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Showing posts from August, 2019

Like It or Not, “Smart Drugs” Are Coming to the Office

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You’ve managed the same team for the past five years — then one day you find out that your most successful employee uses cognitive-enhancing drugs on the job. This scenario may not be hypothetical for long. The unauthorized use of prescription drugs such as the ADHD medications Adderall and Ritalin and the narcolepsy drug Modafinil is now common among American university students. They use these drugs not to escape work and avoid responsibility but to be able to work more and better. Up to 20% of Ivy League college students  have already tried “smart drugs,”  so we can expect these pills to feature prominently in organizations (if they don’t already). After all, the pressure to perform is unlikely to disappear the moment students graduate. And senior employees with demanding jobs might find these drugs even more useful than a 19-year-old college kid does. Indeed, a  2012 Royal Society report  emphasized that these “enhancements,” along with other tec...

Why You Should Watch Out for Your 5-Year Job Anniversary

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Most of us begin a new position with energy and a desire to impress. Our effort is high. Our passion is infectious. Our enthusiasm helps us to excel quickly. But for some, work becomes mundane and repetitive. They lose some of their passion, and their work can begin to feel like a chore. Eventually some of those executives who had initially loved their careers enter the dimension we call the “day prison.” As they enter their workspace, they feel the metaphorical bars close around them in a zone where they are unmotivated, dissatisfied, and much less productive than they could be. To better understand this phenomenon we examined data from 970 such people in a single organization. They were between 35 and 44 years old (the typical range for the onset of a mid-career crisis), and they all rated their engagement at work in the bottom 10%. How did these “day prisoners” compare with the rest of the organization? Compared to the makeup of the overall organization, there were slight...

नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है।

सुंदर पोस्ट है, सर्वेश तिवारी श्रीमुख जी की महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था.युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फ़टे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे, और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी. गिद्ध, कुत्ते, सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा देवब्रत भीष्म शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था अकेला.तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची, "प्रणाम पितामह" भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी। बोले, " आओ देवकीनंदन... स्वागत है तुम्हारा. मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" कृष्ण बोले, " क्या कहूँ पितामह! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" भीष्म चुप रहे.कुछ क्षण बाद बोले, " पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव? उनका ध्यान रखना, परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" कृष्ण चुप रहे. भीष्म ने पुनः कहा, ...

कटाक्ष से भरी कहानी

अपनी नई नवेली दुल्हन प्रिया को शादी के दूसरे दिन ही दहेज मे मिली नई चमाचमाती गाड़ी से शाम को रवि लॉन्ग ड्राइव पर लेकर निकला ! गाड़ी बहुत तेज भगा रहा था , प्रिया ने उसे ऐसा करने से मना किया तो बोला-अरे जानेमन ! मजे लेने दो आज तक दोस्तों की गाड़ी चलाई है , आज अपनी गाड़ी है सालों की तमन्ना पूरी हुई ! मैं तो खरीदने की सोच भी नही सकता था , इसीलिए तुम्हारे डैड से मांग करी थी ! प्रिया बोली :- अच्छा , म्यूजिक तो कम रहने दो ....आवाज कम करते प्रिया बोली ,तभी अचानक गाड़ी के आगे एक भिखारी आ गया , बडी मुश्किल से ब्रेक लगाते , पूरी गाड़ी घुमाते रवि ने बचाया मगर तुरंत उसको गाली देकर बोला-अबे मरेगा क्या भिखारी साले , देश को बरबाद करके रखा है तुम लोगों ने ,तब तक प्रिया गाड़ी से निकलकर उस भिखारी तक पहुंची देखा तो बेचारा अपाहिज था उससे माफी मांगते हुए और पर्स से 100रू निकालकर उसे देकर बोली-माफ करना काका वो हम बातों मे........कही चोट तो नहीं आई ? ये लीजिए हमारी शादी हुई है मिठाई खाइएगा ओर आर्शिवाद दीजिएगा ,कहकर उसे साइड में फुटपाथ पर लेजाकर बिठा दिया, भिखारी दुआएं देने लगा,गाड़ी मे वापस बैठी प्रिया स...

झाँसी की रानी का पुत्र दामोदर राव की कहानी ,दामोदर की जूबानी -- एक छुपा सत्य

दामोदर राव की कहानी ,दामोदर की जूबानी -- ----------------------------- झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है. रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ? वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुला कर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी. अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली. 1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा. महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे. आइये, दामोदर की कहानी दामोदर की जुबानी सुनते हैं – 15 नवंबर 1849 को नेवलक...

कविता - "बोल "

कविता  - "बोल " कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं। जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।। कटा जब शीश सैनिक का तो हम खामोश रहते हैं। कटा एक सीन पिक्चर का तो सारे बोल जाते हैं।। नयी नस्लों के ये बच्चे जमाने भर की सुनते हैं। मगर माँ बाप कुछ बोले तो बच्चे बोल जाते हैं।। बहुत ऊँची दुकानों में कटाते जेब सब अपनी। मगर मज़दूर माँगेगा तो सिक्के बोल जाते हैं।। अगर मखमल करे गलती तो कोई कुछ नहीँ कहता। फटी चादर की गलती हो तो सारे बोल जाते हैं।। हवाओं की तबाही को सभी चुपचाप सहते हैं। च़रागों से हुई गलती तो सारे बोल जाते हैं।। बनाते फिरते हैं रिश्ते जमाने भर से अक्सर हम मगर घर में जरूरत हो तो रिश्ते भूल जाते हैं।। कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।

बँटवारा

"पापा जी ! पंचायत इकठ्ठी हो गई , अब बँटवारा कर दो।" कृपाशंकर जी के बड़े लड़के गिरीश ने रूखे लहजे में कहा। "हाँ पापा जी ! कर दो बँटवारा अब इकठ्ठे नहीं रहा जाता" छोटे लड़के कुनाल ने भी उसी लहजे में कहा। पंचायत बैठ चुकी थी, सब इकट्ठा थे। कृपाशंकर जी भी पहुँचे। "जब साथ में निर्वाह न हो तो औलाद को अलग कर देना ही ठीक है , अब यह बताओ तुम किस बेटे के साथ रहोगे ?" सरपंच ने कृपाशंकर जी के कन्धे पर हाथ रख कर के पूछा। कृपाशंकर जी सोच में शायद सुननें की बजाय कुछ सोच रहे थे। सोचने लगे वो दिन जब इन्ही गिरीश और कुनाल की किलकारियों के बगैर एक पल भी नहीं रह पाते थे। वे बच्चे अब बहुत बड़े हो गये थे। अचानक गिरीश की बात पर ध्यानभंग हुआ, "अरे इसमें क्या पूछना, छ: महीने पापा जी मेरे साथ रहेंगे और छ: महीने छोटे के पास रहेंगे।" "चलो तुम्हारा तो फैसला हो गया, अब करें जायदाद का बँटवारा ???" सरपंच बोला। कृपाशंकर जी जो काफी देर से सिर झुकाए सोच मे बैठे थे, एकदम उठ के खड़े हो गये और क्रोध से आंखें तरेर के बोले, "अबे ओये सरपंच, कैसा फैसला हो गय...

बढती उम्र

बढती उम्र (अद्भुत संदेश - अंत तक जरूर पढ़ें नहीं तो आप अपने जीवन का एक दिन गवाँ देंगे।) कैसे बने रहें - चिरयुवा 1. फालतू की संख्याओं को दूर फेंक आइए। जैसे- उम्र, वजन, और लंबाई। इसकी चिंता डॉक्टर को करने दीजिए। इस बात के लिए ही तो आप उन्हें पैसा देते हैं। 2. केवल हँसमुख लोगों से दोस्ती रखिए। खड़ूस और  चिड़चिड़े लोग तो आपको नीचे गिरा देंगे। 3. हमेशा कुछ सीखते रहिए। इनके बारे में कुछ और जानने की कोशिश करिए - कम्प्यूटर, शिल्प, बागवानी, आदि कुछ भी। चाहे रेडियो ही। दिमाग को निष्क्रिय न रहने दें। खाली दिमाग शैतान का घर होता है और उस शैतान के परिवार का नाम है - अल्झाइमर मनोरोग। 4. सरल व साधारण चीजों का आनंद लीजिए। 5. खूब हँसा कीजिए - देर तक और ऊँची आवाज़ में। 6. आँसू तो आते ही हैं। उन्हें आने दीजिए, रो लीजिए, दुःख भी महसूस कर लीजिए और फिर आगे बढ़ जाइए। केवल एक व्यक्ति है जो पूरी जिंदगी हमारे साथ रहता है - वो हैं हम खुद। इसलिए जबतक जीवन है तबतक 'जिन्दा' रहिए। 7. अपने इर्द-गिर्द वो सब रखिए जो आपको प्यारा लगता हो - चाहे आपका परिवार, पालतू जानवर, स्मृतिचिह्न-उपहार, संगीत, पौधे...

Spiritual Stories

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ऊंचा क़द . चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो. हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है. जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं. कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है. विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है. हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया. दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी. सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया. साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे. बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी. अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में. मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा.” पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो...