्त का संचार कम हो जाता है व पैरों में एसे घाव हो जाते हैं जो आसानी से ठीक नहीं होते। इससे कई बार गेंग्रीन बन जाती है और इलाज हेतु पैर कटवानाक पड़ जाता हैं। इसी लिए डायबिटीज पीड़ितों को चेहरे से ज्यादा अपने पैरों की देखभाल करने की सलाह दी जाती है। पैरों की नियमित देखभाल, अलसी के तेल की मालिश व अलसी खाने से पैरों में रक्त का प्रवाह बढ़ता हैं, पैर के घाव व फोड़े आदि ठीक होते हैं। पैर व नाखुन नम, मुलायम व सुन्दर हो जाते हैं।


अंतिम दो शब्दः-


डायबिटीज में कोशिका स्तर पर मुख्य विकृति इन्फ्लेमेशन या शोथ हैं। जब हम स्वस्थ आहार-विहार अपना लेते हैं और अलसी सेवन करते हैं तो हमें पर्याप्त ओमेगा-3 ए.एल.ए. मिलता हैं और हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल का अनुपात सामान्य हो जाता है व डायबिटीज का नियंत्रण आसान हो जाता है और इंसुलिन या दवाओं की मात्रा कम होने लगती है।


अंत में डायबिटीज़ के रोगी के लिए मुख्य निर्देशों को क्रमबद्ध कर देता हूँ।

1) आपको परिष्कृत शर्करा जैसे आलू, सफेद चावल, मेदा, चीनी और खुले हुए या पेकेट बंद खाद्य पदार्थ जैसे ब्रेड, केक, पास्ता, मेगी, नूडल्स, बिस्कुट, अकंलचिप्स, कुरकुरे, पेप्सी, लिमका, कोकाकोला, फैंटा, फ्रूटी, पिज्जा, बर्गर, पेटीज, समोसा, कचोरी, भटूरा, नमकीन, सेव आदि का सेवन नहीं करना है। उपरोक्त सभी खाद्य पदार्थ मैदा व ट्रांसफैट युक्त खराब रिफाइंड तेलों से बनते हैं। तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म किया जाता हैं जिससे उसमें अत्यंत हानिकारक कैंसर पैदा करने वाले रसायन जैसे एच.एन.ई. बन जाते हैं।

2) आपको खराब फैट जैसे परिष्कृत या रिफाइंड तेल जिसे बनाते वक्त 400 सेल्सियम तक गर्म किया जाता है व अत्यंत हानिकारक रसायन पदार्थ जैसे हैक्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि-आदि मिलाये जाते हैं, का सेवन कतई नहीं करना है। आपको अच्छे वसा जैसे घाणी का निकला नारियल (हालांकि अमरीकी संस्था FDA ने अभी तक नारियल के तेल को सर्वश्रेष्ठ खाद्य तेल का दर्जा नहीं दिया है) , तिल या सरसों का तेल ही काम में लेना है। नारियल का तेल खाने के लिये सर्वोत्तम होता है, यह आपको दिल की बीमारियों से बचायेगा व आपके वज़न को भी कम करेगा।

3) यदि ठंडी विधि से निकला, फ्रीज में संरक्षित किया हुआ अलसी का तेल उपलब्ध हो जाये तो रोजाना दो चम्मच तेल को चार चम्मच दही या पनीर में हेंड ब्लेंडर से अच्छी तरह मिश्रण बना कर फलों या सलाद के साथ लें। अलसी का तेल हमेशा फ्रीज में रखें। 42 सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है। यदि शुद्ध मिल सकता है तो आप थोड़ा घी या बटर भी काम में ले सकते हैं। हो सके तो आप सब्जियों को पानी में पकाये व बाद में तेल डालें। तली हुई चीजें कम से कम खायें।

4) रोजाना 30-60 ग्राम अलसी का सेवन करें। इसे ताज़ा पीस कर ही काम में लें। अलसी पीस कर रखने से खराब हो जाती है। डायबिटीज़ के रोगी को दोनों समय की रोटी के आटे में अलसी मिलानी चाहिए। आटा मिश्रित अन्नों जैसे गेहूँ, बाजरा, जौ, ज्वार, चना और कूटू को बराबर मात्रा में मिलाकर पिसवायें।

5) आप रोज 4 से 6 बार भोजन ले परंतु बहुत थोड़ा-थोड़ा। रात को सोने के 4-5 घण्टे पहले हल्का डिनर ले लें। आपको भोजन में सभी फल व सब्जियों का समावेश होना चाहिये। प्याज, लहसुन, गोभी, टमाटर, गोभी, पत्तागोभी, मेथी, भिण्डी, मूली, पालक, बैंगन, लौकी, ऑवला, गाजर, चुकंदर, नींबू आदि सभी हरी सब्जियां खूब खाएं। फलों में जामुन, सेब, संतरा, अंगूर, पपीता, चीकू, आम, केला आदि सभी फल खाएं। फलों का रस निकालकर नहीं बल्कि पूरा छिलके समेत फल खूब चबाकर खाए। अधिकतर कैंसर के रोगी यह समझते हैं कि उन्हें मीठे फल नहीं खाने चाहिये। जबकि दुनिया की कोई भी चिकित्सा पद्धति नहीं कहती है कि डायबिटीज के रोगी को मीठे फल और सूखे मेवे नहीं खाने चाहिये। फलों में पर्याप्त रेशे या फाइबर जटिल शर्करायें होती है जिनका ग्लाइसीमिक इन्डेक्स कम होता है अत: ये रक्त शर्करा की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाती है। दालें भी छिलके समेत खाएं। छिलकों में फाइबर व महत्वपूर्ण विटामिन होते हैं। अंकुरित अन्न का सेवन अवश्य करें।


6) रोज सुबह एक घण्टा व शाम को आधा घण्टा घूमना है। सुबह आधे घण्टे से पौन घंटे, प्राणायाम, योग व व्यायाम करना है।


7) रोजाना आधा चम्मच पिसी हुई दालचीनी सब्जी या चाय में डालकर लें। रोज एक क्रोमियम व एल्फालाइपोइक एसिड युक्त (ये दोनों मधुमेह उपचार में बहुत लाभ दायक है) एन्टीऑक्सीडेंट का केप्सूल जैसे Cap. Ebiza-L और Shilajit Dabur के दो केप्सूल सुबह शाम लेना है। मेथीं दाना, करेला, जामुन, आंवला, नीम के पत्ते आदि का सेवन करें। आजकल रोगी को अपनी रक्त शर्करा की नियमित जांच ग्लूकोमीटर द्वारा घर पर ही करने की सलाह दी जाती है।

8) हर तीन महीनों में HbA1C टेस्ट भी करवाये। इससे पिछले तीन महीने में आपकी बल्ड शुगर नियंत्रण की स्थिति मालूम हो जाती है। साल में एक बार आंखो की जांच (फन्डोस्कोपी), गुर्दे व यकृत के रक्त परिक्षण, ई.सी.जी. व हृदय की विस्तृत जांच अवश्य करवाये।

9) डायबिटीज के रोगी को हमेशा अपने पास एक कार्ड रखना चाहिए जिसमें इस बात का वर्णन हो की वह डायबिटीज से पिड़ित है डायबिटीज के रोगी को स्वास्थ्य बीमा भी करवाना चाहिये।

10) डायबिटीज के रोगी की कभी-कभी रक्त शर्करा बहुत कम हो जाती है जिसे हाइपो-ग्लाइसीमिया या शर्कराल्पता कहते हैं, जिसके लक्षण है – भूख लगना, घबराहट, पसीना आना, चक्कर आना, आवाज लड़खड़ाना, कमजोरी, अस्त-व्यस्तता, बेहोशी आदि हैं। ये बड़ी भयावह स्थिति होती है। इसमे तुरन्त चीनी, कोई मीठी वस्तु जैसे बिस्किट या मिठाई खा लेना चाहिए और तुरन्त किसी चिकित्सालय में जाकर जाँच करवाना चाहिये।








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क्रूर, कुटिल, कपटी, कठिन, कष्टप्रद कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है।

प्रस्तावना


डॉ योहाना बुडविज (जन्म 30 सितम्बर, 1908 – मृत्यु 19 मई 2003) विश्व विख्यात जर्मन जीवरसायन विशेषज्ञ व चिकित्सक थीं। उन्होंने भौतिक विज्ञान, जीवरसायन विज्ञान, भेषज विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की थी व प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में पी.एच.डी. की थी। वे जर्मन सरकार के खाद्य और भेषज विभाग में सर्वोच्च पद पर कार्यरत थीं। वे जर्मनी व यूरोप की विख्यात वसा और तेल विशेषज्ञ थी। उन्होंने वसा, तेल तथा कैंसर के उपचार के लिए बहुत शोध की थी। उनका नाम नोबल पुरस्कार के लिए 7 बार चयनित हुआ था। वे आजीवन शाकाहारी रहीं। जीवन के अंतिम दिनों में भी वे सुंदर, स्वस्थ व अपनी आयु से काफी युवा दिखती थी। उन्होंने पहली बार संतृप्त और असंतृप्त वसा पर बहुत शोध किया।

उन्होंने पहली बार आवश्यक वसा अम्ल ओमेगा-3 व ओमेगा–6 को पहचाना और उन्हें पहचानने की पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की थी। इनके हमारे शरीर पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन किया था। उन्होंने यह भी पता लगाया था कि ओमेगा–3 किस प्रकार हमारे शरीर को विभिन्न बीमारियों से बचाते हैं तथा स्वस्थ शरीर को ओमेगा–3 व ओमेगा–6 बराबर मात्रा में मिलना चाहिये। इसीलिये उन्हें “ओमेगा-3 लेडी” के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा मार्जरीन (वनस्पति घी), ट्रांस फैट व रिफाइण्ड तेलों के हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का भी पता लगाया था। वे मार्जरीन, हाइड्रोजिनेटेड वसा और रिफाइंड तेलों को प्रतिबंधित करना चाहती थी जिसके कारण खाद्य तेल और मार्जरीन बनाने वाले संस्थान उनसे काफी नाराज थे और बहुत परेशानी में थे।

डॉ. ओटो वारबर्ग की परिकल्पना और नोबेल पुरस्कार

1923 में डॉ. ओटो वारबर्ग ने कैंसर के मुख्य कारण की खोज कर ली थी। जिसके लिये उन्हें 1931 में नोबल पुरस्कार दिया गया था। उन्हें 1944 में भी नोबल पुरस्कार के लिए चयनित किया गया था । उन्होनें कोशिकाओं की श्वसन क्रिया और चयापचय पर बहुत परीक्षण किये थे। उन्होंने पता लगाया था कि कैंसर का मुख्य कारण कोशिकाओं में होने वाली श्वसन क्रिया का बाधित होना है। सामान्य कोशिकाएँ अपने चयापचय हेतु ऊर्जा ऑक्सीजन से ग्रहण करती है। जबकि कैंसर कोशिकाऐं ऑक्सीजन के अभाव और अम्लीय माध्यम में ही फलती फूलती है। कैंसर कोशिकायें ऑक्सीजन से श्वसन क्रिया नहीं करती। कैंसर कोशिकायें ग्लूकोज को फर्मेंट करके ऊर्जा प्राप्त करती हैं। यदि सामान्य कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति 48 घन्टे के लिए लगभग 35 प्रतिशत कम कर दी जाए तो वह कैंसर कोशिकाओं में परिवर्तित हो जाती हैं। यदि कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे तो कैंसर का अस्तित्व ही संभव नहीं है। उन्होनें कई परीक्षण किये परन्तु वारबर्ग यह पता नहीं कर पाये कि कैंसर कोशिकाओं की बाधित श्वसन क्रिया को कैसे ठीक किया जाये।

डॉ. योहाना ने शोध को जारी रखा

डॉ. योहाना ने वारबर्ग के शोध को जारी रखा। वर्षों तक शोध करके पता लगाया कि इलेक्ट्रोन युक्त, अत्यन्त असंतृप्त ओमेगा–3 वसा से भरपूर अलसी, जिसे अंग्रेजी में linseed या Flaxseed कहते हैं, का तेल कोशिकाओं में नई ऊर्जा भरता है, कोशिकाओं की स्वस्थ भित्तियों का निर्माण करता है और कोशिकाओं में ऑक्सीजन को आकर्षित करता है। परंतु इनके सामने मुख्य समस्या यह थी की अलसी के तेल , जो रक्त में नहीं घुलता है, को कोशिकाओं तक कैसे पहुँचाया जाये ? वर्षों तक कई परीक्षण करने के बाद डॉ. योहाना ने पाया कि अलसी के तेल को सल्फर युक्त प्रोटीन जैसे पनीर साथ मिलाने पर अलसी का तेल पानी में घुलनशील बन जाता है और तेल को सीधा कोशिकाओं तक पहुँचाता है। इससे कोशिकाओं को भरपूर ऑक्सीजन पहुँचती है व कैंसर खत्म होने लगता है।

इस प्रकार 1952 में डॉ. योहाना ने ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल व पनीर के मिश्रण तथा कैंसर रोधी फलों व सब्जियों के साथ कैंसर रोगियों के उपचार का तरीका विकसित किया, जो “बुडविज प्रोटोकोल” के नाम से विख्यात हुआ। इस उपचार से कैंसर रोगियों को बहुत लाभ मिलने लगा था। इस सरल, सुगम, सुलभ उपचार से कैंसर के रोगी ठीक हो रहे थे। इस उपचार से 90 प्रतिशत तक सफलता मिलती थी। नेता और नोबेल पुरस्कार समिति के सभी सदस्य इन्हें नोबल पुरस्कार देना चाहते थे पर उन्हें डर था कि इस उपचार के प्रचलित होने और मान्यता मिलने से 200 बिलियन डालर का कैंसर व्यवसाय (कीमोथेरेपी और विकिरण चिकित्सा उपकरण बनाने वाले बहुराष्ट्रीय संस्थान) रातों रात धराशाही हो जायेगा। इसलिए उन्हें कहा गया कि आपको कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी को भी अपने उपचार में शामिल करना होगा। उन्होंने सशर्त दिये जाने वाले नोबल पुरस्कार को एक नहीं सात बार ठुकराया।

यह सब देखकर कैंसर व्यवसाय से जुड़े मंहगी कैंसररोधी दवाईयां और रेडियोथेरेपी उपकरण बनाने वाले संस्थानों की नींद हराम हो रही थी। उन्हें डर था कि यदि यह उपचार प्रचलित होता है तो उनकी कैंसररोधी दवाईयां और कीमोथेरिपी उपकरण कौन खरीदेगा ? इस कारण सभी बहुराष्ट्रीय संस्थानों ने उनके विरूद्ध कई षड़यन्त्र रचे। ये नेताओं और सरकारी संस्थाओं के उच्चाधिकारियों को रिश्वत देकर डॉ. योहाना को प्रताड़ित करने के लिए बाध्य करते रहे। फलस्वरूप इन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा, सरकारी प्रयोगशालाओं में इनके प्रवेश पर रोक लगा दी गई और इनके शोध पत्रों के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी गई।

विभिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने इन पर तीस से ज्यादा मुकदमें दाखिल किये। डॉ. बुडविज ने अपने बचाव हेतु सारे दस्तावेज स्वंय तैयार किये और अन्तत: सारे मुकदमों मे जीत भी हासिल की। कई न्यायाधीशों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लताड़ लगाई और कहा कि डॉ. बुडविज द्वारा प्रस्तुत किये गये शोध पत्र सही हैं, इनके प्रयोग वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं, इनके द्वारा विकसित किया गया उपचार जनता के हित में है और आम जनता तक पहुंचना चाहिए। इन्हे व्यर्थ परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

वे 1952 से 2002 तक कैंसर के लाखों रोगियों का उपचार करती रहीं। अलबर्ट आईन्स्टीन ने एक बार सच ही कहा था कि आधुनिक युग में भोजन ही दवा का काम करेगा। इस उपचार से सभी प्रकार के कैंसर रोगी कुछ महीनों में ठीक हो जाते थे। वे कैंसर के ऐसे रोगियों को, जिन्हें अस्पताल से यह कर छुट्टी दे दी जाती थी कि अब उनका कोई इलाज संभव नहीं है और उनके पास अब चंद घंटे या चंद दिन ही बचे हैं, अपने उपचार से ठीक कर देती थीं। कैंसर के अलावा इस उपचार से डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, आर्थ्राइटिस, हृदयाघात, अस्थमा, डिप्रेशन आदि बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं।

डॉ. योहाना के पास अमेरिका व अन्य देशों के डाक्टर मिलने आते थे, उनके उपचार की प्रसंशा करते थे पर उनके उपचार से व्यावसायिक लाभ अर्जित करने हेतु आर्थिक सौदे बाज़ी की इच्छा व्यक्त करते थे। वे भी पूरी दुनिया का भ्रमण करती थीं। अपनी खोज के बारे में व्याख्यान देती थी। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी जिनमें “फेट सिंड्रोम”, “डेथ आफ ए ट्यूमर”, “फलेक्स आयल – ए ट्रू एड अगेन्स्ट आर्थाइटिस, हार्ट इन्फार्कशन, कैंसर एण्ड अदर डिजीज़ेज”, “आयल प्रोटीन कुक बुक”, “कैंसर – द प्रोबलम एण्ड सोल्यूशन” आदि मुख्य हैं। उन्होंने अपनी आख़िरी पुस्तक 2002 में लिखी थी।

सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रोन और लिनोलेनिक एसिड का अलौकिक संबंध :-

प्रकाश सबसे तेज चलता है। क्वांटम भौतिकी के अनुसार सूर्य की किरणों के सबसे छोटे घटक या कण को क्वांटम या फोटोन कहते हैं जो अनंत हैं, शाश्वत हैं, सक्रिय हैं, सदैव हैं, ऊर्जावान हैं और गतिशील हैं। इन्हें कोई नहीं रोक सकता है। ये ऊर्जा का सबसे परिष्कृत रूप हैं, ये सबसे निर्मल लहर हैं। इनमें ब्रह्मांड के सारे रंग है। ये अपना रंग, प्रकृति और आवृत्ति बदल सकते हैं।

इलेक्ट्रोन परमाणु का घटक है और न्यूक्लियस के चारों ओर अपने निश्चित कक्ष में निश्चित आवृत्ति में सदैव परिक्रमा करते रहते हैं, सदैव गतिशील रहते हैं। इलेक्ट्रोन का चुम्बकीय क्षेत्र अत्यन्त गतिशील फोटोन को अपनी ओर आकर्षित करता है, जब भी कोई विद्युत आवेश गतिशील होता है तो एक चुम्बकीय क्षेत्र बनता है। गतिशील फोटोन का भी चुम्बकीय क्षेत्र होता है। जब इलेक्ट्रोन और फोटोन के चुम्बकीय क्षेत्र समान आवृत्ति पर गुंजन करते हैं तो ये एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

फोटोन सूर्य से निकलकर, जो 9.3 अरब मील दूर है, असीम ऊर्जा लेकर, जीवन की आस लेकर, प्यार की बहार लेकर, खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, अपनी लय, ताल व आवृत्ति बदल कर इलेक्ट्रोन, जो अपने कक्ष में निश्चित आवृत्ति पर सदैव परिक्रमा करते रहते हैं, की ओर आकर्षित होते हैं, साथ मिल कर नृत्य करते हैं और तब पूरा कक्ष समान आवृत्ति में दिव्य गुंजन करता है और असीम सौर ऊर्जा का प्रवाह होता है। यही है जीवन का असली फलसफा, प्रेम का उत्सव, यही है प्रकृति का संगीत। यही है फोटोन रूपी सूर्य और इलेक्ट्रोन रूपी चंद्र का पारलौकिक गंधर्व विवाह, यही है शिव और पार्वति का तांण्डव नृत्य, यही है विष्णु और लक्ष्मी की रति क्रीड़ा, यही है कृष्ण और राधा का अनंत, असीम प्रेम।

हमें सूर्य से बहुत प्रेम है और यह सिर्फ कोई संयोग नहीं है। हमारे शरीर की लय सूर्य की लय से इतनी मिलती है कि हम सूर्य की ऊर्जा का सबसे ज्यादा अवशोषण करते हैं। इसलिए क्वांटम वैज्ञानिक कहते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड सबसे ज्यादा सौर ऊर्जा या फोटोन मनुष्य के शरीर में ही होते हैं। यह क्षमता और बढ़ जाती है जब हम इलेक्ट्रोन से भरपूर अत्यंत असंतृप्त वसा अम्ल (अलसी जिनका भरपूर स्रोत है) का सेवन करते हैं।

जीवन शक्ति और अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ए.एल.ए):-

अलसी के तेल में अल्फा–लिनोलेनिक एसिड (ए.एल.ए.) नामक ओमेगा–3 वसा अम्ल होता है। डॉ. बुडविज ने ए.एल.ए. की अद्भुत संरचना का गूढ़ अध्ययन किया। ए.एल.ए. में 18 कार्बन के परमाणुओं की लड़ी या श्रंखला होती है जिसके एक सिरे से, जिसे ओमेगा सिरा कहते हैं, मिथाइल (CH3) ग्रुप जुड़ा रहता है और दूसरे से, जिसे डेल्टा सिरा कहते हैं, कार्बोक्सिल (COOH) जुड़ा रहता है। ए.एल.ए. में 3 द्वि-बंध ओमेगा सिरे से क्रमशः तीसरे, छठे और नवें कार्बन परमाणु के बाद होते हैं चूंकि पहला द्वि-बंध तीसरे कार्बन के बाद होता है इसीलिए इसको ओमेगा–3 वसा अम्ल (N–3) कहते हैं। ए.एल.ए. हमारे शरीर में नहीं बन सकते, इसलिए इनको “आवश्यक वसा” अम्ल कहते हैं अत: इनको भोजन द्वारा लेना अति “आवश्यक” है। ए.एल.ए की कार्बन श्रंखला में जहां द्वि-बंध बनता है और दो हाइड्रोजन के परमाणु अलग होते हैं, वहां इलेक्ट्रोनों का बडा झुंण्ड या बादल सा, जिसे “पाई–इलेक्ट्रोन्स” भी कहते हैं, बन जाता है और इस जगह ए.एल.ए. की लड़ मुड़ जाती है। इलेक्ट्रोन के इस बादल में अपार विद्युत आवेश रहता है जो सूर्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड से आने वाले प्रकाश की किरणों के सबसे छोटे घटक फोटोन को आकर्षित करते हैं, अवशोषण करते हैं। ओमेगा-3 ऑक्सीजन को कोशिका में खींचते हैं, प्रोटीन को आकर्षित करते हैं। ये पाई–इलेक्ट्रोन ऊर्जा का संग्रहण करते हैं और एक एन्टीना की तरह काम करते हैं। यही है जीवन शक्ति जो हमारे पूरे शरीर विशेष तौर पर मस्तिष्क, ऑखों, हृदय, मांसपेशियां, नाड़ीतंत्र, कोशिका की भित्तियों आदि को भरपूर ऊर्जा देती है।

कैंसररोधी योहाना बुडविज आहार विहार

डॉ. बुडविज आहार में प्रयुक्त खाद्य पदार्थ ताजा, इलेक्ट्रोन युक्त और (जैविक जहां तक सम्भव हो) होने चाहिए। इस आहार में अधिकांश खाद्य पदार्थ सलाद और रसों के रूप में लिये जाते है, जिन्हें ताजा तैयार किया जाना चाहिए ताकि रोगी को भरपूर इलेक्ट्रोन्स मिले। डॉ. बुडविज ने इलेक्ट्रोन्स पर बहुत जोर दिया है। अलसी के तेल में भरपूर इलेक्ट्रोन्स होते हैं और ड़ॉ बुडविज ने अन्य इलेक्ट्रोन्स युक्त खाद्यान्न भी ज्यादा से ज्यादा लेने की सलाह दी है। इस उपचार के बाद में कहा जाता है कि छोटी-छोटी बातें भी महत्वपूर्ण हैं। और जरा सी असावधानी इस आहार के औषधीय प्रभाव को प्रभावित कर सकती है।

रोज सूर्य के प्रकाश का सेवन अनिवार्य है। इससे विटामिन-डी भी प्राप्त होता है। रोजाना दस-दस मिनट के लिए दो बार कपड़े उतार कर धूप में लेटना आवश्यक है। पांच मिनट सीधा लेटे और करवट बदलकर पांच मिनट उल्टे लेट जायें ताकि शरीर के हर हिस्से को सूर्य के प्रकाश का लाभ मिले। रोगी की रोजाना अलसी के तेल की मालिश भी की जानी चाहिए इससे शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ता है और टॉक्सिन्स बाहर निकलते है। रोगी को हर तरह के प्रदूषण (जैसे मच्छर मारने के स्प्रे आदि) और इलेक्ट्रानिक उपकरणों (जैसे CRT वाले टी.वी. आदि) से निकलने वाले विकिरण से जहां तक सम्भव हो बचना चाहिए। रोगी को सिन्थेटिक कपड़ो की जगह ऊनी, लिनन और सूती कपड़े प्रयोग पहनना चाहिए। गद्दे भी फोम और पोलिएस्टर फाइबर की जगह रुई से बने हों।

यदि रोगी की स्थिति बहुत गंभीर हो या वह ठीक से भोजह नहीं ले पा रहा है तो उसे अलसी के तेल का एनीमा भी दिना चाहिये। ड़ॉ. बुडविज ऐसे रोगियों के लिए “अस्थाई आहार” लेने की सलाह देती थी। यह अस्थाई आहार यकृत और अग्न्याशय कैंसर के रोगियों को भी दिया जाता है क्योंकि वे भी शुरू में सम्पूर्ण बुडविज आहार नहीं पचा पाते हैं। अस्थाई आहार में रोगी को सामान्य भोजन के अलावा कुछ दिनों तक पिसी हुई अलसी और पपीते, अंगूर व अन्य फलों का रस दिया जाता है। कुछ दिनों बाद जब रोगी की पाचन शक्ति ठीक हो जाती है तो उसे धीरे-धीरे सम्पूर्ण बुडविज आहार शुरू कर दिया जाता है।


प्रातः-

प्रातः एक ग्लास सॉवरक्रॉट (खमीर की हुई पत्ता गोभी) का रस या एक गिलास छाछ लें। सॉवरक्रॉट में कैंसररोधी तत्व और भरपूर विटामिन-सी होता है और यह पाचन शक्ति भी बढ़ाता है। यह हमारे देश में उपलब्ध नहीं है परन्तु इसे घर पर पत्ता गोभी को ख़मीर करके बनाया जा सकता है।

नाश्ताः-


नाश्ते से आधा घंटा पहले बिना चीनी की गर्म हर्बल या हरी चाय लें। मीठा करने के लिए एक चम्मच शहद या स्टेविया (जो डॉ. स्वीट के नाम से बाजार में उपलब्ध है) का प्रयोग कर सकते हैं। यह पिसी अलसी के फूलने हेतु गर्म तरल माध्यम का कार्य करती है। अब आपको “ॐ खंड”, जो अलसी के तेल और घर पर बने वसा रहित पनीर या दही से बने पनीर को मिला कर बनाया जायेगा, लेना है।




पनीर बनाने के लिए गाय या बकरी का दूध सर्वोत्तम रहता है। इसे एकदम ताज़ा बनायें, तुरंत खूब चबा चबा कर आनंद लेते हुए सेवन करें। 3 बड़ी चम्मच यानी 45 एम.एल. अलसी का तेल और 6 बड़ी चम्मच यानी 90 एम.एल. पनीर को बिजली से चलने वाले हेन्ड ब्लेंडर से एक मिनट तक अच्छी तरह मिक्स करें। तेल और पनीर का मिश्रण क्रीम की तरह हो जाना चाहिये और तेल दिखाई देना नहीं चाहिये। तेल और पनीर को ब्लेंड करते समय यदि मिश्रण गाढ़ा लगे तो 1 या 2 चम्मच अंगूर का रस या दूध मिला लें। अब 2 बड़ी चम्मच अलसी ताज़ा पीस कर मिलायें। अलसी को पीसने के बाद पन्द्रह मिनट के अन्दर काम में ले लेना चाहिए।



मिश्रण में स्ट्राबेरी, रसबेरी, चेरी, जामुन आदि फल मिलाऐं। बेरों में एलेजिक एसिड होते हैं जो कैंसररोधी हैं। आप चाहें तो आधा कप कटे हुए अन्य फल भी मिला लें। इसे कटे हुए मेवे खुबानी, बादाम, अखरोट, किशमिश, मुनक्के आदि सूखे मेवों से सजाऐ। मूंगफली वर्जित है। मेवों में सल्फर युक्त प्रोटीन, वसा और विटामिन होते हैं। स्वाद के लिए वनिला, दाल चीनी, ताजा काकाओ, कसा नारियल या नींबू का रस मिला सकते हैं। दिन भर में कुल शहद 3 – 5 चम्मच से ज्यादा न लें। याद रहे शहद प्राकृतिक व मिलावट रहित हो। डिब्बा बंद या परिष्कृत कतई न हो। दिन भर में 6 या 8 खुबानी के बीज अवश्य ही खायें। इनमें विटामिन बी-17 होता हैं जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है। फल, मेवे और मसाले बदल कर प्रयोग करें। ओम खण्ड को बनाने के दस मिनट के भीतर ले लेना चाहिए।



यदि और खाने की इच्छा हो तो टमाटर, मूली, ककड़ी आदि के सलाद के साथ कूटू, ज्वार, बाजरा आदि साबुत अनाजों के आटे की बनी एक रोटी ले लें। कूटू को बुडविज ने सबसे अच्छा अन्न माना है। गैहू में ग्लूटेन होता है और पचने में भारी होता है अतः इसका प्रयोग तो कम ही करें।



10 बजेः-



नाश्ते के 1 घंटे बाद घर पर ताजा बना गाजर, मूली, लौकी, चुकंदर, गाजर, गेहूं के जवारों आदि का ताजा रस लें। गाजर और चुकंदर यकृत को ताकत देते हैं और अत्यंत कैंसर रोधी होते हैं।

दोपहर का खानाः-

अब नाश्ते की तरह ही 3 बड़ी चम्मच अलसी के तेल व 6 बड़ी चम्मच पनीर के मिश्रण में ताजा फल, मेवे और मसाले मिलाकर लें। यह अत्यंत आवश्यक हैं। हां पिसी अलसी इस बार न डालें।


सलाद को मीठा करना हो तो अलसी के तेल में अंगूर, संतरे या सेब का रस या शहद मिला कर लें। यदि फिर भी भूख है तो आप उबली या भाप में पकी सब्जियों के साथ एक दो मिश्रित आटे की रोटी ले सकते हैं। सब्जियों व रोटी पर ऑलियोलक्स (इसे नारियल, अलसी के तेल, प्याज, लहसुन से बनाया जाता है) भी डाल सकते हैं। मसाले, सब्जियों व फल बदल–बदल कर लेवें। रोज़ एक चम्मच कलौंजी का तेल भी लें। भोजन तनाव रहित होकर खूब चबा-चबा कर खाएं।





ॐ खंड” की दूसरी खुराकः-





अब नाश्ते की तरह ही 3 बड़ी चम्मच अलसी के तेल व 6 बड़ी चम्मच पनीर के मिश्रण में ताजा फल, मेवे और मसाले मिलाकर लें। यह अत्यंत आवश्यक हैं। हां पिसी अलसी इस बार न डालें।



दोपहर बादः-



अन्नानास, चेरी या अंगूर के रस में एक या दो चम्मच अलसी को ताजा पीस कर मिलाएं और खूब चबा कर, लार में मिला कर धीरे धीरे चुस्कियां ले लेकर पियें। चाहें तो आधा घंटे बाद एक गिलास रस और ले लें।



तीसरे पहरः-



पपीता या ब्लू बेरी (नीला जामुन) रस में एक या दो चम्मच अलसी को ताजा पीस कर डालें खूब चबा–चबा कर, लार में मिला कर धीरे–धीरे चुस्कियां ले लेकर पियें। पपीते में भरपूर एंज़ाइम होते हैं और इससे पाचन शक्ति भी ठीक होती है।



सायंकालीन भोजः-



शाम को बिना तेल डाले सब्जियों का शोरबा या अन्य विधि से सब्जियां बनायें। मसाले भी डालें। पकने के बाद ईस्ट फ्लेक्स और ऑलियोलक्स डालें। ईस्ट फ्लेक्स में विटामिन-बी होते हैं जो शरीर को ताकत देते हैं। टमाटर, गाजर, चुकंदर, प्याज, शतावर, शिमला मिर्च, पालक, पत्ता गोभी, गोभी, हरी गोभी (ब्रोकोली) आदि सब्जियों का सेवन करें। शोरबे को आप उबले कूटू, भूरे चावल, रतालू, आलू, मसूर, राजमा, मटर साबुत दालें या मिश्रित आटे की रोटी के साथ ले सकते हैं।



बुडविज आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण बिन्दु



1. डॉ. योहाना कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, वनस्पति घी, ट्रांस फेट, मक्खन, घी, चीनी, मिश्री, गुड़, रिफाइण्ड तेल, सोयाबीन व सोयाबीन से निर्मित दूध व टॉफू आदि, प्रिज़र्वेटिव, कीटनाशक, रसायन, सिंथेटिक कपड़ों, मच्छर मारने के स्प्रे, बाजार में उपलब्ध खुले व पेकेट बंद खाद्य पदार्थ, अंडा, मांस, मछली, मुर्गा, मैदा आदि से पूर्ण परहेज करने की सलाह देती थी। वे कैंसर रोगी को सनस्क्रीन लोशन, धूप के चश्में आदि का प्रयोग करने के लिए भी मना करती थी।



2. इस उपचार में यह बहुत आवश्यक है कि प्रयोग में आने वाले सभी खाद्य पदार्थ ताजा, जैविक और इलेक्ट्रोन युक्त हो। बचे हुए व्यंजन फेंक दें।



3. अलसी को जब आवश्यकता हो तभी पीसें। पीसकर रखने से ये खराब हो जाती है। तेल को तापमान (42 डिग्री सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है), प्रकाश व ऑक्सीजन से बचायें। आप इसे गहरे रंग के पात्र में भरकर डीप फ्रीज़ में रखें।



4. दिन में कम से कम तीन बार हरी या हर्बल चाय लें।



5. इस उपचार में धूप का बहुत महत्व है। थोड़ी देर धूप में बैठना है या भ्रमण करना है जिससे आपको विटामिन डी प्राप्त होता है। सूर्य से ऊर्जा मिलेगी।



6. प्राणायाम, ध्यान व जितना संभव हो हल्का फुल्का व्यायाम या योगा करना है।



7. घर का वातावरण तनाव मुक्त, खुशनुमा, प्रेममय, आध्यात्मिक व सकारात्मक रहना चाहिये। आप मधुर संगीत सुनें, खूब हंसें, खेलें कूदें। क्रोध न करें।



8. सप्ताह में दो-तीन बार वाष्प-स्नान या सोना-बाथ लेना चाहिए।



9. पानी स्वच्छ व फिल्टर किया हुआ पियें।



10. इस उपचार से धीरे-धीरे लाभ मिलता है और यदि उपचार को ठीक प्रकार से लिया जाये तो सामान्यत: एक वर्ष या कम समय में कैंसर पूर्णरूप से ठीक हो जाता है। रोग ठीक होने के पश्चात भी इस उपचार को 2-3 वर्ष या आजीवन लेते रहना चाहिये।



11. अपने दांतो की पूरी देखभाल रखना है। दांतो को इंफेक्शन से बचाना चाहिये।



10. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस उपचार को जैसा ऊपर विस्तार से बताया गया है वैसे ही लेना है अन्यथा फायदा नहीं होता है या धीरे-धीरे होता है। अधिक जानकारी हेतु अंतरजाल पर हमारे इस पृष्ठ http://flaxindia.blogspot.com पर चटका मारें। इस लेख के सारे समुच्चित चित्र मेरे द्वारा ही बनाये गये हैं।

आप सोच रहे होगें कि डॉ. योहाना की उपचार पद्धति इतनी असरदायक व चमत्कारी है तो यह इतनी प्रचलित क्यों नहीं है। यह वास्तव में इंसानी लालच की पराकाष्ठा है। सोचिये यदि कैंसर के सारे रोगी अलसी के तेल व पनीर से ही ठीक होने लगते तो कैंसर की मंहगी दवाईया व रेडियोथेरेपी उपकरण बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कितना बड़ा आर्थिक नुकसान होता। इसलिए उन्होंने किसी भी हद तक जाकर डॉ. योहाना के उपचार को आम आदमी तक नहीं पहुंचने दिया। मेडीकल पाठ्यक्रम में उनके उपचार को कभी भी शामिल नहीं होने दिया। यह हम पृथ्वी वासियों का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां शरीर के लिए घातक व बीमारियां पैदा करने वाले वनस्पति घी बनाने वालों पॉल सेबेटियर और विक्टर ग्रिगनार्ड को 1912 में नोबेल पुरस्कार दे दिया गया और कैंसर जैसी जान लेवा बीमारी के इलाज की खोज करने वाली डॉ. योहाना नोबेल पुरस्कार से वनचित रह गई। क्या कैंसर के उन करोड़ों रोगियों, जो इस उपचार से ठीक हो सकते थे, की आत्माएँ इन लालची बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कभी क्षमा कर पायेगी ? ? ? लेकिन आज यह जानकारी हमारे पास है और हम इसे कैंसर के हर रोगी तक पहुँचाने का संकल्प लेते हैं। डॉ. योहाना का उपचार श्री कृष्ण भगवान का वो सुदर्शन चक्र है जिससे किसी भी कैंसर का बच पाना मुश्किल है।

October 17, 2011

आयुर्वेद – स्वास्थ्य रक्षा की हिन्दू पद्धति

•“आयुर्वेद” शब्द “आयुः” और “वेद” शब्दों की संधि से बना है। “आयुः” का अर्थ है “अवस्था, उम्र, जीवन” और “वेद” का अर्थ है “ज्ञान”, अतः “आयुर्वेद का अर्थ हुआ “आयु से सम्बंधित ज्ञान”।


•आयुर्वेद को स्वास्थ्य रक्षा हेतु हिन्दू पद्धति माना जाता है।

•भारत, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों के अनगिनत लोग आयुर्वेद पर ही विश्वास रखते हैं। व्यापक रूप से इसे हमारे ग्रह की अनवरत रूप से चलने वाली औषधि प्रणाली, जिसका उद्गम वैदिक काल से भी पहले ईसा पूर्व 5000 में हुआ था, माना जाता है।

•पौराणिक कथाओं के अनुसार आयुर्वेद के समस्त श्लोक स्वयं भगवान ब्रह्मा के मुख से निकले थे अर्थात् वे ब्रह्मवाक्य हैं।

•परम्परा के अनुसार, आयुर्वेद का प्रथम वर्णन अग्निवेश लिखित “अग्निवेश तंत्र” के रूप में हुआ। कालान्तर में महर्षि चरक ने इसे पुनः लिखा और इसका नाम “चरक संहिता” पड़ा।

•आयुर्वेद का एक अन्य मुख्य ग्रंथ सुश्रुत संहिता है जिसे कि भगवान धन्वन्तरि के प्रमुख शिष्य सुश्रुत ने ईसा पूर्व लगभग 1000 में लिखा था। सुश्रुत को “शल्य चिकित्सा” के जनक के रूप में माना जाता है और “सुश्रुत संहिता” में भगवान धन्वन्तरि के द्वारा बताये गये शल्य चिकित्सा की विधियों, जिन्हें कि सुश्रुत ने अपने अनुभवों और भी परिमार्जित किया, का वर्णन है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता दोनों ही ग्रंथ भारत के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों, तक्षशिला और नालंदा, में पाठ्यक्रम के रूप में सम्मिलित थे।

•यद्यपि आयुर्वेद का प्रतिपादन प्राचीन काल में हुआ किन्तु मध्यकाल में अनेकों विद्वानों ने उसका और अधिक विकास किया। चरक और सुश्रुत के बाद 7वीं शताब्दी के विद्वान वाग्भट, जिन्होंने “आयुर्वेद” ग्रंथ की रचना की, को आयुर्वेद का महान विद्वान माना जाता है। आयुर्वेद के एक अन्य जाने माने विद्वान हैं 8वीं शताब्दी के माधव जिन्होंने “निदान” ग्रंथ लिख कर उसके 79 सर्गों में अनेकों रोगों, उनके लक्षणों, कारणों, जटिलताओं आदि को सूचीबद्ध किया।

•पश्चिमी दिग्गजों के द्वारा उनकी चिकित्सा प्रणाली के विकास के लिये उसमें आयुर्वद के सार तत्वों को जोड़ने का भी प्रयास किया जा रहा है।

•आयुर्वेद की शिक्षा के लिये अमेरिका में 26 तथा यूरोप में भी दर्जनों स्कूल कार्यरत हैं।

आयुर्वेद

आँवला (Amla)

स्वाद में कसैला किन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त गुणकारी!
आँवला माता के सदृष हमारा पोषण करने वाला फल है इसलिए इसे “धातृ फल” नाम दिया गया है। आयुर्वेद आँवले का गुणगाण करते जरा भी थकता नहीं है।
आँवला अत्यन्त शीतल तासीर वाला फल है। अपनी शीतलता से यह मनुष्य के दिमाग को शान्त रखते के साथ ही शक्ति भी प्रदान करता है। आँवले का नियमित सेवन करना स्‍मरण शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है।
आयुर्वेद में उदर से सम्बन्धित रोगों के लिए आँवले को रामबाण माना गया है। आँवले के चूर्ण को शहद के साथ मिला कर चाटने सेपेट व गले की जलन, खाना न पचना, खट्टी डकार, गैस व कब्‍ज आदि रोग दूर होते हैं।
त्वचा सम्बन्धी रोगों के लिए आँवले का सेवन अत्यन्त लाभकारी है, त्वचा स्वस्थ बनी रहती है।
आँवला स्नायु तंत्र को मजबूती प्रदान करता है तथा सौन्दर्य में वृद्धि करता है।
आँवले के सेवन से नये खून का निर्माण होता है रक्त सम्बन्धी समस्त विकार दूर होते हैं। आँवला हानिकारक टॉक्सिन को शरीर से बाहर निकालता है और रक्त को साफ करता है। गर्भावस्‍था में आँवला रक्‍त की कमी को दूर करता है।
आँवला यौवन शक्ति प्रदान करता है तथा आँवले का नियमित सेवन वृद्धावस्था को पास ही नहीं फटकने देता।
प्रतिदिन एक बड़ा चम्‍मच आँवले का रस शहद के साथ मिलाकर चाटने से मोतियाबिन्‍द में लाभ होता है।
रात को सोने से पहले आँवला खाने से पेट में हानिकारक तत्व इकट्ठे नहीं हो पाते तथा पेट साफ रहता है।
मूत्र सम्बन्धी परेशानी में भी आँवले का सेवन लाभकारी होता है।
दाँत व मसूड़ों में तकलीफ होने पर एक कच्चा आँवला नियमित रूप से खाने पर अवश्य ही लाभ होता है।
आँवला कफ को निकालता है।
आँवले का मुरब्बा शक्तिदायक होता है। आँवला एक अंण्डे से अधिक बल देता है।
ब्लडप्रेशर वालों के लिये आँवला बहुत फायदेमंद है।
शहद के साथ आँवले के रस का सेवन मधुमेह में लाभकारी है।
आँवले का रस पीने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
आँवले के चूर्ण का उबटन चेहरे पर लगाने से चेहरा साफ होता है और दाग धब्बे दूर होते हैं।

तुलसी –

•तुलसी आयुर्वेदिक चिकित्सा की एक प्रमुख औषधि है।


•विभिन्न औषधीय गुणों के निहित होने के कारण भारत में तुलसी का प्रयोग हजारों वर्षों से किया जा रहा है।

•तनाव दूर करने में तुलसी अत्यन्त सहायक है।

•सर्दी-जुकाम, सरदर्द, उदर तथा हृदय से सम्बंधित व्याधियों के उपचार के लिये तुलसी के रस का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

•तुलसी का प्रयोग अनेकों प्रकार से किया जा सकता है जैसे कि काढ़ा या चाय के रूप में, चूर्ण या पाउडर के रूप में, ताजी पत्ती के रूप में या घी मिला कर।

•भारत में तुलसी का धार्मिक महत्व है तथा देवी के रूप में इसकी पूजा की जाती है।

•हिन्दू धर्म में तुलसी नाम को अतुलनीय माना जाता है।

•तुलसी को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है तथा प्रतिवर्ष भगवान विष्णु के साथ तुलसी विवाह का त्यौहार भी मनाया जाता है।

उपचार



•आँख: आँख की अनेकों बीमारियों के लिये तुलसी का रस बहुत फायदेमंद है।

•दांत व मसूढ़े: तुलसी के पत्तों का चूर्ण संवेदनशील दांतों तथा मसूढ़ों के लिये अत्यधिक लाभदायक है।

•दंश: एंटी एलर्जिक गुण होने के कारण तुलसी के रस का प्रयोग सर्व व जहरीले कीड़ों के दंश के उपचार में किया जाता है।

•तनाव: प्रतिदिन तुलसी के 4-5 पत्ते चबाने से तनाव दूर होता है।

•माइग्रेन: तुलसी के पत्तों को कूट-पीस कर पेस्ट बनायें तथा मस्तक पर लेप करें, माइग्रेन में अवश्य फायदा होगा।


अश्वगंधा

अश्वगंधा, जिसे कि विन्टर चेरी भी कहा जाता है, एक अत्यन्त लोकप्रिय आयुर्वेदिक औषधि है। वनस्पति शास्त्र में इसे “withania somnifera” के नाम से जाना जाता है। अश्वगंधा का प्रयोग तनाव मुक्ति के लिये किया जाता है। अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि अश्वगंधा में “एन्टी इंफ्लेमेटरी”, “एंट ट्यूमर”, “एंटी स्ट्रेस” तथा “एंटीआक्सीडेंट” गुण पाये जाते हैं।


•आयुर्वेद में अश्वगंधा को एक ऐसा रसायन माना जाता है जो कि स्वास्थ्य तथा आयु में वृद्धिकारक है।

•अश्वगंधा मनोवैज्ञानिक क्रियाओं को सामान्य बनाये रखता है।

•अश्वगंधा के जड़ तथा फलियों को आयुर्वेदिक औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

•भारत में अश्वगंधा का प्रयोग प्रायः मानसिक कमियों को दूर करने के लिये किया जाता है।

घृतकुमारी (घीक्वार – Aloe Vera)
घृतकुमारी, जिसे घीक्वार भी कहा जाता है, एक अनगिनत गुणों वाली आयुर्वेदिक औषधि है। घृतकुमारी का वनस्पति शास्त्रीय नाम “एलो वेरा” (Aloe Vera) है। अपने आर्द्रताकारी (moisturizing) तथा उम्रवृद्धिकारक गुणों के कारण बहुधा इसका प्रयोग स्किन लोशन के रूप में किया जाता है। रक्तसंचरण तंत्र, लीव्हर, प्लीहा आदि के लिये घृतकुमारी अत्यन्त लाभदायक है। पाचनशक्ति बढ़ाने तथा उदर सम्बंधी अनेकों रोगों के उपचार में भी यह बहुत प्रभावशील है।

उपचार
जलने, कटने तथा घाव में
•घृतकुमारी के पत्ते का गूदा जलने, कटने तथा घाव वाले स्थान में लगायें, तत्काल राहत अनुभव करेंगे।

फोड़े तथा छालों में
•एक चम्मच हल्दी में घृतकुमारी के पत्तों का गूदा मिला कर प्रभावित त्वचा में लगायें और पट्टी बांध दें।

त्वचा रोगों में
•घृतकुमारी के पत्तों के गूदा को प्रभवित त्वचा में लेप करने से त्वचा रोगों में अपेक्षित लाभ मिलता है।

•घृतकुमारी के पत्तों का गूदा प्रतिदिन 1-2 चम्मच खाने से बहुत फायदा मिलता है।

कब्ज में
•घृतकुमारी के पत्तों का गूदा प्रतिदिन 1-2 चम्मच खाने से बहुत फायदा मिलता है।

सावधानी: गर्भवती औरतों और पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये घृतकुमारी के आन्तरिक सेवन करने की सख्त मनाही है।

July 07, 2011

खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ : ( Buffet System's disadvantage )

जब हम किसी सुविधा के आदी (गुलाम) हो जाते है या जब कोई चीज प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दी जाती है या जब कोई चीज घर घर में पहुँच जाती है, तब वह चाहे कितनी भी अवैज्ञानिक क्यों न हो कितने ही रोग पैदा कराने वाली क्यूँ न हो , हम अपने मानसिक विकारों (लत,दिखावा, भेड़चाल आदि) के कारण उसकी असलियत को जानना ही नहीं चाहते है और यदि कोई बता दे तो वही व्यक्ति को हम दक़ियानूसी मानते है और इन मानसिक विकारों के कारण हमारे दिमाग मे सेकड़ों तर्क उठने लगते है, हमारी हर परम्पराओं मे वैज्ञानिकता थी हम भारतियों ने जड़ विज्ञान की अपेक्षा चेतन्य विज्ञान पर अधिक बल दिया और चेतन्य के आगे जड़ कही नहीं टिकता आज के युवा कब समझेंगे ?


खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ : ( Buffet System's disadvantage )

- खड़े होकर भोजन करने से निचले अंगों में वात रोग (कब्ज, गैस, घुटनों का दर्द, कमर दर्द आदि) बढ़ते है, और कब्ज बीमारियों का बादशाह है ।

- खड़े होकर भोजन करने से यौन रोगो की संभावना प्रबल होती है, जिसमे नपुंसकता, किडनी की बीमारियाँ, पथरी रोग

- पैरो में जूते चप्पल होने से पैर गरम रहते है जबकि आयुर्वेद के अनुसार भोजन करते समय पैर ठंडे रहने चाहिए, इसलिए हमारे देश में भोजन करने से पहले हाथ के साथ पैर धोने की परंपरा है !

- बार बार कतार मे लगने से बचने के लिए थाली को अधिक भर लिया जाता है जिससे जूठन अधिक छोडी जाती है, और अन्न देवता का अपमान है, खड़े होकर भोजन करने की आदत असुरो की है भारतीयों की नहीं ।

- जिस पात्र मे परोसा जाता है, वह सदैव पवित्र होना चाहिए, लेकिन इस परंपरा में झूठे हाथो के लगने से ये पात्र अपवित्र हो जाते है

(जूठे के लिए अँग्रेजी शब्दकोश मे कोई शब्द ही नहीं है,

क्योंकि वहाँ जूठे की अवधारणा ही नहीं है )

- पंगत मे भोजन कराने से उस व्यक्ति की शान होती है, वह व्यक्ति गुणी होता है

- विवाह समारोह आदि मे मेहमानो को खड़े होकर भोजन करने से मेहमान का अपमान होता है

कुछ महाझूठ ! व्यापार और लुट के लिए - स्वास्थ्य से खिलवाड़

वह कहते है ना की सोये हुए को उठाना आसान है लेकिन जिसने सोने का ढोंग किया हो उसे उठाना मुश्किल है, हमारे आसपास कितने षडयंत्रो से भरी दुनिया है उसमे से कुछ षड्यंत्र आपके सामने प्रस्तुत है


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महाझूठ - रिफाइंग तेल स्वास्थ्य-प्रद है

सत्य - पाम, सोयाबीन, सूर्यमुखी, कुसुम, कपास, चावल की भूसी आदि के तेल बेस्वाद व दुर्गंध से भरे होते है उन्हें इससे मुक्त करने के लिए रिफ़ाइन करने की प्रक्रिया का आविष्कार हुआ, "क्या आप जानते है रिफ़ाइन करने के लिए प्रयुक्त रसायन (कास्टिक सोडा, हेकजेन, फुलर आर्क, प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि ) के तेल मे थोड़ी मात्र मे रह जाते है, लगभग 2 - 3%, जिससे रक्तचाप (BP) बढ़ना, आदि बीमारियाँ होती है, तिल, सरसो, मूँगफली, नारियल आदि तेलो मे विद्यमान विटामिन व एंजाइमो के कारण जो विशेष स्वाद व सुगंध होता है वह रिफ़ाइन करने से नष्ट हो जाता है रिफ़ाइन तेलो मे स्वाद सुगंध न होने से मिलावट की आशंका अधिक है

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महाझूठ - सोयाबीन का तेल बहुत गुणकारी है

सत्य - सोयाबीन का तेल पेन्ट और वार्निश मे काम आने वाला तेल है अमेरिकी स्वार्थ के कारण इसका ज़ोर शोर से प्रचार हो रहा है

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महाझूठ - जर्सी गाय

सत्य - जब हम भेंड को भेंस-गाय, गाय को याक-गाय नहीं कहते तो जर्सी को जर्सी-गाय क्यों कहते है ? जर्सी, होलेस्टीन, फ्रीजियन आदि गाय नहीं सदृश्य जानवर है ये जानवर पूतना की तरह विश और नपुंसकता के वाहक है इसी कारण पश्चिम मे ब्लेक-टी, ब्लेक-कॉफी, (दूध रहित कॉफी चाय) का प्रचालन है और दूध को सफ़ेद जहर मे गिना जाने लगा है जबकि गाय तो माता है एक 'चलता फिरता औषधालय' और दूध उसका अमृत है
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महाझूठ - वनस्पति गरीबों का घी ।

सत्य - तेल को घी कहकर बेचने से बढ़ा झूठ और क्या हो सकता है ? तेल को हाइड्रोजन और निकल के द्वारा विकृत कर क्या असली घी बनाया जा सकता है ? यह तो रावण के साधू वेष धारण करने जैसा है, गौ हत्या के कारण भारत मे घी की कमी न हो इसलिए नकली घी बनाकर खिलाने की चाले नेहरू के कार्यकाल से चली आ रही है , इस घिनोने षड्यंत्र के तहत भारत मे ऐसे घी बनाने का षड्यंत्र का जमकर प्रयोग हुआ, जिसका पर्दाफाश करने के स्थान पर नेहरू ने इसको संरक्षण दिया, विदेशियों के साथ गौ का मांस चखने वाले को क्या पता गौ का महत्व और ध्यान

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महाझूठ - भारतीय गाये कम दूध देती है, जबकि जर्सी अधिक दूध देती है

सत्य - भारत मे गायों की 30 से भी अधिक नस्ले है, जिनमे अधिकांश अच्छे बैल देने वाली 28 नस्ले है कुछ नस्ले अच्छे बैल और अधिक दूध देने वाली नस्ले है, 6 नस्ले तो अधिक दूध देती है लेकिन जब तुलना की जाती है तब बैल देने वाली नस्लों और जर्सी आदि की तुलना की जाती है इन विदेशी जानवरो के नर खेती के काम के योग्य ही नहीं है ये सिर्फ कटने के लिए ही विकसित हुए है


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महाझूठ - धवल क्रांति के कारण भारत मेन दूध की नदियां बहाने लगी

सत्य - धवल क्रांति की आड़ मे कम दूध देने वाली गाय के नाम पर गौ माता पर भयंकर अत्याचार हुआ, रोगौत्पादक जर्सी आदि जानवरों और भेंसों को बढ़ावा दिया (हमने हमेशा व्यापार मे क्रांति का अर्थ विदेशी क्रांति से ही लिया)

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महाझूठ - हरित क्रांति ने देश को खाद्यान की समस्या हल कर दी

सत्य - हरित क्रांति की आड़ में प्रचलित संकर बीज, खाद्य और कीटनाशकों ने पूरे आहार को विषाक्त कर दिया फलस्वरूप आज एक एक व्यक्ति बीमार और अस्वस्थ है आवश्यकता अंग्रेज़ो द्वारा नष्ट सुजलाम सुफलाम कृषि व्यवस्था को बढ़ावा देने की थी , और आज भूख से कितने मरते है यह बात किसी से छुपी है क्या ? कोंग्रेसी पहले भी झूठ बोलते है और आज भी झूठ का सिलसिला अनवरत जारी है भारत निर्माण खूब अच्छे से हो रहा है

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महाझूठ - टीवी के विज्ञापन

सत्य - टीवी के विज्ञापन मे विज्ञापित वस्तुओं की लागत और बिक्री मूल्य में 12-14 गुने से भी अधिक का अंतर होता है जैसे 80-85 पैसे में बना कोल्ड ड्रिंक 10-12 रु॰ में 1.50 - 2.00 रु॰ में बने टूथपेस्ट 40-45 रु॰ में, 1.00-1.50 रु॰ में बने साबुन 15-20 रुपये में बेचे जाते है
किसी भी सौन्दर्य की क्रीम मे हमेशा ट्राइ करने के लिए क्यूँ कहते है ऐसा क्यूँ नहीं कहते है की यह प्रमाणित है ? फिर भी लोग इसे लगते है !

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महाझूठ - शुद्ध नमक एकदम सफ़ेद होता है

सत्य - सोडियम क्लोराइड का रंग हल्का सफ़ेद होता है, इसलिए शुद्ध नमक की पहचान उसका एकदम सफ़ेद न होना ही है उसे सफ़ेद करने के लिए उसमे मेग्नेशियम क्लोराइड जेसी अशुद्धियाँ मिलाई जाती है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है मेग्नेशियम क्लोराइड अक्सर टीवी के विज्ञापन मे एरियल, टाइड जैसे डिटर्जेंट मे लिखा या दिखाया जाता है , नमक को सफ़ेद रंग से इसलिए करते है क्योंकि हल्का सफ़ेद रंग आज के जमाने मे अशुद्धता और मैल की निशानी है बाजार मे कम बिकता है

जिन्हे अपने भारत के प्राचीन ज्ञान और विज्ञान पर अधिकाधिक भरोसा है वे भारत से प्रेम करते है जिन्हे अमेरिकी यूरोपियन चोरो की तकनीक पर भरोसा है उन्हें कितना भि जगाओ, उन्हें अङ्ग्रेज़ी शिक्षा की ऐसी घुट्टी पिलाई जाती है की भारत के ज्ञान विज्ञान से नफरत है उन्हें वे हर चीज को मेकोले की कसोटी पर देखेंगे उसके आगे सोचेंगे भी ?

पिछली पोस्ट में हमने ऋषियों की परंपरा का उल्लेख करते हुए अर्थ और त्रिदोष का वर्णन किया था लेकिन इस मेकोले की शिक्षा को क्या पता त्रिदोष क्या है ? इस पोस्ट पर 7-9 कमेन्ट उन काले अंग्रेज़ो के थे जो आंठवि कक्षा के फोर्मूले को 11-12 के फोर्मूले से मिलान कर रहे थे और स्वामी रामदेवजी को पाखंडी और धूर्त कह रहे थे, उन्हें वह सब मूल्य और ज्ञान अंधविश्वास लगता है जो प्राचीन गौरव से जुड़ा है ! यह कहते हुए अत्यंत वेदना होती है की भारत मे इसाइवाद ही इंडिया को अधिक बढ़ावा दे रहा है यह पंथ एक धीमा जहर है अधिकतर लोग स्वामी रामदेवजी का समर्थन नहीं करते है उनमे 80% लोग ईसाई होते है, कल ऐसे ही एक मतिभ्रमित पत्रकार (टाइम्स ऑफ इंडिया ) ने बाबा को गौ मांस खाने की सलाह दे डाली ।

अँग्रेजी शिक्षा इसाइयों को ही अधिक रास आती है उनके पुरखो की निशानी जो है, इसलिए वे तिलमिला जाते है भारत के ज्ञान के आगे और छेड़ने लग जाते है मुंह से गंदगी ।
जिन तीन लोगो को बेन किया गया है उन काले अंग्रेज़ो का विवरण नीचे है
ऐसे लोगो की पहचान आप भी करिए, ऐसे इंडिया के अंग्रेज़ बहुत है जो बाबा रामदेव को पाखंडी कहते है क्योंकि वे भारत के लिए लड़ रहे है

BRAND Archetypes through lens -Indian-Brands

There has been so much already written about brand archetypes and this is certainly not one more of those articles. In fact, this is rather ...