संस्कृति - संगीत और व्यायाम


र्तमान समय में भारतीय चिकित्सक और विदेशी चिकित्सकों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के महत्व को स्वीकार किया है। संगीत के द्वारा चिकित्सा, यह कुशल चिकित्सक और प्रवीण संगीतज्ञ के द्वारा की जा सकती है। लेकिन यदि शास्त्रीय संगीत को एक व्यायाम के रूप में उपयोग में लिया जाए तो वह प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभप्रद होगा। संगीत की तीनों विधाएँ गायन, वादन और नृत्य व्यायाम का कार्य करती है।
गायन के लिए शरीर को पर्याप्त प्रयास करने पड़ते है, जिसके कारण रक्तसंचार में वृद्धि और पाचन क्रिया में सुधार होता है। वक्ष और उदर की मांसपेशियाँ भी प्रभावित होती है। आलाप-तान आदि क्रियाओं से फेफड़े अधिक सक्रिय होकर श्वास सम्बंधित व्यायाम हो जाता है। उसी प्रकार ओम् शब्द पर साधना करते समय ‘ओ’ शब्द से संपूर्ण शरीर में तथा ‘म’ शब्द के उच्चारण से मस्तिष्क में कम्पन्न उत्पन्न होता है। जो हमारे शारीरिक और मानसिक स्वस्थ के लिए लाभप्रद है। इस प्रकार गायन से फेफड़ो के साथ उदर, वक्ष और मांसपेशियों में भी सक्रियता आती है। रक्तसंचार के बढ़ने से स्फूर्ति रहती है। चित्त प्रसन्न रहता है। यह पाचन तंत्र को विशेष रूप से प्रभावित करता है। वाद्य-संगीत की अपेक्षा कंठ संगीत का प्रभाव मानसिक और शारीरिक दोनों दृष्टियों से अधिक हितकर है।
भारतीय चिंतन के अनुसार संगीत के सात स्वर मानव शरीर में स्थित सात चक्रों को झंकृत करते हुए निकलते है। यदि हम संयमपूर्वक मेरु दण्ड को सीधा और स्थिर रखते हुए संगीत के सप्त स्वरों का और अलंकारों का अभ्यास नियमित करें तो शरीर-स्थित सप्त चक्र झंकृत होते हुए स्पष्ट प्रतीत होने लगते है। यह चक्र दूषित हो गए तो शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते है। उदाहणार्थ—मणिपूर चक्र के दूषित होने पर पाचन सम्बन्धी रोग और अनाहत चक्र के दूषित होने से ह्रदय सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते है। प्राचीन काल से ही संगीतज्ञों की यह मान्यता थी कि ध्वनि स्थायु-विद्युत के रूप में नाभि-केंद्र से उठकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है। इससे स्वर-संधान के साथ षट् चक्रों के सुप्त संधान भी जागृत होते है। इस प्रकार शारीरिक और मानसिक असंतुलन को स्वर-विज्ञान कि सहायता से संतुलित किया जा सकता है। अनेक शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष प्रस्तापित किया है कि ध्वनी-तरंगे कानों द्वारा ग्रहण किये जाने के पश्चात् संवेदी तंत्रिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क के मध्य तक पहुँचती है और वही से न्यूरॉन की संरचना द्वारा मस्तिष्क के अन्य भागों तक पहुँचती है।
संगीत के माध्यम से मानसिक दशा के साथ-साथ बुनियादी शारीरिक दशाओं को भी बदला जा सकता है। कुछ शास्त्रज्ञों का मानना है कि प्रतिदिन संगीत का अभ्यास करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में कोशिकाओं की संख्या अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक होती है।
गायन के समान वादन भी एक मृदु और मनोरंजक व्यायाम है। इससे शरीर और मन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य की हथेलियों और पैरों के तलवों में ऐसे केंद्र होते है जिनका सम्बन्ध शरीर के विभिन्न अंगों से होता है। वैदिक शास्त्र में इसे प्रेशर-पॉइंट कहते है। एक्यूप्रेशर पद्धति में इन्ही प्रेशर पॉइंटो पर दबाव डालकर रोगों की चिकित्सा की जाती है। जब तबला या पखावज का वादन करते है तब इन प्रेशर-पॉइंट पर दबाव पड़ता है और रोग निवारण में सहायता होती है।
नृत्य से शरीर के सभी अंगों का व्यायाम पूर्णरूप से हो जाता है। भ्रू, नयन, भुजा, करि, पाद, ग्रीवा आदि का संचालन नृत्य में विशेष महत्व रखता है। इन्ही के साथ-साथ उदर, वक्ष, फेफड़े, श्वास-तंत्र, पाचन तंत्र, रक्त संचालन भी विशेष रूप से प्रभावित होते है। नृत्य से बाह्य और आंतरिक अंग सक्रिय हो जाते है।
शास्त्रीय नृत्य और ‘ऐरोबिक’ के बीच प्रख्यात नृत्यांगना डॉ नीलम वर्मा ने ताल-मेल बैठाया है। उनका मानना है कि नृत्य से रीढ़ और पॉस्चर सम्बन्धी विभिन्न परेशानियों से राहत मिलती है और व्यक्तित्व का विकास भी होता है। इस प्रकार शारीरिक स्वस्थ्य के साथ ही मस्तिष्क को तरौ-ताज़ा बनाये रखने में भी सहायक है।
सारांश स्वरुप कह सकते है कि शरीर के प्रत्येक अवयव पर स्वास्थवर्धक और अतिशीघ्र प्रभाव डालने वाली संगीत ही उपयुक्त पद्धति है। पाईथागोरस का भी मानना था कि संगीत न केवल व्याधियों से छुटकारा दिलाता है अपितु चरित्र निर्माण में भी सहायक सिद्ध होता है।

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