टांगीनाथ धाम
परशुराम ने जिस जगह फरसे को गाड़ कर शिव जी की अराधना की थी..... वो आज वह वह दिव्यास्त्र जिससे परशुरामजी ने धरती से सोलह बार म्लेच्छों(नीच कर्म में लिप्त क्षत्रिय) को समाप्त किया था वह परसा या फरसा आधुनिक झारखंड राज्य की राजधानी रांची के समीप ..... गुमला जिले में स्थित डुमरी प्रखंड के ......मझगांव में स्थित है।
.. झारखंड एक आदिवासी बहुत क्षेत्र है और ... झारखण्ड में में फरसा को टांगी कहा जाता है......इसलिए, कालांतर में इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया....।इन जंगलों में भगवान परशुराम ...... बगल में अपना परशु अर्थात फरसे को गाड़ कर..... भगवान शिव की स्थापना कर आराधना करने लगे....... !जमीन में करीब 17 फीट धंसे इस फरसे की ऊपरी आकृति कुछ त्रिशूल से मिलती-जुलती है..... इसलिए, स्थानीय लोग इसे त्रिशूल भी कहते हैं।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि...... इसमें कभी जंग नहीं लगता एवं खुले आसमान के नीचे धूप, छांव, बरसात, ठंड का कोई असर इस त्रिशूल पर नहीं पड़ता है......और, अपने इसी चमत्कार के कारण यह विश्वविख्यात है।
और.... इस टांगीनाथ धाम में .....आज भी इस इलाके में 10 से 15 किमी की परिधि में इस जाति का कोई व्यक्ति निवास नहीं करता.. क्योंकि , अगर कोई निवास करने का प्रयास करता है...... तो उसकी मृत्यु को हो जाती है.

.. झारखंड एक आदिवासी बहुत क्षेत्र है और ... झारखण्ड में में फरसा को टांगी कहा जाता है......इसलिए, कालांतर में इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया....।इन जंगलों में भगवान परशुराम ...... बगल में अपना परशु अर्थात फरसे को गाड़ कर..... भगवान शिव की स्थापना कर आराधना करने लगे....... !जमीन में करीब 17 फीट धंसे इस फरसे की ऊपरी आकृति कुछ त्रिशूल से मिलती-जुलती है..... इसलिए, स्थानीय लोग इसे त्रिशूल भी कहते हैं।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि...... इसमें कभी जंग नहीं लगता एवं खुले आसमान के नीचे धूप, छांव, बरसात, ठंड का कोई असर इस त्रिशूल पर नहीं पड़ता है......और, अपने इसी चमत्कार के कारण यह विश्वविख्यात है।
और.... इस टांगीनाथ धाम में .....आज भी इस इलाके में 10 से 15 किमी की परिधि में इस जाति का कोई व्यक्ति निवास नहीं करता.. क्योंकि , अगर कोई निवास करने का प्रयास करता है...... तो उसकी मृत्यु को हो जाती है.

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