Showing posts with label POLITICS. Show all posts
Showing posts with label POLITICS. Show all posts

February 05, 2012

भारतीय भाषाओँ के विरुद्ध षड़यंत्र

ऋषि भूमि, राम भूमि, कृष्ण भूमि, तथागत की भूमि... भारत के गौरवशाली अतीत को यदि शब्दों में एवं वाणी में कालांतर तक भी बांधने का प्रयास किया जाए तो संभव नहीं है। वर्तमान में पश्चिम का अंधानुकरण करने से जो भारत का सांस्कृतिक पतन हुआ है वह निश्चय मानिए आपके प्रयासों से समाप्त होगा। इस पश्चिम के अंधानुकरण एवं मानसिक परतंत्रता के रोग के उपचार हेतु इसका कारण प्रभाव आदि जानना भी नितांत आवश्यक है।




भारत पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से २०० से २५० वर्षों तक अंग्रेजो का शासन रहा, अल्पावधि तक फ्रांसीसियों एवं डच आक्रान्ताओं का प्रभाव भी रहा। भारत के कुछ भूभागो केरल, गोवा (मालाबार का इलाका आदि ) पर तो, पुर्तगालियों का ४००–४५० वर्षों तक शासन रहा।



भारत पर ७–८ शताब्दी से आक्रमण प्रारंभ हो गए थे। मोहाम्मदबिन कासिम, महमूद गजनवी ,तैमूर लंग, अहमद शाह अफदाली, बाबर एवं उसके कई वंशज इन आक्रांताओंके का भी शासनकाल अथवा प्रभावयुक्त कालखंड कोई बहुत अच्छा समय नहीं रहा भारत के लिए, सांस्कृतिक एवं सभ्यता की दृष्टि से।



भिन्न भिन्न आक्रांताओ के शासनकाल में भारत में सांस्कृतिक एवं सभ्यता की दृष्टि से कुछ परिवर्तन हुए। कुछ परिवर्तन तो तात्कालिक थे जो समय के साथ ठीक हो गए, लेकिन कुछ स्थाई हो गए। जब तक भारत पर आक्रांताओ का शासन था तब तक हम पर परतंत्रता थी। सन १९४७ की तथाकथित सत्ता के हस्तांतरण के उपरांत शारीरिक परतंत्रता तो एक प्रकार से समाप्त हो गई किंतु मानसिक परतंत्रता से अब भी हम जूझ रहे है। यह अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए जुझारूपन हमारे रक्त में है, जो कभी सपाप्त नहीं हो सकता। इसी के कारण हमारी वर्तमान संस्कृति में अधकचरापन आ गया है "न पूरी ताकत से विदेशी हो पाए, न पूरी ताकत से भारतीय हो पाए, हम बीच के हो गए, खिचड़ी हो गए" !!



भारतीय भाषाओँ के विरुद्ध एक षड़यंत्र -

एक सबसे बड़ा विकार स्थानीय भाषा एवं बोली के पतन के रूप में आया। हम आसाम में, बंगाल में, गुजरात में, महाराष्ट्र में रहते है वही की बोली बोलते है, लिखते है, समझते है परंतु सब सरकारी कार्य हेतु अंग्रेजी ओढ़नी पड़ती है। यह विदेशीपन, अंग्रेजीपन के कारण और भी भयावह स्थिति का तब निर्माण होता है जब नन्हे नन्हे बालको को कान उमेठ-उमेठ कर अंग्रेजी रटाई जाती है। सरकार के आकड़ो के अनुसार जब प्राथमिक स्तर पर १८ करोड़ भारतीय छात्र विद्यालय में प्रथम कक्षा में प्रवेश लेते है तो अंतिम कक्षा जैसे उच्च शिक्षा जैसे अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग), चिकित्सा (मेडिकल), संचालन (मैनेजमेंट) आदि तक पहुँचते-२ तो १७ करोड़ छात्र/छात्राएं अनुतीर्ण हो जाते है, केवल १ करोड़ उत्तीर्ण हो पाते है। भारत सरकार ने समय समय पर शिक्षा पर क्षोध एवं अनुसंधान के लिए मुख्यतः तीन आयोग बनाए दौ. सि. कोठारी (दौलत सिंह कोठारी), आचार्य राममूर्ति एवं एक और... सभी का यही मत था की यदि भारत में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा व्यवस्था न हो अपितु शिक्षा स्थानीय एवं मातृभाषा में हो तो यह जो १८ करोड़ छात्र है, सब के सब उत्तीर्ण हो सकते है, उच्चतम स्तर तक




विचार कर देखे शिक्षा मातृभाषा में नहीं होने का कितना अधिक दुष्परिणाम उन १७ करोड़ विद्यार्थियों को भोगना पड़ता है, इनमें से आधे से अधिक तो शुरुआत में ही बाहर हो जाते कोई पांचवीं में तो कोई सातवीं में कुछ ८-८.५ करोड़ विद्यार्थी इस व्यवस्था के कारण सदैव के लिए बाहर हो जाते है। यह कैसे दुर्व्यवस्था है जो प्रतिवर्ष १७ करोड़ का जीवन अंधकारमय बना देती है। अगर आप प्रतिशत में देखे तो ९५% सदैव के लिए बाहर हो रहे है। यह सब विदेशी भाषा को ओढ़ने के प्रयास के कारण, बात मात्र विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की नहीं अपितु व्यवस्था की है।



दुर्भाग्य की पराकाष्ठा तो देखिये की जब कोई रोगी जब चिकित्सक के पास जाता है तो वह चिकित्सक उसे पर्ची पर दवाई लिख के देता है, मरीज उसे पढ़ नहीं सकता वरन कोई विशेषज्ञ ही पढ़ सकता है। कितना बड़ा दुर्भाग्य है उस रोगी का की जो दवा उसको दी जा रही है, जो वह अपने शरीर में डाल रहा है, उसे स्वयं न पढ़ सकता न जान नहीं सकता की वह दवा क्या है ? उसका दुष्परिणाम क्या हो सकता है उसके शारीर पर ? यदि वह जोर दे कर जानना भी चाहे तो डाक्टर उसे अंग्रेजी भाषा में बोल देगा, लिख देगा उसे समझने हेतु उसे किसी और विशेषज्ञ के पास जाना होगा।



क्योँ बंगाल में, असम में, गुजरात में, महाराष्ट्र में, हिंदी भाषी राज्यों आदि में दवाइयों का नाम क्रमषः बंगला में, असमिया में, गुजरती में, मराठी में, हिंदी में आदि में नहीं है। यह बिलकुल संभव एवं व्यावहारिक है। संविधान जिन २२-२३ भाषओं को मान्यता देता है उनमें क्योँ नही ? राष्ट्रीय भाषा हिंदी (हम मानते है) में क्यों नहीं जिसे समझने वाले ८० से ८५ करोड़ है और तो और सरकार ने नियम बना रखा है दवाइयों के नाम लिखे अंग्रेजी में, चिरभोग (प्रिस्किप्शन) लिखे अंग्रेजी में, छापे अंग्रेजी में आदि। जिस भाषा (अंग्रेजी) को कठिनाई से १ से २ प्रतिशत लोग जानते है।

विद्यालयों से लेकर न्यायालयों तक अंग्रेजी भाषा की गुलामी

मान लीजिए मैं असम का व्यक्ति हूँ मुझे कुछ न्याय संबंधित परेशानी है तो पहले असमियां में वकील को समझाओ, वकील भाषांतर करे अंग्रेजी में उपरांत वह जज को समझाए। जज विचार कर अंग्रेजी में वकील को समाधान सुनाये, वकील अंग्रेजी का भाषांतर करे असमियां में, उपरांत मुझे समझावे... अरे भाई क्या सत्यानाश कर रखा है। इन सब में कितना समय एवं शक्ति की नष्ट हो रही है अगर यह भाषा की परतंत्रता नहीं होती तो मैं सीधे अपनी दुविधा, परेशानी न्यायाधीश को असमिया में बता देता और वह उसका समाधान कर मुझे बता देता

किसी तीसरे व्यक्ति (न्यायज्ञ) की आवश्यकता ही नहीं पड़ती भाषांतर के लिए।



बच्चों का निजी एवं कान्वेंट विद्यालयों में पिता माता के अंग्रेजी नहीं आने के कारण प्रवेश नहीं मिल पाना, किससे छिपा है ? आपका बालक कितना ही मेधावी क्योँ न हो अगर माता पिता को अंग्रेजी न आती हो तो, उन्हें निर्लज्जता के साथ कह दिया जाता है आप किसी और भाषा का विद्यालय खोज ले एवं बालक/बलिका को प्रवेश नहीं दिया जाता। ऐसे कान्वेंट विद्यालयों का तर्क होता है की अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो जो गृहकार्य हम बच्चे को देंगे उसमें आप कैसे सहायता करेंगे ? इसी अन्याय के कारण करोड़ो-करोड़ो बच्चे इन विद्यालयों में केवल इस लिए नहीं जा पाते क्यूंकि उनके माता पिता को अंग्रेजी नहीं आती और अगर कभी प्रवेश हो ही जाता है तो मात्र अंग्रेजी नहीं आने के कारण उसमें कम अंक प्राप्ति के कारण विद्यार्थियों का समूल प्रतिशत घट जाता है एवं कभी कभी तो पुनः सभी विषयों की तयारी करनी पड़ती है।

अंग्रेजी कोई बड़ी भाषा नहीं है, केवल १४ देशों में चलती है जो गुलाम रहे हैं

अंग्रेजी कोई इतनी बड़ी भाषा नहीं है, जैसी की हमारे मन में उसकी छद्म छवि है, विश्व के मात्र १४ देशों में अंग्रेजी चलती है एवं यह वही देश है जो अंग्रेजो के परतंत्र रहे है।




इनके इन देशों में अंग्रेजी का स्वयं विकास नहीं हुआ है परतंत्रता के कारण इन्हें इसके लिए बाध्य होना पड़ा। विश्व की प्रमुख संस्थाए अंग्रेजी में कार्य नहीं करती, बहुत से देशों के लोग तो अंग्रेजी जानते हुए भी उसमें बात करना पसंद नहीं करते। जर्मनी में जर्मन में, फ़्रांस में फ्रेंच में, स्पेन में स्पेनिश में, जापान में जापानी में, चीन में चीनी में आदि देशों में अपनी भाषा में ही सरकारी कार्य भी किया जाता है। अंग्रेजी से निजात ही अच्छी है क्यूंकि इसमें हमारा विकास नहीं, मुक्ति नहीं।



संयुक्त राष्ट्र महासंघ के मानवीय विकास के लेखे जोखे में भारत लगभग १३४ में आता है बहुत से भारत से भी छोटे छोटे देश जो इस लेखे-जोखे में भारत से ऊपर आते है क्यूंकि उनमें अधिकांश अपनी मातृभाषा में कार्य करते है। स्वयं संयुक्तराष्ट्र भी फ्रेंच भाषा में कार्य करता है अंग्रेजी में तो वह अपने कार्यों का भाषांतर करता है अधिकांश भाषा विशेषज्ञ भी कहते है अंग्रेजी व्यकरण की दृष्टि से भी बहुत बुरी है।



भारत की सभी २२-२३ मातृभाषाएँ जो संविधान में स्वीकृत है, बहुत सबल है। उनमें से भी यदि सबसे छोटी भाषा को अंग्रेजी से तुलना करे तो वह भी अंग्रेजी से बड़ी है। उत्तर प्रांत के जो राज्य है, मणिपुर, नागालैण्ड, मिजोरम आदि उनमें जो सबसे छोटी भाषा एव बोलियां चलती है उनमें से भी सबसे छोटी भाषा है उसमें भी अंग्रेजी से अधिक शब्द है। जब सबसे छोटी भाषा भी अंग्रेजी से बड़ी है तो हम अंग्रेजी को क्यूँ पाल रहे है एवं हमारी सबसे बड़ी भाषा तो अंग्रेजी से कितनी बड़ी होगी। तकनिकी शब्द जो है न हम चाहे तो तात्कालिक रूप से जैसे के तैसे अंग्रेजी ले सकते।



लेकिन विचार की जो अभिव्यक्ति है वह मातृभाषा, बोलियों में कर थोड़े दिन में तकनिकी शब्दों को भी हर मातृभाषा में ला सकते है। कुछ परेशानी नहीं है और तो और हमारे पास माँ (संस्कृत) भी है उसका भी उपयोग किया जा सकता है। संस्कृत के शब्द तो सभी भाषओं में मिल जाते है।



January 18, 2012

Indian Education Act - 1858 VS GURUKUL

*Indian Education Act -* 1858 में Indian Education Act बनाया गया

इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकोले ने की थी
लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी
अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W.Litnar और दूसरा था T...homas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था , 1823 के आसपास की बात है ये Litnar , जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता है  और मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे, और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है "कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी "
इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला
1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे 7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में Higher Learning Institute हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी
इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं
और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमे वो लिखता है कि "इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी " और उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है
और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा
लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है
शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है
इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे
ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी
अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी
संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है
जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी ......................

जिस यूरोप को हम आधुनिक व खुले विचारो वाला मानते हैं, आज से ५०० वर्ष पहले वहाँ सामान्य व्यक्ति 'मैरेज' भी नहीं कर सकता था क्योंकि उनके बहुत बड़े 'दार्शनिक' अरस्तू का मानना था की आम जनता मैरेज करेगी तो उनका परिवार होगा, परिवार होगा तो उनका समाज होगा, समाज होगा तो समाज शक्तिशाली बनेगा,



शक्ति शाली हो गया तो राजपरिवार के लिए खतरा बन जाएगा । इसलिए आम जनता को मैरेज न करने दिया जाय । बिना मैरेज के जो बच्चे पैदा खोते थे, उन्हें पता न चले की कौन उनके माँ-बाप हैं, इसलिए उन्हें एक सांप्रदायिक संस्था में रखा जाता था, जिसे वे कोन्बेंट कहते थे उस संस्था के प्रमुख को ही माँ बाप समझे इसलिए उन्हें फादर, मदर, सिस्टर कहा जाने लगा ।

December 06, 2011

शोभा सिंह और शादीलाल


sir shadi lal



                                                               sir shobha singh

“अंकल जाओ ना” ! कभी गुस्से में वह बोल देती है, जब मेरा दिमाग नहीं चलता तो उस लड़की से पूछता हूँ, उससे ही दिमाग चलने लगता है । एक बार उसने चाय पिलाई – मुझे वह लड़की बहुत पसंद है इसका कोई गलत अर्थ न ले जब तक कुछ नहीं होता उसी से मुझे प्रेरणा मिलती है, इस प्रेरणा के भी बड़े अलग अलग नियम है बहुत सारी लड़कियों से ‘प्रेम करने’के बाद भी मैं चरित्रहीन नहीं रहा , चलिये एक दृश्य का किस्सा सुन लीजिये दिल्ली की एक प्रमुख कवियित्रि से मेरा प्रेम चल रहा था कि मैं दिल्ली गया । जनपथ होटल में ठहरा उसने दिल्ली के सारे पाँच सितारा होटलों में खाना खिलाया, नाश्ता कराया, कॉफी पिलाई, अच्छी वकील भी थी वह । एक बार दिल्ली कोर्ट मे हत्या के केस में खड़ी हुई । मुझे बहस सुनाने के ले गई, जहां मैं सो गया । उसकी एक सहेली आई, मैं भी बैठा हुआ था, उसके दो भतीजे और एक भांजा पढ़ने जा रहे थे । सहेली ने ऐसे ही पुंछ लिया किस स्कूल में पढ़ते है ये दोनों ? उसने बड़े गर्व से बताया ‘सर शोभा सिंह स्कूल में’ ।


उसकी सहेली कि आँखें आश्चर्य से फटी रह गई । उसने पूछा तुम्हें मालूम है सर शोभा सिंह कौन थे और उनका नाम के आगे अँग्रेजी‘सर’ कैसे लगा ? मेरी प्रेमिका ने बताया सर शोभा सिंह खुशवंत सिंह के पिता थे तब उसने बताया सर शोभा सिंह वह आदमी थे जिन्होने श्री सरदार भगत सिंह के विरुद्ध गवाही दी थी उसने गाड़ी मैं बैठे बच्चो को बुलाया और कहा “आज से तुम उस स्कूल में झांकना भी मत, दूसरे स्कूल में होगा तुम्हारा प्रवेश, नहीं होगा तो भी उस स्कूल मे झांकना भी मत ।

सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि जनरों मे घृणा के पात्र थे अब तक है सोचिए भारतीय जनता किस तरह कि है ? खुशवंत सिंह ने भी अपने पिता के बारें मे अधिक नहीं लिखा है बस उनका जिक्र किया है खुशवंत सिंह को अच्छी तरह पता था भारतीय जनता कि नजर में उनके पिता घृणा के पात्र थे आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है श्यामली का शक्कर (शराब) का कारखाना उत्तर प्रदेश मे ‘नंबर 1’ है, क्योंकि जनता को नहीं पता है कि भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले यही दो व्यक्ति थे । ;बाकी कोई हिंदुस्थानी तैयार नहीं था, लेकिन अंग्रेज़ सरकार नई दो गद्दार पैदा कर लिएमेरी आँखें भर आई, वह सहेली रोने लगी हम तीनों चुपचाप बैठे रहे दो घंटे, फिर मुझे ध्यान आई सन 73-74 कि एक घटना । एक बार मुझे बागपत जिले के श्यामली के पास कहीं जाना था बहन के लिए लड़का देखने, लड़का मामा जी ने बताया था, बागपत में कोई गाँव था जहां उसके पिता रहते थे उन्होने श्यामली के शक्कर (शराब) के कारखाने में रुकने कि व्यवस्था कर दी । हम श्यामली गाँव पहुंचे, वहाँ

शक्कर (शराब) के कारखाने में जिस तरह हमारा स्वागत हुआ वह अभूतपूर्व था , हम और मामाजी बहुत चमत्कृत थे दूसरे दिन सुबह 5 बजे निकालना था सुबह 4 बजे चाय और नाश्ता मिल गया हमें नाश्ता क्या पूरा खाना था दोपहर बाद हम लौटे थके थकाए, सारे बेयरों में खलबली मच गई बेयरों ने आकर कहा यहाँ नाई है, उसने आकर पैर दबाये । संध्या को जरा सी फुर्सत मिली, हम टहलने के लिए निकले एक चाय के ढाबे पर ।

चाय वाला बहुत बातुनी था, बोला – साहब किसके यहाँ रुके है ? हमने कहा शक्कर (शराब) के कारखाने में ? उसकी आँखों मे वही भाव था जो मेरी प्रेमिका कि सहेली कि आँखों मे था – आश्चर्य, घृणा, अवहेलना के मिले-झूले भाव । आपको पता है किसका कारख़ाना है श्यामली में ? बनियो ने “सर शादीलाल’के मरने पर कफन तक बेचना मना कर किया था उसके लड़के कफन तक दिल्ली लेने गए थे” भगत सिंह के;विरुद्ध गवाही देने वाला यह दूसरा व्यक्ति था, दोनों को ही सर कि उपाधि मिली अंग्रेज़ो से । दोनों को ही बहुत सारा पैसा मिला, लेकिन भारतीय जनता में कफन तक उन्हें नहीं बेचा गया असेंबली में भगत सिंह के बम फेंकने के समय यह दो गवाह थे । शादीलाल सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे घृणा के पात्र थे अब तक है सोचिए भारतीय जनता कि तरह कि है ? खुशवंत सिंह ने भी अपने पिता के बारें मे अधिक नहीं लिखा है बस उनका जिक्र किया है खुशवंत सिंह को अच्छी तरह पता था भारतीय जनता कि नजर में उनके पिता घृणा के पात्र थे आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है श्यामली का शक्कर (शराब) का कारखाना उत्तर प्रदेश मे ‘नंबर 1’ है, क्योंकि जनता को नहीं पता है कि भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले यही दो व्यक्ति थे । ;बाकी कोई हिंदुस्थानी तैयार नहीं था, लेकिन अंग्रेज़ सरकार नई दो गद्दार पैदा कर लिए, हम लोगो ने तुरंत रिक्शा मंगवाया और ‘गेस्ट-हाउस’रवाना ओ गए । वेटर पूछते रह गए “सर आप तो कल जाने वाले थे ?” हमने कुछ नहीं सुनी, एक जगह रात काटी, सुबह बस पकड़ कार आ गए । आज मैं अपनी उस प्रेमिका को याद करता हूँ उसका नाम बताने में कोई परेशानी नहीं लेकिन …..

वह भी सरदार थी, वह भी पाकिस्तान से आई थी, वह भी खुशवंत सिंह के गाँव के पड़ोस से थी इसलिए उसके भतीजो और भाँजो को

सर शोभा सिंह के स्कूल मे प्रवेश मिला यह‘धुंध’भी क्या क्या करवा लेती है । इतिहास कि यह धुंध देश भक्त गोपाल शर्मा को सर शादी लाल के शराबखाने में रुकने को बाध्य कर देती है राजनीति कि धुंध ऐसे बुरी तरह छाई है कि साफ नजर ही नहीं आता राजनीति, इतिहास, संस्कृति सब को इस तरह धुंध में डुबो दिया गया है कि सही गलत करने का फैसला करना बड़ा मुश्किल होता है । मेरी पत्नी ने ‘टाइड’ साबुन खरीदा घर आकर पता चला वह तो अमेरिका कि प्रोक्टर एंड गेम्बल का साबुन है अपनी देश भक्ति से काफी परेशान हूँ कहीं कहीं स्थानो पर चाय पीजिए तो आईटीसी (ITC) कि मिलती है या अमेरिकन कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर की ।सर शोभा सिंहएक एक चीज में अमेरिका इतना घुला हुआ है की पता ही नहीं चलता आप इस धुंध मे अंजाने ही साम्राज्यवादी शक्तियों की मदद कर बैठते है, अरे चाय पियो तो सोसायटी, आसामी, टाटा, गिरनार की पियो । काजू बादाम करीदो तो बहुत सारी अमेरिकन कंपनियाँ बेचती है, तब बहुत परेशान हो जाता हूँ जब यह धुंध हटती नहीं मैं इस देश का रहने वाला हूँ इसी देश की चीजे खरीदना चाहता हूँ जैसे जापानी करते है और मेरे देश के ही तंत्र ने मुझसे यह सुविधाए छिन ली है मेरे हाथो से । सुबह उठता हूँ तो ‘जहरीले’कॉलगेट की जगह डाबर लाल मंजन करता हूँ मैं मैसूर सेंडल साबुन या गौशाला के देसी साबुन से नहाता हूँ, हर चीज को आजकल खोज-खाज कर खरीदता हूँ । लेकिन इतनी धुंध छोड़ दी गई है की हमें पता ही नहीं चलता कहाँ से साम्राज्यवादी घुस रहे है परेशान हो जाता हूँ ‘राष्ट्र’और‘देश’मे फर्क बताने वाले लोग मेरी तरह परेशान हो जाते है मैं देश द्रोही तो हो ही नहीं सकता ।

मेरा सपना है डेरा इस्माइल खां के पास सिंध नदी के किनारे मैं नहा सकु जहां मेरे पूर्वज भारद्वाज ऋषि ने वेद की पहली ऋचाएँ गाई थी मेरा सपना है की डेरा इस्माइल खां के पास उस प्राचीन एतिहासिक गोमल दर्रे को देख सकु, मेरा सपना है की मुल्तान के पास मालबा में जाकर रहूँ ;जहां मालवीय ब्राह्मण होते थे मेरा सपना है की मुल्तान के पास जोहराबाद में जाकर देखूँ वहाँ यौधेयगणो की कुछ स्मृतियाँ तो बाकी होती ही , इतिहास पर इतनी धुंध बिखरी हुई है की उसका कोई उत्तर नहीं है संस्कृति पर इतनी धुंध बिखरी है की असंभव यह तय करना क्या सही है राजनीति में तो धुंध ही धुंध है इस धुंध को हटा दो तो सब स्पष्ट नजर आएगा, लेकिन मेरे ये सपने सिर्फ सपने ही रह जाएंगे जब तक शोभा सिंह और शादीलाल जैसे चरित्र जिंदा है और आज भी कई शादीलाल और शोभा सिंह है भारत सरकार के मंत्रिमंडल मे इन्हें भी कभी सर की उपाधि तो नहीं मिलेगी लेकिन एक भारत रत्न जरूर मिल जाएगा ! राजीव गांधी को भी मिला था जबकि स्विस बेंकों मे उनके खातो की बात किसी से नहीं छिपी है , भारत का भगवान ही मालिक है

BRAND Archetypes through lens -Indian-Brands

There has been so much already written about brand archetypes and this is certainly not one more of those articles. In fact, this is rather ...