क्या स्त्री पुरूष बराबर है ? -- लेख नरेन्द्र सिसोदिया
क्या स्त्री पुरूष बराबर है ? -- लेख नरेन्द्र सिसोदिया ==================================== अक्सर ऐसा देखा गया है की आजकल के आधुनिक या यूँ कहे पश्चिम का अंधानुुक रण करने वाले लोग इस बात पर बडा जोर देते है की स्त्री को पुरूष की बराबरी पर आना चाहिये । दुःख की बात तो ये है की ऐसी बातों में महीलायँ आगे रहती है । क्योंकी मेरे हिसाब ऐसा बोलकर स्त्री समाज अपना खुद का अपमान करती है । सबसे पहली बात तो ये की खुद भगवान ने दोनो को अलग बनाया तो दोनो एक कैसे हो सकते है । स्त्री का मानसिक विकास, शारीरिक विकास , गुणों का विकास और सामाजिक ताने बाने में उनकी उपस्थिति पुरूषों से अलग है, इतने सारे स्तरों पर भिन्नता होने के कारण वो पुरूष के बराबर तो क्या आसपास भी नही है। इसी बात को मुंशी प्रेमचंद ने इस प्रकार कहा है की - मानवीय गुणों के क्रमिक विकास में स्त्री पुरूषों से कही आगे है । हमारे समाज में स्त्री का अपनी महत्ता है और पुरूषों की अपनी, इस मामले में किसी को आगे बोलना और किसी को पीछे कहना वैसी ही मूर्खता है जैसी कोई ये बोले की १ लीटर दूध में और सूरज के प्रकाश में कौन आगे और कौन पीछे । पुरूष को ...