June 17, 2016


⁠⁠[1:14 PM, 5/29/2016] +91 98391 06131: ⁠⁠⁠एक बार एक कुत्ते और गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी से जल्दी दौडते हुए दो गाँव आगे रखे एक सिंहासन पर बैठेगा... वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जायेगा, और राज करेगा. जैसा कि निश्चित हुआ था, दौड शुरू हुई. कुत्ते को पूरा विश्वास था कि मैं ही जीतूंगा. क्योंकि ज़ाहिर है इस गधे से तो मैं तेज ही दौडूंगा. पर अागे किस्मत में क्या लिखा है ... ये कुत्ते को मालूम ही नही था. शर्त शुरू हुई . कुत्ता तेजी से दौडने लगा. पर थोडा ही आगे गया न गया था कि अगली गली के कुत्तों ने उसे लपकना ,नोंचना ,भौंकना शुरू किया. और ऐसा हर गली, हर चौराहे पर होता रहा.. जैसे तैसे कुत्ता हांफते हांफते सिंहासन के पास पहुंचा.. तो देखता क्या है कि गधा पहले ही से सिंहासन पर विराजमान है. तो क्या...! गधा उसके पहले ही वहां पंहुच चुका था... ? और शर्त जीत कर वह राजा बन चुका था.. ! और ये देखकर निराश हो चुका कुत्ता बोल पडा.. अगर मेरे ही लोगों ने मुझे आज पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता ... तात्पर्य ... १. अपने लोगों को काॅन्फिडेंस में लो. २. अपनों को आगे बढने का मौका दो, उन्हें मदद करो. ३. नही तो कल बाहरी गधे हम पर राज करने लगेंगे. ४. पक्का विचार और आत्म परीक्षण करो. ⭐जो मित्र आगे रहकर होटल के बिल का पेमेंट करतें हैं, वो उनके पास खूब पैसा है इसलिये नही ... ⭐ ⭐बल्कि इसलिये.. कि उन्हें मित्र पैसों से अधिक प्रिय हैं ⭐ ⭐ऐसा नही है कि जो हर काम में आगे रहतें हैं वे मूर्ख होते हैं, बल्कि उन्हें अपनी जवाबदारी का एहसास हरदम बना रहता है इसलिये ⭐ ⭐जो लडाई हो चुकने पर पहले क्षमा मांग लेतें हैं, वो इसलिये नही, कि वे गलत थे... बल्कि उन्हें अपने लोगों की परवाह होती है इसलिये.⭐ ⭐जो तुम्हे मदद करने के लिये आगे आतें हैं वो तुम्हारा उनपर कोई कर्ज बाकी है इसलिये नही... बल्कि वे तुम्हें अपना मानतें हैं इसलिये⭐ ⭐जो खूब वाट्स एप पोस्ट भेजते रहतें हैं वो इसलिये नही कि वे निरे फुरसती होतें हैं ... बल्कि उनमें सतत आपके संपर्क में बनें रहने की इच्छा रहती है ... इसलिये ⭐ ( आत्मचिंतन करने योग्य पोस्ट है )
⁠⁠⁠⁠1:14 PM⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠⁠⁠+91 98224 89209Amol Khonde⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠[2:09 PM, 5/29/2016] +91 98224 89209: ⁠⁠⁠👍🏼
⁠⁠⁠⁠2:09 PM⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠⁠⁠Aol dr shivam⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠[2:39 PM, 5/29/2016] Aol dr shivam: ⁠⁠⁠हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर यदि आज देहलि के खण्डहर सदियोंकी निद्रा से जगकर गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर मै आया तभि द्रवित होकर मै आया ज्ञान दीप लेकर भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तःस्थल वर विशाल जग से ठुकराए लोगोंको लो मेरे घर का खुला द्वार अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मै वीरपुत्र मेरि जननी के जगती मे जौहर अपार अकबर के पुत्रोंसे पूछो क्या याद उन्हे मीना बझार क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलनेवाली आग प्रखर जब हाय सहस्त्रो माताए तिल तिल कर जल कर हो गई अमर वह बुझनेवाली आग नही रग रग मे उसे समाए हूं यदि कभि अचानक फूट पडे विप्लव लेकर तो क्या विस्मय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम गोपाल राम के नामोंपर कब मैने अत्याचार किया कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज मेरा इसका संबन्ध अमर मै व्यक्ति और यह है समाज इससे मैने पाया तन मन इससे मैने पाया जीवन मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण मै तो समाज की थाति हूं मै तो समाज का हूं सेवक मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥
⁠⁠⁠⁠2:39 PM⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠⁠⁠+91 73760 24213mayankkumar.dubey⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠[2:45 PM, 5/29/2016] +91 73760 24213: ⁠⁠⁠👍🏻
⁠⁠⁠⁠2:45 PM⁠⁠⁠⁠⁠

⁠⁠⁠⁠Aol dr shivam⁠⁠⁠⁠⁠

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"जातियों की उत्पत्ति कब और कैसे हुयी? पुरातन समाज तो वर्ण में विभाजित था तो जातियों का नामकरण किसने किया? जैसे गुप्ता, जायसवाल, वर्मा, शर्मा, पांडे, तिवारी, त्रिपाठी आदि। इन जातिसूचक नामों के पीछे क्या रहस्य है?"

एक महाशय ने दो प्रश्न पूछे थे, उनके उत्तर निम्नोक्त हैं :--
(1) प्रश्न :--"जातियों की उत्पत्ति कब और कैसे हुयी? पुरातन समाज तो वर्ण में विभाजित था तो जातियों का नामकरण किसने किया? जैसे गुप्ता, जायसवाल, वर्मा, शर्मा, पांडे, तिवारी, त्रिपाठी आदि। इन जातिसूचक नामों के पीछे क्या रहस्य है?"
उत्तर :-- आपने जिन आस्पदों (Surnames) का उल्लेख किया है वे सब के सब कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था पर ही आधारित हैं, किन्तु हिन्दू समाज के अन्धयुग में वर्णसंकरता का बोलबाला हो गया । उदाहरणार्थ, ब्राह्मणों के लिए सामान्यतः "शर्मन्"  आस्पद का प्रयोग होता था , आज भी धार्मिक कृत्यों के संकल्प में सारे ब्राह्मणों को "शर्मन्" ही कहा जाता है । "वर्मन्" क्षत्रिय का आस्पद था । त्रिवेदी या तिवारी का अर्थ था तीन वेद पढ़े वाले ।  दूसरों को वेद पढ़ाने वाले "उपाध्याय" कहलाते थे, जिसका अपभ्रंश बना 'ओझा' और 'झा' । बाद के काल में भी नयी-नयी जातियाँ और उपजातियाँ बनीं तो कर्मानुसार ही, जैसे कि तेल का कार्य करने वाले तेली कहलाए, नमक (नोन, नून) का कर्म करने वाले "नोनिया"  हुए (ये औद्योगिक जातियाँ थीं, कृषिप्रधान नहीं)। भारत की सभी जातियों के मूल कर्मों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि भारत की बहुसंख्यक आबादी गैर-कृषि कर्म पर आश्रित थी, अंग्रेजी राज से पहले इतिहास के किसी भी युग में भारत कृषिप्रधान देश नहीं था । भारत पूरे संसार का औद्योगिक कर्मशाला था । रोमन साम्राज्य के लेखक भी शिकायत करते थे कि हर साल भारत से व्यापार में रोमनों को 60 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का घाटा होता था जिसकी पूर्ति के लिए रोमनों को तीन-तीन महादेशों में लूट-पाट करनी पड़ती थी । मुक्त व्यापार का ढकोसला करने वाले अंग्रेजों ने अन्यायपूर्ण तरीकों द्वारा भारतीय उद्योगों को नष्ट किया और गैर-कृषक जातियों को कृषि पर आश्रित होने के लिए बाध्य कर दिया । इतनी आबादी के लिए कृषियोग्य भूमि भी नहीं थी, अतः अधिकाँश गैर-कृषक जातियाँ भूमिहीन मजदूर बनने के लिए बाध्य हो गयीं । लगभग 19 वीं शती के मध्य से पहले भारत में एक भी भूमिहीन मजदूर नहीं था जो 1872 के बाद से किये गए जनगणना के आंकड़ों से सिद्ध होता है। आज़ादी के बाद भी किसान-विरोधी नीतियों के कारण भूमिहीन मजदूरों की सापेक्ष संख्या बढ़ती ही जा रही है, मँझोले किसान सीमान्त बनते जा रहे हैं, और सीमान्त किसान या तो भूमिहीन मजदूर बनते हैं या फिर आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाते हैं । वर्ण और जाति में असमानता हिन्दू समाज की गुलामी के काल की दुर्घटना है । अधिकाँश जातियाँ गुलामी के काल की उपज हैं । आज भी हिन्दुओं को झूठा इतिहास, झूठा समाजशास्त्र, झूठा भारतीय-दर्शन, आदि पढ़ाया जा रहा है । इतना कूड़ा-कर्कट मैं अकेले दूर नहीं कर सकता, आप लोगों का भी दायित्व बनता है । हमारे विश्वविद्यालयों में सही पुस्तकें पढ़ाई जाएँ और यदि सही पुस्तकें उपलब्ध न हों तो सही शोध हों ताकि भविष्य में सही पुस्तकें प्रकाशित हो सकें ।
(2) प्रश्न :--"मुझे लगता है कि आर्य और द्रविड़ को इंगित करने हेतु ही श्रेष्ठता के क्रम में सुर और असुर शब्द की उत्पत्ति हुयी। मैं यह भी मानता हूँ कि स्वर्ग भारत के उत्तरी भूभाग जो कि हिमालय के अधीन था (प्राचीन तिब्बत, उत्तराखंड, हिमाचल, हिन्दुकुश और काश्मीर) को कहा गया और सुदूर दक्षिण जहां द्रविणों का वास था उसे पाताल लोक कहा गया।"
उत्तर :-- आर्य का अर्थ था "वैदिक संस्कारों में जो श्रेष्ठ हो"। "द्रविड़" शब्द भी आदरसूचक ही था । द्रव्य और द्रविड़ की सामान व्युत्पत्ति है, द्रविड़ का अर्थ है "सम्पन्न" । अर्थात जो धन में श्रेष्ठ हो । "श्रेष्ठ" से ही "सेठ"  शब्द बना है । "सुर" शब्द बाद का है, असुर प्राचीन है । "असुर"  का वैदिक अर्थ है  "जो सत्ता में हो, शक्तिशाली हो"। असुर का पर्याय है  "पूर्वदेव", अर्थात जो पहले देव थे किन्तु भोगवाद के कारण असुर बन गए । वास्तविक सुर और असुर दिव्य योनियाँ हैं, मनुष्य नहीं । देवलोक और पाताल भौतिक संसार में नहीं मिलेंगे । भौतिकवादियों को भ्रम है कि केवल भौतिक वस्तु का ही अस्तित्व है, शेष सब कुछ काल्पनिक है, जैसे कि आत्मा, परमात्मा, परलोक, कर्मों के फल, पाप-पुण्य, नैतिकता, आदि । "भौतिक"  का अर्थ है पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जिस पञ्च-भौतिक प्र-पञ्च का संज्ञान हो । इन्द्रियाँ केवल ऐन्द्रिक वस्तुओं का ही संज्ञान कर सकती हैं, सूक्ष्म तत्वों का नहीं ।⁠⁠⁠⁠

संस्कृत भाषा से अपनी बीमारी को ठीक करे

संस्कृत भाषा से अपनी बीमारी को ठीक करे

⭕संस्कॄत का जादू⭕

संस्कृत में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं।

( ०१ ) अनुस्वार (अं ) और विसर्ग(अ:) :-

संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग।

पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं —

यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। और

नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं—
यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।

अब जरा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।

उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।

कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- '' राम फल खाता है``

इसको संस्कृत में बोला जायेगा- '' राम: फलं खादति"
राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।

संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना।

२- शब्द-रूप :-
संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार २५ रूप बनते हैं।
यथा:- रम् (मूल धातु)
राम: रामौ रामा:
रामं रामौ रामान्
रामेण रामाभ्यां रामै:
रामाय रामाभ्यां रामेभ्य:
रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:
रामस्य रामयो: रामाणां
रामे रामयो: रामेषु
हे राम! हेरामौ! हे रामा:!

ये २५ रूप सांख्य दर्शन के २५ तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन २५ तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है।
सांख्य दर्शन के २५ तत्व निम्नानुसार हैं।-

आत्मा (पुरुष)
(अंत:करण ४ ) मन बुद्धि चित्त अहंकार
(ज्ञानेन्द्रियाँ ५ ) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण
(कर्मेन्द्रियाँ ५) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्
(तन्मात्रायें ५ ) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द
( महाभूत ५ ) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश

३- द्विवचन :-
संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।
जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

४ सन्धि :-
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐंसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
''इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:- १ इत्यहं जानामि।
२ अहमिति जानामि।
३ जानाम्यहमिति ।
४ जानामीत्यहम्।

इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है।
इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं।⁠⁠⁠⁠

The seven stages of death

The seven stages of death
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1. Pallor Mortis - post mortem paleness which happens in those with light/white skin almost instantly (in the 15–25 minutes after the death) because of a lack of capillary circulation throughout the body.

2. Algor mortis - reduction in body temperature following death. This is generally a steady decline until matching ambient temperature. The Glaister equation estimates the hours elapsed since death as a linear function of the rectal temperature: (98.4°F - rectal temperature in Fahrenheit)/1.5

3. Rigor mortis - one of the recognizable signs of death, caused by chemical changes in the muscles after death, causing the limbs of the corpse to become stiff and difficult to move or manipulate.
In humans, it commences after about three to four hours, reaches maximum stiffness after 12 hours, and gradually dissipates until approximately 48 to 60 hours after death.

4. Livor mortis - settling of the blood in the lower (dependent) portion of the body, causing a purplish red discoloration of the skin. When the heart stops functioning and is no longer agitating the blood, heavy red blood cells sink through the serum by action of gravity. It starts twenty minutes after death and reaches its maximum within 6-12 hours.

5. Putrefaction - decomposition of proteins in a process that results in the eventual breakdown of cohesion between tissues and the liquefaction of most organs. The exact rate of putrefaction is dependent upon many factors such as weather, exposure and location. Thus, refrigeration at a morgue or funeral home can retard the process, allowing for burial in three days or so following death without embalming. The rate increases dramatically in tropical climates.

6. Decomposition - process by which organic substances are broken down into simpler forms of matter. Various sciences study the decomposition of bodies under the general rubric of forensics because the usual motive for such studies is to determine the time and cause of death for legal purposes.

7. Skeletonization - the last vestiges of the soft tissues of a corpse or carcass have decayed or dried to the point that the bones of the skeleton are exposed. By the end of the skeletonization process, all soft tissue will have been eliminated, leaving only disarticulated bones.⁠⁠⁠⁠

THE DISCOVERY OF ZERO

THE DISCOVERY OF ZERO●
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आर्यभट ने शून्य का आविष्कार पांचवी शताब्दी में किया था.. तो 100 कौरव और दाशराज्ञ युद्ध में शामिल 10 राजाओ को पुराने लोगो ने कैसे गिना?
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गिनती करना मनुष्य को आदिकाल से ही आता है... पर गिनती दो प्रकार की होती है
1. संख्यात्मक जैसे 999
2. शब्दात्मक जैसे... नौ सौ निन्यानवे
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पुराने सभी ग्रंथो में संख्याओ का उल्लेख शब्दात्मक रूप में... जैसे "दश" "सहस्त्र" "अर्बुद" आदि के रूप में मिलता है...इसलिए 100 कौरवो की संख्या को लेके किया परिहास स्वयं रिजेक्ट हो जाता है
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समस्या सिर्फ ये थी कि... जब संख्यात्मक रूप में कोई मैथमेटिकल कैलकुलेशन की जाती थी... तो शून्य का प्रयोग ना जानने के कारण... पुराने लोग... हर दसवे अंक को... नए नाम और सिंबल से प्रदर्शित करते थे
जैसे...
संस्कृत में 10 को दश 20 को विशंति कहते थे
रोमन में 10 को X, 50 को L तथा 100 को C, 1000 को M कहते थे
ग्रीक में 10 को आयोपा, 20 को काप्पा तथा 30 लेमडा कहते थे
And List Goes On... (Check Image In 1st Comment)
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अलग अलग संख्याओ के अलग अलग नाम और सिंबल याद रखना बहुत कठिन था
उदाहरण के लिए... अगर रोमन में 3288 को 3186 से गुणा करना हो तो... MMMCLXXXVIII × MMMCLXXXVI लिखना पड़ता था
इस जटिलता के कारण गुणा, भाग आदि प्रोसेस बहुत जटिल थी और इन संख्या पद्धतियों के आधार पर बहुत बड़ी कैलकुलेशन करना बीरबल की खिचड़ी पकाने समान ही मुश्किल होता था
(जिन्हें आसान लगता है... वे नेट पर How To Multiply In Roman Numerical लिख के देखे.. दिमाग घूम जाएगा)
इन विषमताओं के कारण ही 2000 साल से पहले... कोई उल्लेखनीय मैथमेटिकल और वैज्ञानिक प्रगति विश्व के किसी भी हिस्से में नहीं हुई जब तक... आधुनिक विज्ञान के पितामह आर्यभट का जन्म 476 ईसवी में... भारत की धरा पर नहीं हुआ
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आर्यभट ने शून्य की खोज नहीं की.. बल्कि उन्होंने ये प्रतिपादित किया कि... बजाय इतने सारे नम्बरो को इस्तेमाल करने की बजाय... हम शून्य के इस्तेमाल के साथ सिर्फ 1-9 तक के अंको के इस्तेमाल से... बड़ी से बड़ी संख्या लिख सकते हैं
अर्थात... आर्यभट की मुख्य खोज शून्य नहीं बल्कि "शून्य आधारित दशमलव संख्या प्रणाली" है
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यहाँ आर्यभट के देहांत के 48 साल बाद 598 ईसवी में जन्मे महान गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का नाम इसलिए उल्लेख करना जरुरी है
क्योंकि.. आर्यभट ने अपने ग्रन्थ "आर्यभटीय" में शून्य के प्रयोग का सिर्फ सिद्धांत दिया था
शून्य के सिद्धांत से सम्बंधित मैथमेटिकल नियम... जैसे कि 1-0=1 तथा 1×0=0 आदि... ब्रह्मगुप्त ने दुनिया को सिखाये थे
तत्पश्चात... 12वी शताब्दी में जन्मे गणितज्ञ "भास्कराचार्य द्वितीय" ने शून्य से सम्बन्धित आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण नियम प्रतिपादित किया
1÷0=Infinity !!!!
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भारतीयो की ये संख्या पद्धति सातवी शताब्दी में अरब व्यापारियो द्वारा अरब में ले जाई गई
जहा से... बाद में... घूमते फिरते इस ज्ञान का प्रचार प्रसार यूरोप में हुआ
यही कारण है कि... यूरोपियन इस संख्या पद्धति को "हिन्दू अरेबिक न्यूमेरिकल सिस्टम" कहते हैं
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अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि...
"हमें भारतीयो का शुक्रगुजार होना चाहिए... जिन्होंने हमें गिनना सिखाया... इसके बिना शायद... मॉडर्न साइंस की कोई भी खोज असंभव थी"
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हमें फक्र होना चाहिए कि हमारी रगो में आधुनिक विज्ञान के पितामह आर्यभट्ट... ब्रह्मगुप्त... भास्कराचार्य जैसे महान लोगो का रक्त मौजूद है
बेशक... आज ये हमारे बीच मौजूद नहीं
But Their Legacy To Teach Us "How To Count" Will Remain Forever In The Heart Of Modern Science !!!⁠⁠⁠⁠

प्रेरक कहानी - कूड़े का ट्रक

सत्संग हमे कूड़े का ट्रक नहीं बनने देगा...

एक दिन एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था कि अचानक ही एक कार पार्किंग से निकलकर रोड़ पर आ गयी। ऑटो चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते टकराते बची।

कार चालक गुस्से में ऑटो वाले को ही भला बुरा कहने लगा जबकि गलती कार- चालक की खुद की थी।

ऑटो चालक जो कि सत्संगी योगी था ने कार वाले की बातों पर गुस्सा नहीं किया और उल्टा मुस्कराते हुए आगे बढ़ गया।

ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा  तुमने उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने दिया। उसने तुम्हें भला बुरा कहा जबकि गलती तो उसकी थी। हमारी किस्मत अच्छी है, नहीं तो उसकी वजह से हम अभी अस्पताल में होते।

ऑटो वाले ने कहा साहब बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की तरह होते है। वे बहुत सारा कूड़ा अपने दिमाग में भरे हुए चलते है – हमेशा निराशा, क्रोध और चिंता से भरे हुए नकारात्मक रवैया अपनाते है। जब उनके दिमाग निराशा रूपी कूड़ा बहुत अधिक हो जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने लगते है।

इसलिए मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ क्योंकि अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ कूड़ा अगर मैंने स्वीकार कर लिया तो मैं भी एक कूड़े का ट्रक बन जाऊँगा और अपने साथ साथ आसपास के लोगों पर भी निराशा रूपी कूड़ा गिराता रहूँगा।

हे सत्संगी लोगों, जिंदगी बहुत छोटी है जो हमसे अच्छा व्यवहार करते है उन्हें धन्यवाद कहो और जो हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते, उन्हें मुस्कुराकर माफ़ कर दो।🌺

खबर - आइंस्टीन चाहते थे B.H.U में पढ़ाना




व्यंग - आदमी की औकात

कृपया अवश्य पढे: 🔰🔰🔰

🤔 आदमी की औकात  🤔

एक माचिस की तिल्ली,
एक घी का लोटा,
लकड़ियों के ढेर पे
कुछ घण्टे में राख.....
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात !!!!

एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया ,
अपनी सारी ज़िन्दगी ,
परिवार के नाम कर गया।
कहीं रोने की सुगबुगाहट  ,
तो कहीं फुसफुसाहट ,
....अरे जल्दी ले जाओ
कौन रोयेगा सारी रात...
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात!!!!

मरने के बाद नीचे देखा ,
नज़ारे नज़र आ रहे थे,
मेरी मौत पे .....
कुछ लोग ज़बरदस्त,
तो कुछ  ज़बरदस्ती
रो रहे थे।
नहीं रहा.. ........चला गया..........
चार दिन करेंगे बात.........
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात!!!!!

बेटा अच्छी तस्वीर बनवायेगा ,
सामने अगरबत्ती जलायेगा ,
खुश्बुदार फूलों की माला होगी ......
अखबार में
अश्रुपूरित श्रद्धांजली होगी.........
बाद में उस तस्वीर पे ,
जाले भी कौन करेगा साफ़...
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात !!!!!!

जिन्दगी भर ,
मेरा- मेरा- मेरा  किया....
अपने लिए कम ,
अपनों के लिए ज्यादा जीया ...
कोई न देगा साथ...जायेगा खाली हाथ....
क्या तिनका
ले जाने की भी
है हमारी औकात   ???

हम चिंतन करें .........
क्या है हमारी औकात ???

अमूल्य मनुष्य भव प्राप्त किया है ...
23 घण्टे दुसरो के लिए जी रहे है,
1 घण्टे तो अपने लिए जिए ।
23 घण्टे पाप कर रहे है जिसका फल हमे ही भोगना है,
*1 घण्टे तो धर्म करे
🙏⁠⁠⁠⁠

पुरुष पर कविता



पुरुष का बखान..

पुरुष का श्रृंगार तो स्वयम प्रकृति ने किया है..

स्त्रीया कांच का टुकड़ा है..
जो मेकअप की रौशनी पड़ने पर ही चमकती है..

किन्तु पुरुष हीरा है जो अँधेरे में भी चमकता है और उसे मेकअप की कोई आवश्यकता नहीं होती।

खूबसूरत मोर होता है मोरनी नहीं.. मोर रंग बिरंगा और हरे नीले रंग से सुशोभित..
जबकि मोरनी काली सफ़ेद..
मोर के पंख होते है इसीलिए उन्हें मोरपंख कहते है..
मोरनी के पंख नहीं होते..

दांत हाथी के होते है, हथिनी के नहीं। हांथी के दांत बेशकीमती होते है। नर हाथी, मादा हाथी के मुकाबले बहुत खूबसूरत होता है।

कस्तूरी, नर हिरन में पायी जाती है। मादा हिरन में नहीं।
नर हिरन, मादा हिरन के मुकाबले बहुत सुन्दर होता है।

मणि नाग के पास होती है ,
नागिन के पास नहीं।
नागिन ऐसे नागो की दीवानी होती है जिनके पास मणि होती है।

रत्न महासागर में पाये जाते है, नदियो में नहीं..
और अंत में नदियो को उसी महासागर में गिरना पड़ता है।

वैसे ही मनुष्यो में बुद्धि विवेक और बल मर्दों के पास होता है औरतो के पास नहीं..

संसार की बेशकीमती तत्व इस प्रकृति ने पुरुषो को सौंपे..
प्रकृति ने पुरुष के साथ
अन्याय नहीं किया..
9 महीने स्त्री के गर्भ में रहने के बावजूद भी औलाद का चेहरा स्वाभाव पिता की तरह होना, ये संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है..
क्योंकि पुरुष का श्रृंगार प्रकृति ने करके भेजा है,
उसे श्रृंगार की आवश्यकता नहीं...

🎄🎄🎄🌹🌹🌹🌹🌷🌷🌷 👍👍👍👍👍👍👌👌👌👌👌

June 15, 2016

7 सूत्र खुशहाल जिंदगी के लिए

कॉलेजों और पाठ्यपुस्तकों की शिक्षा गुजर-बसर करने के तरीके सिखाते हैं। लेकिन अगर आप अपने जीवन के अनुभव को अधिक गहन और खूबसूरत बनाना चाहते हैं, तो जीवन में सद्‌गुरु की इन सीखों को आजमा कर देखिए…

सूत्र 1: एक चीज को नष्ट कीजिए

एक मिनट के लिए सोचें कि आपके जीवन में कम से कम एक गैरजरूरी चीज कौन सी है और उसे आज ही खत्म कर डालें। खत्म करने से मेरा मतलब यह नहीं है कि आप अपने बॉस, सास या पड़ोसी को खत्म करने के बारे में सोचने लगें। आपको खुद से संबंधित किसी चीज को नष्ट करना है, जो आपके जीवन के लिए जरूरी नहीं है। ‘मैं अपने गुस्से को खत्म कर दूंगा’ जैसी बातें आम तौर पर यूं ही बोली जाती हैं और इसे आप सिर्फ निश्चय से हासिल नहीं कर सकते, इसके लिए जागरूकता की जरूरत होती है।
किसी एक चीज के बारे में सोचिए, जिसके बिना आपका जीवन बेहतर होगा। और जिसके बारे में आप आज एक ठोस कदम उठाएंगे, चाहे वह कितनी भी छोटी बात हो। किसी छोटी सी चीज को लेकर तय कर लें कि अब चाहे जो हो जाए, आप वह काम नहीं करेंगे। ‘मैं अब गुस्सा नहीं करूंगा’ यह बात झूठ होगी क्योंकि गुस्सा करना या न करना अब तक आपके काबू में नहीं है, मगर आप ऐसा कुछ सोच सकते हैं कि ‘मैं गलत शब्द नहीं बोलूंगा।’
कोई ऐसी चीज चुनें जो आप कर सकते हैं और करेंगे। इन छोटे-छोटे कदमों से आपका जीवन रूपांतरित हो सकता है। मगर आपको वास्तव में अपनी सोची हुई चीज पर अमल करना होगा। जो चीज आप छोड़ देते हैं, उसे फिर से प्रकट नहीं होना चाहिए। अगर आप किसी चीज को नष्ट कर रहे हैं, तो उसे हमेशा के लिए खत्म हो जाना चाहिए। अगर आप जीवन के सत्य की ओर बढ़ना चाहते हैं, तो झूठ के साथ अपने संबंध को कम करना होगा। हो सकता है कि सारा कुछ तुरंत खत्म न हो, मगर आप एक-एक कदम बढ़ाकर उसे कम कर सकते हैं।

सूत्र 2: एक चीज शुरु कीजिए

जीवन को ध्यान से देखकर यह तय करें कि उसमें कौन सी चीज बदली जा सकती है और फिर इस बारे में कोशिश कीजिए। ऐसी चीजों पर अफसोस करना, जिन्हें आप बदल नहीं सकते, दरअसल यथास्थिति बरकरार रखने की एक तरकीब होती है। महीने में कम से कम एक बार, हर पूर्णिमा के दिन, पूरी जागरूकता के साथ खुद से संबंधित किसी छोटी सी चीज के बारे में सोचें, जिसे आप बदलना चाहते हों। जैसे, ‘हर बार भोजन करने से पहले मैं 10 सेकेंड इस भोजन के लिए आभार प्रकट करूंगा, जो मेरा हिस्सा बनने वाला है।’ या ‘हर बार जब मैं अपने जीवन के किसी अनिवार्य तत्व, जैसे मिट्टी, जल, वायु और बाकी चीजों का इस्तेमाल करूंगा, तो मैं उसके एक फीसदी की बचत करूंगा।’ या ‘मैं अपनी थाली में उतना ही भोजन लूंगा, जितना मैं खा सकता हूं।’ ये छोटी-छोटी चीजें आपके जीवन को बदल देंगी और आपको एक अलग शख्सियत प्रदान करेंगी।

सूत्र 3: एक चीज याद रखिए

एक जरूरी चीज जो हर इंसान को करनी चाहिए, वह है अपने मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक ढांचे में अपने जीवन के सबसे बुनियादी सत्य – नश्वरता को गूंथना। फिलहाल, लोगों को यह समझने में पूरी जिंदगी लग जाती है। कई बार तो यह समझने के लिए कि वे नश्‍वर हैं, उन्हें जरूरत होती है एक हर्ट अटैक यानी हृदयाघात की या शरीर में किसी जानलेवा गांठ की।
आपको अपने जीवन के हर क्षण का जश्‍न मनाना चाहिए और उसका आनंद उठाना चाहिए क्योंकि जीवन एक पल के लिए भी आपका इंतजार नहीं करता। अगर आप अमर होते, तो आप अवसाद, चिंता, पागलपन और कष्ट में सैंकड़ों साल बिता सकते थे और फिर अपने 500वें जन्मदिन पर खुश हो लेते। लेकिन ऐसा है नहीं। आप नश्‍वर हैं और समय हाथ से निकलता जा रहा है। इसलिए इस जीवन में आपके पास कुंठा, अवसाद, चिंता, गुस्से या किसी भी अप्रियता के लिए समय नहीं है।
आश्रम में मैं लोगों से कहता रहता हूं कि चाहे आप कोई भी काम कर रहे हों, हर दिन कम से कम एक घंटे आपको मिट्टी में अपनी उंगलियां साननी चाहिए। यह आपके शरीर को कुदरती तौर पर याद दिलाने का काम करेगा कि आप नश्वर हैं।

सूत्र 4: जीने का समझदारी भरा तरीका अपनाइए

आपको सुख कब मिलता है – जब आप अपने भीतर प्रेम से भरे होते हैं तब या जब क्रोध, द्वेष और ईष्या से भरे होते हैं तब? अपने आप को किस तरीके से रखना बुद्धिमानी भरा है? प्रेमपूर्ण ही न? मेरा कहने का मतलब सिर्फ यह है कि कृपया अपना जीवन बुद्धिमानी से बिताएं। यह किसी और की भलाई के लिए नहीं है। यह आपके सुख के लिए है। प्रेम से भरी दुनिया बनाकर आप किसी और का कल्याण नहीं कर रहे हैं। जीने का यही बुद्धिमानी भरा तरीका है।
अपनी दुनिया को प्रेमपूर्ण बनाने के लिए आपको कुछ ज्यादा या कम नहीं करना है, बल्कि अपने जीवन में आप जो कुछ भी करते हैं, उन्हीं छोटी-बड़ी गतिविधियों से आप एक प्रेमपूर्ण दुनिया बना सकते हैं। आप जो चाहते हैं, उस पर अगर आप लगातार ध्यान केंद्रित करके अपना जीवन जिएं, तो निश्चित रूप से वह आपके आस-पास घटित होगा।

सूत्र 5: खुशियां गिरवी न रखें

ज्यादातर लोगों ने अपने जीवन की खुशी, शांति और प्रेम बाहरी हालातों के पास गिरवी रख दी है। जब स्टॉक मार्केट ऊपर जाता है, तो आप खुश होते हैं, वह नीचे आता है, तो आप दुखी होते हैं। मगर जीवन की गुणवत्ता इससे तय नहीं होती कि आपके पास क्या है। दुनिया में खुशी से जीने की हमारी क्षमता हमारे घर के आकार या जो कार हम चलाते हैं, उस पर निर्भर नहीं है। ये चीजें आपके जीवन को आरामदेह और सुविधाजनक बनाती हैं, मगर आपके जीवन का असली गुण तो इससे तय होता है कि आप अपने भीतर कैसे हैं।
खुशी और शांति के साथ जीवन जीना आपके लिए कोई नई बात नहीं है। जब आप छोटे थे, तो आप ऐसे ही थे। इसलिए मैं आपको कहीं आगे ले जाने की बात नहीं कर रहा हूं, मैं बस आपके जीवन के शुरुआती बिंदु से शुरू करने की बात कर रहा हूं।

सूत्र 6: विनम्रता बुद्धिमानी है

एक मूर्ख और एक बुद्धिमान इंसान में यही अंतर है कि बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि वह कितना मूर्ख है, मगर मूर्ख यह नहीं जानता। अपनी मूर्खता को पहचानना बहुत बड़ी बुद्धिमानी है। इस अस्तित्व की किसी भी चीज को – चाहे वह पेड़ हो, घास की एक पत्ती हो, धूल का एक कण हो, एक परमाणु हो – क्या आप इनमें से किसी भी चीज को पूरी तरह जानते हैं? नहीं जानते हैं। जब आपकी बुद्धिमानी और बोध का स्तर यह है, तो दुनिया में आपको कैसे चलना चाहिए? आराम से, थोड़ी विनम्रता और अपने आस-पास की हर चीज के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना के साथ। अगर प्रेम नहीं तो कम से आश्चर्य की भावना होनी चाहिए क्योंकि आप इस दुनिया की किसी भी चीज को नहीं समझते।
अगर आप सिर्फ इस तरह चलना सीख लें, तो आप आध्यात्मिक प्रक्रिया से बचे नहीं रह सकते। आपको किसी सीख या प्रवचन की जरूरत नहीं होगी। आध्यात्मिक प्रक्रिया आपके साथ वैसे भी घटित होगी। यही वजह है कि पूरब की संस्कृतियों में हमेशा आपको हर चीज के सामने सिर झुकाना सिखाया जाता है, चाहे वह कोई चट्टान हो, पशु हो या इंसान हो। जिस धरती पर आप चलते हैं, जिस हवा में सांस लेते हैं, जिस जल को पीते हैं, जिस भोजन को खाते हैं, जिन लोगों के संपर्क में आते हैं और अपने शरीर तथा मन समेत जिन चीजों का इस्तेमाल करते हैं, उनके प्रति सम्मान का भाव रखने से आपको अपनी हर कोशिश में सफलता मिलती है।

सूत्र 7: जैसे को तैसा देखिए

जिसे आप अपने भीतर की दुनिया कहते हैं, वह सिर्फ आपके आसपास की दुनिया का प्रतिबिंब होना चाहिए। हालांकि यह सोच पूरी तरह से उन नैतिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं, जो कहते हैं कि बाहरी और भीतरी दुनिया का एक दूसरे से संपर्क नहीं होना चाहिए, वरना आप अपने आप-पास की चीजों से तुरंत प्रभावित होकर भ्रष्ट हो जाएंगे। यह सच नहीं है। आप अपने आसपास की चीजों से तभी भ्रष्ट होते हैं, जब आप हर चीज के बारे में अपनी राय बना लेते हैं।
आप एक चीज को अच्छा मानते हैं और दूसरे को खराब। जिसे आप अच्छा मानते हैं, उससे आप जुड़ जाते हैं। जबकि जिसे आप खराब मानते हैं, उससे तुरंत छुटकारा पाना चाहते हैं। और फिर ये चीजें आपको भीतर से संचालित करने लगती हैं। यह तरीका ठीक नहीं है। आपको अपने भीतर से इस तरह होना चाहिए कि जो चीज जैसी है, आप उसे उसी रूप में देख पाएं। अगर आप किसी चीज को, जैसी वह है, उससे अलग होकर देखते हैं तो इसका मतलब है कि आप अपनी राय और पूर्वाग्रहों से दुनिया में मिलावट करने की कोशिश कर रहे हैं।
स्रष्टा ने सृष्टि की रचना इस तरह की है कि उसे उसी तौर पर देखा जाए जैसी वह वाकई है,  इसे वैसा बनाने की कोशिश मत कीजिए, जैसा आप इसे देखना चाहते हैं। यह एक अभद्रता है, फूहड़ता है, जिसे मानव जाति लगातार स्रष्टा की रचना के साथ करती आ रही है। यह सृष्टि अपने आप में इतनी शानदार रचना है, कि इसमें आपके करने के लिए बचा ही क्या है? अगर आप कुछ कर सकते हैं तो बस इसे अपने भीतर आत्मसात करने की कोशिश कीजिए। हालांकि वह भी आसान नहीं है, क्योंकि यह सृष्टि असाधारण रूप से बहुस्तरीय है। यहां एक के भीतर एक बहुत सारी असाधारण घटनाएं भी घटित हो रही हैं जो सब एक साथ, एक ही जगह और एक ही वक्त पर हो रही हैं।
हर चीज जिसे आप अतीत या भविष्य समझते हैं, वह सब यहीं पर है। अगर आप हर चीज को उस तरह देखेंगे, जैसी वह वाकई है, अगर यह पूरी सृष्टि आपके भीतर प्रतिबिंबित होने लगेगी, अगर आप अपने भीतर इस सृष्टि को उसी रूप में समा सकें,  जैसी यह है, तो आप सृष्टि के स्रोत ही बन जाएंगे। भीतर और बाहर से इंसान को ऐसा ही होना चाहिए।


June 13, 2016

Does God intend human beings to have only one partner in their lifetime? Is it better for a person to maintain an exclusive, committed relationship?

Questioner: Does God intend human beings to have only one partner in their lifetime? Is it better for a person to maintain an exclusive, committed relationship?
Sadhguru: God may not have intentions for you. The question is, what is the sensible thing for you to do? There are two aspects to this – one is a social one. Generally, they always said “one man – one woman” in order to stabilize society. In parts of the world where they said “one man – several women,” they had to rule with a stronger hand to keep society stable. I will not go further into this.
The other aspect is, all substances in existence have memory. Your body still actively remembers what happened a million years ago. Genetics is just memory. In Indian culture, this physical memory is called runanu bandha. It is your memory that binds you to things around you. Suppose you went home and you forgot who your father and mother are, what would you do? It is not the blood or the love, it is the memory that tells you this person is your mother or father. It is only memory that breeds relationship and bondage. If you lose your memory, anyone will look like an absolute stranger to you.
Your mind’s memory is miniscule compared to your body’s memory. If you just touch something or someone once, the mind might forget, but in the body, it is registered forever. Whenpeople have sex with each other, the mind may forget it, but the body will never forget. If you get a divorce, no matter how much you hate your spouse – still you will go through pain because the physical memory can never be lost.
Even if you just hold someone’s hand intimately enough for a certain period of time, this will never be forgotten, because your palms and your soles are very effective receptors. Whenever you see somebody you do not want to get involved and entangled with, just do “Namaskar,” because when you bring your two hands together (or you bring your big toes together), it stops the body from soaking in memory.
The idea is to keep the physical memory to the minimum because otherwise, taking you to a different level of experience becomes difficult. Those who have indulged excessively in pleasure have a certain grin on their face that is of a leery superiority, but there is no joy in them. It takes a lot of work to get rid of that, because physical memory entangles you in a way that your mind cannot even figure out. So it is very important that you learn to be conscious about what you expose your body to.

The price to be paid

There is a price to pay for too much intimacy all over the place – unless you know how to keep the body at a distance from yourself. For such a person it does not matter what he does. But such a person has no inclination to do such things. He is not compelled by the limitations and compulsions of the body – he is using the body as a tool. Otherwise, it is best to limit intimacy to the minimum. That is why we said one to one, unless one of them dies and the other one remarries. But now, before you are 25, you had 25 partners – people are already paying the price for that – 10% of the population in the United States is on antidepressants. One major contributing factor is they do not know where they belong, because the body is confused.
The body needs stable memory – people feel this. Their spouse may not be physically great or intellectually great, they may be quarreling on the surface, but still they would sacrifice anything to be with them, because somewhere, they understand that this gives them maximum comfort and wellbeing. This is because your physical memory rules your life much, much more than your mental memory. The very way you are right now is ruled by your physical memory, not by your mental memory. Mental memory can be thrown away tomorrow morning, but you cannot throw your physical memory away. That would require a completely different level of spiritual evolution within you.

Minimizing the physical memory

Modern science says this, and in the yogic system, we have always known this: the five elements – water, air, earth and so on – have astrong sense of memory. If I go to any place that is of some significance on an energy level, I do not ask people about it – I just place my hands on a rock. By being with it, I will know the whole story of the place. Like the rings of a tree tell you the ecological history of the place, rocks have an even better memory.
Generally, the denser the substance, the better its ability to retain memory, and inanimate substances have better memory than animate life. Today’s technology is proving it – your computer has better memory than you. The human mind is not for memory – it is for perception. The inanimate cannot perceive – it can only remember.Deities and other consecrated objects have been created because they are powerful forms of memory.
In India, there was a time when you could only enter a Shiva temple naked. Only after the British came into the country and started banning all these things, we have become very prudish. The idea of going naked to the temple was to take the memory of the Divine into the body. You take a dip and then lie down on the floor with wet body so that it soaks in memory of the Divine. The mind looks at other people, what is happening, but the body absorbs the energy of the space.
Both at the entrance of Dhyanalinga and Linga Bhairavi, there are sculptures of prostrating devotees. This is to show you that the body soaks in the Divine much better than the mind. It is just that human beings cannot go nude anymore because we have become so civilized – we put on so many clothes that we do not know whether there is a body or not. Only when sexual urges come up, people know that they have a body.

Erasing the physical memory

You can erase your physical memory through deep devotion or certain other practices. I have seen quite a few devotees like this, but one man really struck me. There was a woman who came down south to Kanyakumari, which is the southern tip of India. We do not know where exactly she came from, but looking at her face, probably from Nepal. She just walked around, never uttered a word, and always a bunch of dogs were following her. She would even steal food just to feed these dogs, and many times, she was beaten up for that. But then, people would sometimes find her floating on the waves. This was a coastal town where three oceans meet. She would go to the beach, sit cross-legged on the water, and float around. Then people started worshiping her. When she came, they would still protect their food, but they could not beat her anymore because she was something more.
Her whole life she had lived outdoors. She slept on the street or on the beach without any kind of shelter. She had a completely weather-beaten face – very similar to pictures you would have seen of old Native Americans. Towards the end of her life, when she was over 70, a famous South Indian musician saw her and became her devotee. He brought her to Salem, Tamil Nadu and built a small house for her there, and a few devotees gathered around her.
About 15, 16 years ago, I happened to be in a hill station near Salem. There, someone told me about this woman – her name was Mayamma. She was already dead by then. It was a full moon night, and they said there would be a pooja at Mayamma’s samadhi. I drove down with my wife and daughter, who was just about five or six at that time, to spend the evening there. It is the most unimpressive little place – a concrete samadhi. When I came there, it just hit me in the face – the very energy of that place was like an explosion. As we sat there, hours flew by. Later, there was a free dinner. A devotee of hers was serving us food. I looked at this man’s face and I could not believe it – he looked exactly like her! He was a South Indian man, but he looked like a Nepali woman. Out of devotion, his face had become almost like hers.
If you erase your physical memory, your body will become like that which matters most to you. The very shape of everything in you will change. That means you get rid of your genetic compulsions. When someone takessanyas, the first thing is to do a certain process for the parents and forefathers. Normally, we conduct this process for the dead, but for sanyasis, we do this even if the parents are still living. Not that we intend them to die – the idea is to wash off one’s physical memory.
When you were 18, you might have rebelled against your father and your mother, but by the time you are 45, whether you like it or not, you begin to talk like them and act like them. It is not just your parents – your forefathers are acting through you right now. Your behavior is generated and controlled by them. That is why, if you become serious about the spiritual process, the first step is to distance yourself from your genetic memory. Without doing that, you cannot get rid of the compulsions of your forefathers. They will live through you and rule you in so many ways.
When the memory of the body rules you to such an extent, it is better to keep it to the minimum in this lifetime. After all, you still have to get rid of a million years of memory from your forefathers. You have a reptilian brain – the crawling snake and the lizard, and even the scorpion still live through you. Do not think the brain is mind – the brain is body. At least in this lifetime, you want to limit these impressions so that your body does not get confused.
People who were aware of this context created spiritual processes in such a way that the body would become most conducive. Everywhere in the world, it is understood that if someone gets very serious about his spiritual process, the first thing that he does is keep away from all kinds of relationships, because if he builds any physical relationships, naturally, it will complicate things. Only if he is either so compulsive that he needs it, that you cannot take him beyond that right now, or he is so free that he does not identify with the body, we let him have it – otherwise, we generally say no. But if you must, at least stick to one body, because too many will confuse the physical system.


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There has been so much already written about brand archetypes and this is certainly not one more of those articles. In fact, this is rather ...