नाथूराम गोडसे पर कविता: गांधी हत्या और इतिहास के अनकहे सवाल
पादकीय टिप्पणी: यह कविता एक वैचारिक और विवादित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इसमें व्यक्त विचार और ऐतिहासिक दावे लेखक/कवि के हैं, इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। गांधी की हत्या, भारत विभाजन और स्वतंत्रता आंदोलन जैसे विषयों को समझने के लिए विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों से अलग-अलग दृष्टिकोणों का अध्ययन करना आवश्यक है।
नाथूराम गोडसे पर विवादित कविता: गांधी, विभाजन और इतिहास पर उठते सवाल
नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी से जुड़ा विषय भारतीय इतिहास के सबसे विवादित और संवेदनशील विषयों में से एक है। गांधी की हत्या, भारत का विभाजन, कांग्रेस नेतृत्व, जिन्ना और स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर अलग-अलग विचार और व्याख्याएँ आज भी सामने आती हैं।
नीचे दी गई कविता इसी प्रकार के एक वैचारिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती है। कविता में गांधी, विभाजन और गोडसे को लेकर कई तीखे दावे और प्रश्न उठाए गए हैं।
यह कविता एक विवादित और वैचारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इसमें व्यक्त विचार तथा ऐतिहासिक दावे कविता के लेखक/प्रचलित पाठ से संबंधित हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। गांधी की हत्या, भारत विभाजन और स्वतंत्रता आंदोलन जैसे विषयों को समझने के लिए विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों तथा विभिन्न दृष्टिकोणों का अध्ययन आवश्यक है।
नाथूराम गोडसे पर कविता
माना गांधी ने कष्ट सहे थे,
अपनी पूरी निष्ठा से।
और भारत प्रख्यात हुआ है,
उनकी अमर प्रतिष्ठा से॥
किन्तु अहिंसा सत्य कभी,
अपनों पर ही ठन जाता है।
घी और शहद अमृत हैं पर,
मिलकर के विष बन जाता है।
अपने सारे निर्णय हम पर,
थोप रहे थे गांधी जी।
तुष्टिकरण के खूनी खंजर,
घोंप रहे थे गांधी जी॥
महाक्रांति का हर नायक तो,
उनके लिए खिलौना था।
उनके हठ के आगे,
जम्बूदीप भी बौना था॥
इसीलिए भारत अखण्ड,
अखण्ड भारत का दौर गया।
भारत से पंजाब, सिंध,
रावलपिंडी, लाहौर गया॥
तब जाकर के सफल हुए,
जालिम जिन्ना के मंसूबे।
गांधी जी अपनी जिद में,
पूरे भारत को ले डूबे॥
भारत के इतिहासकार,
थे चाटुकार दरबारों में।
अपना सब कुछ बेच चुके थे,
नेहरू के परिवारों में॥
भारत का सच लिख पाना,
था उनके बस की बात नहीं।
वैसे भी सूरज को लिख पाना,
जुगनू की औकात नहीं॥
आजादी का श्रेय नहीं है,
गांधी के आंदोलन को।
इन यज्ञों का हव्य बनाया,
शेखर ने पिस्टल गन को॥
जो जिन्ना जैसे राक्षस से,
मिलने-जुलने जाते थे।
जिनके कपड़े लंदन, पेरिस,
दुबई में धुलने जाते थे॥
कायरता का नशा दिया है,
गांधी के पैमाने ने।
भारत को बर्बाद किया,
नेहरू के राजघराने ने॥
हिंदू अरमानों की जलती,
एक चिता थे गांधी जी।
कौरव का साथ निभाने वाले,
भीष्म पिता थे गांधी जी॥
अपनी शर्तों पर आयरविन तक,
को भी झुकवा सकते थे।
भगत सिंह की फांसी को,
दो पल में रुकवा सकते थे॥
मंदिर में पढ़कर कुरान,
वो विश्व विजेता बने रहे।
ऐसा करके मुस्लिम जन,
मानस के नेता बने रहे॥
एक नवल गौरव गढ़ने की,
हिम्मत तो करते बापू।
मस्जिद में गीता पढ़ने की,
हिम्मत तो करते बापू॥
रेलों में, हिंदू काट-काट कर,
भेज रहे थे पाकिस्तानी।
टोपी के लिए दुखी थे वे,
पर चोटी की एक नहीं मानी॥
मानों फूलों के प्रति ममता,
खत्म हो गई माली में।
गांधी जी दंगों में बैठे थे,
छिपकर नोआखाली में॥
तीन दिवस में श्री राम का,
धीरज संयम टूट गया।
सौवीं गाली सुन, कान्हा का,
चक्र हाथ से छूट गया॥
गांधी जी की पाक-परस्ती पर,
जब भारत लाचार हुआ।
तब जाकर नथू,
बापू वध को मजबूर हुआ॥
गए सभा में गांधी जी,
करने अंतिम प्रणाम।
ऐसी गोली मारी गांधी को,
याद आ गए श्री राम॥
मूक अहिंसा के कारण ही,
भारत का आँचल फट जाता।
गांधी जीवित होते तो,
फिर देश दोबारा बंट जाता॥
थक गए हैं हम प्रखर सत्य की,
अर्थी को ढोते-ढोते।
कितना अच्छा होता जो,
“नेताजी” राष्ट्रपिता होते॥
नथू को फाँसी लटकाकर,
गांधी जी को न्याय मिला।
और मेरी भारत माँ को,
बंटवारे का अध्याय मिला॥
लेकिन जब भी कोई भीष्म,
कौरव का साथ निभाएगा।
तब-तब कोई अर्जुन रण में,
उन पर तीर चलाएगा॥
अगर गोडसे की गोली,
उतरी ना होती सीने में।
तो हर हिंदू पढ़ता नमाज,
फिर मक्का और मदीने में॥
भारत की बिखरी भूमि,
अब तलक समाहित नहीं हुई।
नथू की रखी अस्थि,
अब तलक प्रवाहित नहीं हुई॥
इससे पहले अस्थिकलश को,
सिंधु सागर की लहरें सींचे।
पूरा पाक समाहित कर लो,
इस भगवा झंडे के नीचे॥
कविता का संदर्भ
यह कविता गांधी की भूमिका, भारत विभाजन और नाथूराम गोडसे के विचारों को एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। कविता में कई ऐतिहासिक व्यक्तियों और घटनाओं का उल्लेख है, जिनकी स्वतंत्र ऐतिहासिक जाँच आवश्यक है।
इतिहास को समझने के लिए केवल एक पक्ष को अंतिम सत्य मानने के बजाय अलग-अलग स्रोतों, दस्तावेजों और इतिहासकारों के विचारों को पढ़ना अधिक उपयोगी है।
इतिहास केवल घटनाओं की सूची नहीं है; वह हमें यह समझने का अवसर भी देता है कि अलग-अलग लोग उन्हीं घटनाओं को अलग-अलग तरीके से क्यों देखते हैं।
अंतिम विचार
नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी से जुड़ी बहस आज भी भारतीय समाज में भावनात्मक और वैचारिक चर्चा का विषय है। इस तरह की कविताएँ किसी एक दृष्टिकोण को सामने रखती हैं, लेकिन पाठक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि कविता, विचार और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर को समझे।
इतिहास को पढ़िए, प्रश्न पूछिए और निष्कर्ष निकालने से पहले तथ्यों को परखिए।
नथुराम गोडसे अमर रहे
ReplyDeleteNathuram godse Amar rahe
ReplyDeleteJay godse
ReplyDeleteपं. नथुराम गोडसे जी को कोटी कोटी नमन अखंड भारत अमर रहे!
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