संस्कृति - सूर्य-मंदिर और मिहिर नृत्य
प्राचीन नृत्य-शैलियों के दो प्रकार प्रचलित थे, एक ताण्डव नृत्य और दूसरा लास्य नृत्य। समय के साथ यह नाम शिव तांडव में सात भागो में विभाजित हो गए। । वेद कालीन नृत्यों का प्रचलन महाभारत काल तक रहा था। उस युग में कृष्ण का निर्यात ताण्डव, अर्जुन का धीर ताण्डव इसके अतिरिक्त मृत्युंजय-ताण्डव, लक्षण ताण्डव आदि है।
नृत्य का उपयोग स्वस्थ लाभ के लिए सर्वोत्तम साधन माना जाता है । इसके अंग-सञ्चालन, पद-सञ्चालन और हास्य मुद्राओं आदि के प्रयोग से शरीर के विभिन्न नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ ठीक हो जाती है। इसके लिए भगवान कृष्ण के पौत्र साम्ब का उदाहरण दिया जाता है।
कुष्ठ रोग से पीड़ित साम्ब की चिकित्सा-हेतु सूर्योपसना नृत्य अर्थात् धुम्र ताण्डव की शिक्षा देकर वैदिक रीति से नृत्य कराया गया। विभिन्न औषधियों के एवं यज्ञ-हवनो के साथ ही नृत्य कला को भी चिकित्सा का मुख्य साधन माना गया था। जिससे साम्ब को लाभ हुआ। फिर उन ब्राह्मणों को वहीं बसाकर सूर्योपसना हेतू उनके लिए सूर्य-मंदिर स्थापित कर दिए गये।
सूर्य प्रतिमा के इन पुजारियों ने भगवान सूर्य को प्रसन्न करने की दृष्टी से मंदिरों में जो नृत्य किया अथवा शिष्यों द्वारा करवाया वह ‘मिहिर नृत्य’ कहलाया। इस नृत्य कला के आचार्य “मिहिराचार्य” के नाम से जाने गये। इस नृत्य शैली का प्रभाव प्रमुखतः से उत्तर भारत के सूर्य-मंदिरों में रहा।
“मिहिर” शब्द सूर्य का द्योतक है। सूर्य-मंदिरों के नाम से कई स्थानों पर मिहिर-मंदिर भी मिलते है। सूर्य-मंदिरों में गायक, वादक अथवा नर्तक-नर्तकियों को भी नियुक्त किया जाता था।
इस शैली के अंग-प्रत्यंगों के सञ्चालन एवं पदाक्षर आदि के दर्शन वर्तमान में प्रचलित शास्त्रीय नृत्य “कत्थक” और उडिसी नृत्य शैली में होता है। कत्थक नृत्य का स्वरुप ताण्डव प्रधान होने से यह सूर्योपासना ताण्डव है तथा उडिसी नृत्य लास्य नृत्य का रूप है। उडिसी नृत्य की नृत्यांगनाऒ को मेहरी नाम से संबोधित किया जाता था। कत्थक और उडिसी नृत्य की शैली से ताण्डव (पुरुष) और लास्य (महिला) नृत्य भेदों की जानकारी प्राप्त होती है।
सूर्य-मंदिरों की समाप्ति के साथ “मिहिर-नृत्य” शैली की भी इतिश्री हो गई। यह अपना मूल स्वरुप परिवर्तित कर आज कत्थक और उडिसी नृत्य के रूप में प्रचलित है।
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