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Showing posts from July, 2012

संस्कृति-जनेऊ पहनने से लाभ ......

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जनेऊ पहनने से लाभ ...... पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणु...

इलाज -बरसात के मौसम मैं पकोड़ा खाने के लाभ

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बरसात के मौसम मैं पकोड़ा खाने के लाभ  बरसात होते ही हमारी भारतीय संस्कृति में पकोड़े खाने की प्रथा है, यह कोई मज़ाक नहीं परन्तु 100 प्रतिशत वैज्ञानिक और आपके स्वास्थ्य के लिए अति अनुकूल बात है l आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतू में जब हवा में नमी की मात्र अधिक होती है उस समय शरीर में वात(वायु) का प्रकोप रहता है जिसे नियंत्रण में लाने के लिए शुद्ध तेल (सरसों का तेल)   में बनी चीज़ों का सेवन करना चाहिए l क्योंकि तेल(शुद्ध तेल रिफाइंड तेल नहीं ) वातनाशक होता  है इसलिए हमारे यहाँ वर्षा ऋतू में पकोड़े खाने की प्रथा विकसित हुई है l इसलिए बरसात आते ही पकोड़े अवश्य खाएं और सबको खिलाएं........ नोट : आयुर्वेद के अनुसार सावन (वर्षा ऋतू) में दही, छाछ, दूध, हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन वर्जित बताया गया है क्योंकि ये वात (वायु) वर्धक होते हैं, इसलिए इन्हें सावन में खाया नहीं जाता अपितु महादेव पर अर्पित किया जाता है क्योंकि महादेव हर प्रकार के विष को ग्रहण कर लेते हैं l इसलिए सावन में इन खाद्य पदार्थों का सेवन ना करें l केवल शुद्ध तेल को ही प्रयोग मे...

संस्कृति -The story Behind JAN GAN MAN-Our National Anthem

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दोस्तों आपको अगर राष्ट्रगान के असली सच के बारे में पता नहीं है तो कृपया रविंद्रनाथ टैगोर जी की चिठ्ठी के साथ पूरी सच्चाई जरुर पढ़ें और अपना व्यक्तव्य भी जरुर दें....... सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए …के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को  दिल्ली  ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत प...

संस्कृति - संगीत और व्यायाम

व र्तमान समय में भारतीय चिकित्सक और विदेशी चिकित्सकों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के महत्व को स्वीकार किया है। संगीत के द्वारा चिकित्सा, यह कुशल चिकित्सक और प्रवीण संगीतज्ञ के द्वारा की जा सकती है। लेकिन यदि शास्त्रीय संगीत को एक व्यायाम के रूप में उपयोग में लिया जाए तो वह प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभप्रद होगा। संगीत की तीनों विधाएँ गायन, वादन और नृत्य व्यायाम का कार्य करती है। गायन के लिए शरीर को पर्याप्त प्रयास करने पड़ते है, जिसके कारण रक्तसंचार में वृद्धि और पाचन क्रिया में सुधार होता है। वक्ष और उदर की मांसपेशियाँ भी प्रभावित होती है। आलाप-तान आदि क्रियाओं से फेफड़े अधिक सक्रिय होकर श्वास सम्बंधित व्यायाम हो जाता है। उसी प्रकार ओम् शब्द पर साधना करते समय ‘ओ’ शब्द से संपूर्ण शरीर में तथा ‘म’ शब्द के उच्चारण से मस्तिष्क में कम्पन्न उत्पन्न होता है। जो हमारे शारीरिक और मानसिक स्वस्थ के लिए लाभप्रद है। इस प्रकार गायन से फेफड़ो के साथ उदर, वक्ष और मांसपेशियों में भी सक्रियता आती है। रक्तसंचार के बढ़ने से स्फूर्ति रहती है। चित्त प्रसन्न रहता है। यह पाचन तंत्र को विशेष रूप से प्रभाव...

संस्कृति - हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व

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हि न्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समयानुसार गायन प्रस्तुत करने की पद्धति है, तथा उत्तर भारतीय संगीत-पद्धति में रागों के गायन-वादन के विषय में समय का सिध्दांत प्राचीन काल से ही चला आ रहा है, जिसे हमारे प्राचीन पंडितों ने दो भागों में विभाजित किया है। प्रथम भाग दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे तक और दूसरा रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक माना गया है। इसमें प्रथम भाग को पूर्व भाग और दुसरे को उत्तर भाग कहा जाता है। इन भागों में जिन रागों का प्रयोग होता है, उन्हें सांगीतिक भाषा में “पूर्वांगवादी राग” और “उत्तरांगवादी राग” भी कहते है। जिन रागों का वादी स्वर जब सप्तक के पूर्वांग अर्थात् ‘सा, रे, ग, म’, इन स्वरों में से होता है, तो वे ‘पूर्वांगवादी राग’ कहे जाते है, तथा जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग अर्थात् ‘प, ध, नि, सां’, इन स्वरों में से होता है, वे ‘उत्तरांगवादी राग’ कहे जाते है। स्वर और समय के अनुसार उत्तर भारतीय रागों के तीन वर्ग मानकर कोमल-तीव्र (विकृत) स्वरों के अनुसार भी उनका विभाजन किया गया है— १. कोमल ‘रे’ और कोमल ‘ध’ वाले राग, २. शुद्ध ‘रे’ और शुद्ध ‘ध’ व...

संस्कृति - Medical Benefits of Ragas

ब्र ह्माण्ड ताल और लय से रचा गया है। इसके संचालन में एक सुक्ष्म ध्वनि होती है। यह ध्वनि एक शक्तिशाली उर्जा है। पंचमहाभूत इस निसर्ग में व्याप्त है, उसीसे मानवीय शरीर बना हुआ है। इससे मानवीय आत्मतत्व ईश्वरीय परतत्व के साथ एकरूप होता है। ध्वनि अर्थात नाद को ब्रह्म कहते है, यह नाद ब्रह्म भगवती सरस्वती के आशीर्वाद से संपन्न होने वाली कला है। जब यह ध्वनि भिन्न-भिन्न स्वरों से स्वरबद्ध होती है तब वह अलग-अलग ताल और राग में निबद्ध हो जाती है। संगीत के ताल और राग मानवीय मनोवस्था का परिवर्तन करने में सक्षम होती है। उसके साथ शारीरिक परिवर्तन भी होते है। इसलिए संगीत से प्रवाहित होनेवाली ध्वनि ही सांगीतिक उपचार के रूप में पहचानी जाती है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायक के शरीर और मन को प्रभावित करता है। उसी प्रकार श्रोताओं पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। संगीत की शिक्षा ग्रहण करने से हमारे मन पर अच्छा प्रभाव होता है। इसी के द्वारा निसर्ग उपचार भी किया जा सकता है। अच्छा संगीत हमको शक्ति प्रदान करता है, शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न करता है तथा आनंद और शांति की अनुभूति होती है...

संस्कृति - सूर्य-मंदिर और मिहिर नृत्य

प्रा चीन नृत्य-शैलियों के दो प्रकार प्रचलित थे, एक ताण्डव नृत्य और दूसरा लास्य नृत्य। समय के साथ यह नाम शिव तांडव में सात भागो में विभाजित हो गए। । वेद कालीन नृत्यों का प्रचलन महाभारत काल तक रहा था। उस युग में कृष्ण का निर्यात ताण्डव, अर्जुन का धीर ताण्डव इसके अतिरिक्त मृत्युंजय-ताण्डव, लक्षण ताण्डव आदि है। नृत्य का उपयोग स्वस्थ लाभ के लिए सर्वोत्तम साधन माना जाता है । इसके अंग-सञ्चालन, पद-सञ्चालन और हास्य मुद्राओं आदि के प्रयोग से शरीर के विभिन्न नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ ठीक हो जाती है। इसके लिए भगवान कृष्ण के पौत्र साम्ब का उदाहरण दिया जाता है। कुष्ठ रोग से पीड़ित साम्ब की चिकित्सा-हेतु सूर्योपसना नृत्य अर्थात् धुम्र ताण्डव की शिक्षा देकर वैदिक रीति से नृत्य कराया गया। विभिन्न औषधियों के एवं यज्ञ-हवनो के साथ ही नृत्य कला को भी चिकित्सा का मुख्य साधन माना गया था। जिससे साम्ब को लाभ हुआ। फिर उन ब्राह्मणों को वहीं बसाकर सूर्योपसना हेतू उनके लिए सूर्य-मंदिर स्थापित कर दिए गये। सूर्य प्रतिमा के इन पुजारियों ने भगवान सूर्य को प्रसन्न करने की ...

संस्कृति - संगीत और ज्योतिष

प्रा चीन भारत में तीन शास्त्रों को महत्वपूर्ण माना जाता था। वह तीन शास्त्र है भारतीय ज्योतिष अर्थात् गणित, भारतीय वैदिक शास्त्र (आयुर्वेद) और भारतीय संगीत अर्थात् “नाद योग”। मानवीय काल के इतिहास को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि जबसे मनुष्य में जागृति आई तब से यह तीनों शास्त्र मनुष्य के विकास में अग्रेसर रहे है। ऋग्वेद में हजारों वर्ष पूर्व के नक्षत्रों की दर्शनी का वर्णन मिलता है। भारतीय चिंतको ने गृह तारे व नक्षत्रो की स्थिति, उनके भ्रमण और उसके कारण सृष्टि पर होने वाले परिणाम परिवर्तन का सूक्ष्म अध्ययन किया तथा उनके पारस्चरिक सम्बन्ध को अत्यंत शास्त्र शुद्ध एवं सूत्रबद्ध करके अपने ग्रंथो में समाविष्ट किया। आकाश में भ्रमण करने वाले गृह अपनी गति का भ्रमण करते समय विशिष्ट प्रकार की ध्वनि का निर्माण करते है और उन ध्वनियों के मिश्रण से संगीत की निर्मिती होती है। ऐसा प्राचीन विचारकों का मत है। इसमें प्रमुखता से पायथागोरस का उल्लेख कर सकते है। उन्होंने भारत तथा अन्य देशों का भ्रमण करके निरुपित किया कि प्रत्येक गृह, उपग्रह, नक्षत्र और तारा भ्रमण करते समय ध्वनि उत्पन्न करता है तथा...

संस्कृति -अण्डे का सच और रहस्य जिसे पढ़ कर सारा भारत देश अंडा खाना छोड देगा

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आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है ,ब्राह्मणों से लेकर जैनियों तक सभी ने खुल्लमखुल्ला अंडा खाना शुरू कर दिया है ...खैर मै ज्यादा भूमिका और प्रकथन में न जाता हुआ सीधे तथ्य पर आ रहा हूँ मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में ...शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है .. इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा सूख जाएगा , अब आते है मुर्गी के अण्डे...