गांधीजी की किताबों से सत्याग्रह तक: अंग्रेजों के सहयोग से ब्रिटिश शासन के विरोध और खिलाफत आंदोलन की पूरी कहानी

महात्मा गांधी: किताबों से विचारों तक और ब्रिटिश शासन के विरोध तक का सफर

महात्मा गांधी को आज हम मुख्य रूप से सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और ब्रिटिश शासन के विरोध के लिए जानते हैं। लेकिन गांधीजी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत को देखें तो कहानी काफी अलग दिखाई देती है।

एक समय गांधीजी ने ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सहयोग की भावना दिखाई थी। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश अभियानों के दौरान भारतीय स्वयंसेवकों की Ambulance और Stretcher-Bearer सेवाओं में भूमिका निभाई। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भी उन्होंने ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों के लिए भारतीय सहयोग का समर्थन किया।

फिर ऐसा क्या हुआ कि वही गांधीजी कुछ वर्षों बाद ब्रिटिश शासन के सबसे प्रमुख विरोधी नेताओं में शामिल हो गए?

और उनकी पढ़ी हुई किताबों ने उनके विचारों को किस प्रकार प्रभावित किया?

इस कहानी को समझने के लिए गांधीजी के विचारों और राजनीतिक यात्रा को क्रम से देखना जरूरी है।


गांधीजी की सोच पर किन किताबों का प्रभाव पड़ा?

गांधीजी केवल किताबें पढ़ने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे पढ़े हुए विचारों को अपने जीवन में प्रयोग करने की कोशिश करते थे। गांधीजी के विचारों पर भारतीय धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ Ruskin, Tolstoy और Thoreau जैसे पश्चिमी विचारकों का भी प्रभाव पड़ा। गांधीजी की पुस्तक-सूचियों और उनके लेखन में इन लेखकों का उल्लेख मिलता है।

1. John Ruskin की Unto This Last

यह गांधीजी के जीवन को व्यावहारिक रूप से प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक थी। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में Ruskin की Unto This Last पढ़ी और बाद में बताया कि इस पुस्तक ने उनके जीवन में तत्काल परिवर्तन किया।

इससे उन्हें विशेष रूप से तीन विचार महत्वपूर्ण लगे:

  • व्यक्ति का कल्याण समाज के सभी लोगों के कल्याण से जुड़ा है।
  • ईमानदार श्रम का सम्मान होना चाहिए।
  • सरल जीवन और श्रम का नैतिक महत्व है।

गांधीजी ने बाद में इस पुस्तक का गुजराती रूपांतर “सर्वोदय” नाम से किया। Ruskin की पुस्तक के गांधीजी पर प्रभाव का उल्लेख गांधी-संबंधी आधिकारिक/शैक्षिक स्रोतों में भी मिलता है। :contentReference[oaicite:1]{index=1}


2. Leo Tolstoy की The Kingdom of God Is Within You

Tolstoy गांधीजी के महत्वपूर्ण पश्चिमी बौद्धिक प्रभावों में से एक थे। उनके विचारों ने गांधीजी को सत्य, नैतिकता, अहिंसा और अन्याय के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध के बारे में सोचने में सहायता की।

गांधीजी और Tolstoy के बीच पत्राचार भी हुआ। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी ने अपने समुदाय का नाम Tolstoy Farm रखा। गांधीजी के जीवन और विचारों पर Tolstoy के प्रभाव का उल्लेख गांधी-संबंधी स्रोतों में मिलता है। :contentReference[oaicite:2]{index=2}


3. Henry David Thoreau की Civil Disobedience

Thoreau का गांधीजी पर प्रभाव अक्सर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। यह कहना सही नहीं है कि Thoreau ने गांधीजी को सत्याग्रह सिखाया।

गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका में प्रतिरोध आंदोलन Thoreau को पढ़ने से पहले ही विकसित हो चुका था। लेकिन Thoreau की Civil Disobedience ने गांधीजी के विकसित होते विचारों को महत्वपूर्ण वैचारिक पुष्टि दी।

इसलिए अधिक सही निष्कर्ष यह है:

Thoreau ने सत्याग्रह पैदा नहीं किया, लेकिन उनके विचारों ने गांधीजी के चल रहे संघर्ष को एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार दिया।

गांधीजी की पुस्तक-सूची में Thoreau की On the Duty of Civil Disobedience और Walden दोनों का उल्लेख मिलता है। :contentReference[oaicite:3]{index=3}


4. भगवद्गीता

गांधीजी के लिए भगवद्गीता किसी भी पश्चिमी पुस्तक से अधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्रोतों में से एक थी। उन्होंने गीता से निष्काम कर्म, आत्मसंयम, कर्तव्य और सत्य जैसे विचारों को अपने जीवन से जोड़ा।

गांधीजी ने बाद में गीता पर अपनी व्याख्या लिखी, जिसे अनासक्ति योग के नाम से जाना जाता है।


5. Bible और Sermon on the Mount

इंग्लैंड में रहते हुए गांधीजी ने Bible पढ़ी। विशेष रूप से Sermon on the Mount ने उन्हें प्रभावित किया। ईसा मसीह के प्रेम, क्षमा, त्याग और नैतिक जीवन के संदेश ने गांधीजी को गहराई से प्रभावित किया।


6. Plato की Apology

गांधीजी Plato और Socrates के विचारों से भी प्रभावित थे। Socrates का सत्य के प्रति समर्पण और अपने सिद्धांतों के लिए कठिनाइयों को स्वीकार करने का साहस गांधीजी के लिए महत्वपूर्ण था।

गांधीजी ने Plato की Apology का गुजराती में अनुवाद भी किया था।


7. Henry David Thoreau की Walden

Thoreau की Walden में सरल जीवन, प्रकृति के करीब रहना और भौतिक आवश्यकताओं को सीमित रखने जैसे विचार मिलते हैं। ये विचार गांधीजी के सरल जीवन और आत्मनिर्भरता के विचारों से मेल खाते थे।


8. Sir Edwin Arnold की The Song Celestial

यह Bhagavad Gita का अंग्रेजी काव्यात्मक रूपांतरण था। गांधीजी ने इसे इंग्लैंड में पढ़ा और गीता को समझने के लिए इसे महत्वपूर्ण माध्यम पाया।


गांधीजी की किताबों से क्या समझ आता है?

गांधीजी का सत्याग्रह किसी एक विदेशी लेखक की देन नहीं था। उनकी सोच कई स्रोतों से विकसित हुई।

  • भगवद्गीता → निष्काम कर्म और आत्मसंयम
  • Ruskin → श्रम, समानता और सर्वोदय
  • Tolstoy → नैतिक प्रतिरोध और अहिंसा
  • Thoreau → नागरिक अवज्ञा की वैचारिक पुष्टि
  • Bible → प्रेम, क्षमा और त्याग

इन विचारों को गांधीजी ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और भारतीय परिस्थितियों के साथ मिलाकर अपना रास्ता बनाया।


क्या गांधीजी शुरू से ही अंग्रेजों के विरोधी थे?

नहीं।

यह गांधीजी के जीवन का महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर कम चर्चा किया जाने वाला पहलू है। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी ने शुरुआत में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति पूरी तरह विरोधी रुख नहीं अपनाया था।

उनका विश्वास था कि ब्रिटिश कानून और संवैधानिक व्यवस्था के भीतर भारतीयों को न्याय और अधिकार मिल सकते हैं। लेकिन दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों ने धीरे-धीरे उनकी सोच बदलनी शुरू कर दी।


Boer War और गांधीजी का Ambulance Corps

1899 में Boer War शुरू हुआ। गांधीजी ने भारतीय स्वयंसेवकों की एक Ambulance Corps सेवा संगठित की। इन स्वयंसेवकों का काम घायल सैनिकों को युद्धक्षेत्र से चिकित्सा सहायता और अस्पताल तक पहुंचाना था।

यह ध्यान देने योग्य है कि गांधीजी स्वयं हथियार लेकर युद्ध करने नहीं गए थे। उनकी भूमिका मुख्य रूप से medical और ambulance service से जुड़ी थी।


Zulu संघर्ष और Stretcher-Bearer Corps

1906 में दक्षिण अफ्रीका के Zulu संघर्ष के दौरान भी गांधीजी ने भारतीय स्वयंसेवकों की stretcher-bearer सेवा में भूमिका निभाई।

इससे पता चलता है कि उस समय गांधीजी ब्रिटिश साम्राज्य से पूरी तरह संबंध समाप्त करने की स्थिति में नहीं पहुंचे थे। उनका विचार था कि भारतीयों को अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी दिखाना चाहिए।


फिर गांधीजी की सोच क्यों बदली?

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव और अन्याय ने गांधीजी को ब्रिटिश शासन की वास्तविक सीमाओं का अनुभव कराया।

यहीं उनके भीतर यह विचार विकसित हुआ कि अन्याय का विरोध केवल हिंसा से नहीं, बल्कि सत्य और आत्मबल से भी किया जा सकता है।

यहीं से सत्याग्रह की पद्धति धीरे-धीरे विकसित हुई।


1915 में भारत वापसी

1915 में गांधीजी भारत लौटे। भारत आने के बाद उन्होंने तुरंत ब्रिटिश शासन के खिलाफ कोई व्यापक आंदोलन शुरू नहीं किया।

उन्होंने भारत की परिस्थितियों को समझने के लिए देश का दौरा किया और किसानों, मजदूरों तथा आम लोगों की समस्याओं को करीब से देखा।


प्रथम विश्व युद्ध और गांधीजी

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गांधीजी ने ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों के प्रति सहयोग की भावना दिखाई। उनका विश्वास था कि यदि भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिखाते हैं, तो इसके बदले भारत को राजनीतिक सुधार और अधिक स्वशासन मिल सकता है।

लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद घटनाएं उनकी अपेक्षाओं के अनुसार नहीं हुईं।


1919 का Rowlatt Act

1919 में ब्रिटिश सरकार ने Rowlatt Act लागू किया। इस कानून ने सरकार को राजनीतिक मामलों में लोगों को गिरफ्तार और नजरबंद करने की व्यापक शक्तियां दीं।

गांधीजी ने इसका विरोध किया और सत्याग्रह का आह्वान किया। अब ब्रिटिश शासन के प्रति उनका विश्वास तेजी से कमजोर हो रहा था।


जलियांवाला बाग — 13 अप्रैल 1919

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर ब्रिटिश भारतीय सैनिकों ने एक बड़ी भीड़ पर गोली चलाई।

इस घटना ने पूरे भारत को हिला दिया। गांधीजी के लिए यह ब्रिटिश शासन की नैतिक विफलता का बड़ा प्रमाण बना।

अब उनका विश्वास था कि केवल ब्रिटिश सरकार से सुधार की मांग करना पर्याप्त नहीं है।


गांधीजी और असहयोग आंदोलन

1920 में गांधीजी ने Non-Cooperation Movement यानी असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया।

उनका विचार था कि यदि भारतीय ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग करना बंद कर दें, तो औपनिवेशिक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।

सहयोग → अनुभव → असंतोष → सत्याग्रह → असहयोग

गांधीजी की राजनीतिक यात्रा में यह एक बड़ा परिवर्तन था।


गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन क्यों किया?

प्रथम विश्व युद्ध के बाद Ottoman Empire और खलीफा के भविष्य को लेकर भारतीय मुसलमानों में असंतोष था। भारतीय मुस्लिम नेताओं ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया।

गांधीजी ने इस आंदोलन का समर्थन किया और इसे असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य हिंदू-मुसलमानों सहित विभिन्न भारतीय समुदायों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में जोड़ना था।

गांधीजी के लेखन में खिलाफत आंदोलन में शामिल होने का उनका अपना स्पष्टीकरण भी मिलता है। :contentReference[oaicite:4]{index=4}


लेकिन खिलाफत आंदोलन के साथ समस्या क्या हुई?

खिलाफत आंदोलन मूल रूप से एक धार्मिक-राजनीतिक मुद्दे से जुड़ा था। गांधीजी ने इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ दिया।

कुछ समय के लिए इससे हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग बढ़ा और असहयोग आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला। लेकिन यह एकता स्थायी नहीं रही।

1922 में असहयोग आंदोलन समाप्त हुआ और 1924 में Turkey में खिलाफत संस्था समाप्त हो गई। इसके बाद खिलाफत आंदोलन का मूल आधार समाप्त हो गया।


1921 का Moplah/Mappila Rebellion क्या था?

1921 में दक्षिण भारत के Malabar क्षेत्र, जो आज मुख्यतः Kerala का हिस्सा है, में बड़ा विद्रोह हुआ। इसे Moplah Rebellion, Mappila Rebellion या Malabar Rebellion कहा जाता है।

इस घटना को समझते समय केवल एक कारण बताना उचित नहीं होगा। इसके पीछे कई परिस्थितियां थीं:

  • ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन
  • भूमि और किरायेदारी से जुड़े पुराने विवाद
  • Mappila मुस्लिम किसानों और जमींदारों के बीच तनाव
  • खिलाफत आंदोलन का प्रभाव
  • असहयोग आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि
  • ब्रिटिश प्रशासन की कार्रवाई

इतिहासलेखन में इस विद्रोह की प्रकृति को लेकर बहस है। कुछ इतिहासकार इसे किसान विद्रोह के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसके धार्मिक और सांप्रदायिक पहलू पर अधिक जोर देते हैं। इसलिए इसे समझने के लिए इसके सभी पहलुओं को साथ देखना जरूरी है।


विद्रोह में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा

विद्रोह के दौरान कुछ क्षेत्रों में हिंदुओं के खिलाफ गंभीर हिंसा की घटनाएं हुईं। ऐतिहासिक स्रोतों में हत्या, लूट और जबरन धर्मांतरण के मामलों का उल्लेख मिलता है।

हालांकि Moplah Rebellion के मृतकों और जबरन धर्मांतरण की संख्या को लेकर अलग-अलग स्रोतों में काफी अंतर मिलता है। इसलिए किसी विवादित संख्या को बिना स्रोत के अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।


ब्रिटिश शासन ने विद्रोह को कैसे दबाया?

ब्रिटिश सरकार ने सेना और पुलिस की बड़ी ताकत भेजकर विद्रोह को दबाया। विद्रोह के दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए, गिरफ्तार हुए और घायल हुए। सरकारी आंकड़ों तथा बाद के इतिहासकारों की व्याख्याओं में अंतर मिलता है।

इसलिए इस घटना को समझते समय ब्रिटिश प्रशासन के दमन और विद्रोहियों द्वारा की गई हिंसा—दोनों पक्षों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।


Wagon Tragedy — ब्रिटिश दमन की भयावह घटना

Moplah Rebellion के अंत से जुड़ी सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक Wagon Tragedy थी। नवंबर 1921 में बंदियों को एक बंद रेलवे मालवाहक डिब्बे में ले जाया गया। अत्यधिक भीड़ और खराब ventilation के कारण बड़ी संख्या में कैदियों की दम घुटने से मृत्यु हुई।

यह घटना ब्रिटिश प्रशासन के कठोर दमन और कैदियों के साथ हुई गंभीर लापरवाही की चर्चा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।


क्या गांधीजी ने Moplah हिंसा का समर्थन किया था?

ऐसा कहना सही नहीं होगा।

गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्होंने Moplah Rebellion के दौरान हुई हिंसा या जबरन धर्मांतरण को उचित माना।

गांधीजी ने Moplah हिंसा की आलोचना की और अपने लेखन में non-violence की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि हिंसा ने असहयोग आंदोलन की अहिंसक प्रकृति को नुकसान पहुंचाया। :contentReference[oaicite:5]{index=5}

इसलिए गांधीजी के खिलाफ यह सामान्य दावा करना कि उन्होंने Moplah हिंसा का समर्थन किया था, ऐतिहासिक स्रोतों के पूरे संदर्भ को प्रस्तुत नहीं करता।


फिर गांधीजी की आलोचना क्यों हुई?

गांधीजी की आलोचना मुख्य रूप से इसलिए हुई कि उन्होंने खिलाफत आंदोलन को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई।

आलोचकों का तर्क था कि एक धार्मिक मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ना आगे चलकर समस्याएं पैदा कर सकता था। दूसरी ओर, गांधीजी का उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़कर हिंदू-मुस्लिम एकता मजबूत करना था।

इसलिए इतिहास में यह प्रश्न आज भी चर्चा का विषय है:

क्या खिलाफत आंदोलन का समर्थन गांधीजी की राजनीतिक रणनीति की सफलता थी या एक गंभीर भूल?

इस प्रश्न का उत्तर इतिहासकारों के बीच एकमत नहीं है।


क्या Moplah Rebellion केवल हिंदुओं के खिलाफ था?

इतिहास को केवल एक वाक्य में सीमित करना उचित नहीं होगा।

विद्रोह में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष मौजूद था। भूमि और किसान संबंधी पुराने तनाव भी महत्वपूर्ण थे। लेकिन कुछ क्षेत्रों में यह संघर्ष गंभीर सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया और हिंदुओं के खिलाफ हत्या, लूट तथा जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाएं हुईं।

इसलिए Moplah Rebellion को समझने के लिए औपनिवेशिक शासन, किसान संघर्ष, खिलाफत राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा—सभी पहलुओं को साथ देखना जरूरी है।


गांधीजी का पूरा परिवर्तन एक नजर में

1893
गांधीजी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे।

1899
Boer War के दौरान भारतीय Ambulance सेवा में भारतीय स्वयंसेवकों की भूमिका।

1906
Zulu संघर्ष के दौरान Stretcher-Bearer सेवा।

1900s
दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का विकास।

1904 के आसपास
Ruskin की Unto This Last से गहरा प्रभाव।

South Africa
Tolstoy और Thoreau के विचारों का अध्ययन और प्रयोग।

1915
भारत वापसी।

1914–1918
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश युद्ध प्रयास के प्रति सहयोग की भावना।

1919
Rowlatt Act का विरोध।

13 अप्रैल 1919
जलियांवाला बाग हत्याकांड।

1920
असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन का राजनीतिक सहयोग।

1921
Moplah/Mappila Rebellion।

1922
Chauri Chaura के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया।


क्या गांधीजी अंग्रेजों से नफरत करते थे?

यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। गांधीजी अंग्रेज व्यक्ति और ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के बीच अंतर करते थे। उनका संघर्ष अंग्रेज लोगों से व्यक्तिगत घृणा पर आधारित नहीं था।

गांधीजी के विचारों पर Ruskin, Tolstoy और Thoreau जैसे पश्चिमी विचारकों का प्रभाव स्वयं इस बात को दिखाता है कि उनका विरोध किसी जाति या देश के लोगों से व्यक्तिगत नफरत पर आधारित नहीं था।

इसलिए गांधीजी के संघर्ष को इस तरह समझना अधिक उचित है:

अंग्रेज व्यक्ति से घृणा नहीं।

अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक शासन का विरोध।

यही गांधीजी के सत्याग्रह का मूल अंतर था।


निष्कर्ष

गांधीजी का राजनीतिक परिवर्तन अचानक नहीं हुआ था। यह लगभग दो दशकों के अनुभवों का परिणाम था।

उन्होंने शुरुआत में ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था और न्याय की संभावना पर विश्वास किया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश अभियानों के दौरान भारतीय Ambulance और Stretcher-Bearer सेवाओं में योगदान दिया।

लेकिन दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव और बाद में भारत में Rowlatt Act तथा जलियांवाला बाग जैसी घटनाओं ने उनके विश्वास को बदल दिया।

इसी दौरान Ruskin, Tolstoy, Thoreau, Bhagavad Gita और Bible जैसे स्रोतों से मिले विचारों ने उनके नैतिक और राजनीतिक चिंतन को आकार दिया।

फिर उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सत्याग्रह और असहयोग का रास्ता अपनाया।

खिलाफत आंदोलन के समर्थन के माध्यम से उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता बनाने की कोशिश की, लेकिन 1921 का Moplah/Mappila Rebellion दिखाता है कि धार्मिक और राजनीतिक एकता का यह प्रयोग कितना जटिल था।

गांधीजी की पूरी यात्रा को एक वाक्य में कहा जा सकता है:

“गांधीजी ने पहले व्यवस्था के भीतर न्याय की संभावना खोजी, फिर अन्याय का अनुभव किया, और अंततः हिंसा के बजाय सत्य, अहिंसा और असहयोग को अपना राजनीतिक हथियार बनाया।”

और शायद गांधीजी के जीवन का सबसे बड़ा सबक यही है:

किसी विचार को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है—उसे जीवन में प्रयोग करके देखना और आवश्यकता पड़ने पर अपनी सोच को बदलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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