February 10, 2011


खजुराहो

विवरण खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त, छतरपुर ज़िले में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है।

खजुराहो वैसे तो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त, छतरपुर ज़िले में स्थित एक छोटा सा क़स्बा है लेकिन फिर भी भारत में, ताजमहल के बाद, सबसे ज़्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटन स्थलों में अगर कोई दूसरा नाम आता है तो वह है, खजुराहो। खजुराहो, भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। चंदेल शासकों ने इन मंदिरों की तामीर सन 900 से 1130 ईसवी के बीच करवाई थी। इतिहास में इन मंदिरों का सबसे पहला जो उल्लेख मिलता है,वह अबू रिहान अल बरूनी (1022 ईसवी) तथा अरब मुसाफ़िर इब्न बतूता का है।


खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशदरअसल यह क्षेत्र प्राचीन काल में वत्स के नाम से, मध्यकाल में जैजाक्भुक्ति नाम से तथा चौदहवीं सदी के बाद बुन्देलखन्ड के नाम से जाना गया। खजुराहो के चन्देल वंश का उत्थान दसवीं सदी के शुरू से माना जाता है। इनकी राजधानी प्रासादों, तालाबों तथा मंदिरों से परिपूर्ण थी। स्थानीय धारणाऑं के अनुसार तक़रीबन एक हज़ार साल पहले यहां के दरियादिल व कला पारखी चंदेल राजाओं ने क़रीब 84 बेजोड़ व लाजवाब मंदिरों की तामीर करवाई थी लेकिन उनमें से अभी तक सिर्फ़ 22 मंदिरों की ही खोज हो पाई है, यद्यपि दूसरे पुरावशेषों के प्रमाण प्राचीन टीलों तथा बिखरे वास्तुखंडों के रूप में आज भी खजुराहो तथा इसके आस पास देखे जा सकते हैं। पंद्रहवीं सदी के बाद इस इलाक़े की अहमियत ख़त्म होती गई।

सामान्य रूप से यहां के मंदिर बलुआ पत्थर से निर्मित किए गए हैं, लेकिन चौंसठ योगिनी, ब्रह्मा तथा ललगुआँ महादेव मंदिर ग्रेनाइट (कणाष्म) से निर्मित हैं। ये मंदिर शैव, वैष्णव तथा जैन संप्रदायों से सम्बंधित हैं। खजुराहो के मंदिरों का भूविन्यास तथा ऊर्ध्वविन्यास विशेष उल्लेखनीय है, जो मध्यभारत की स्थापत्यकला का बेहतरीन व विकसित नमूना पेश करते हैं। यहां मंदिर बिना किसी परकोटे के ऊंचे चबूतरे पर निर्मित किए गए हैं। आम तौर पर इन मंदिरों में गर्भगृह, अंतराल, मंडप तथा अर्ध मंडप देखे जा सकते हैं। खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला के उत्कृष्ट व विकसित नमूने हैं,यहां की प्रतिमाऐं विभिन्न भागों में विभाजित की गई हैं। जिनमें प्रमुख प्रतिमा परिवार, देवता एवं देवी देवता, अप्सरा, विविध प्रतिमाऐं, जिनमें मिथुन (सम्भोगरत) प्रतिमाऐं भी शामिल हैं तथा पशु व व्याल प्रतिमाऐं हैं, जिनका विकसित रूप कंदारिया महादेव मंदिर में देखा जा सकता है। सभी प्रकार की प्रतिमाओं का परिमार्जित रूप यहां स्थित मंदिरों में देखा जा सकता है। यहां मंदिरों में जड़ी हुई मिथुन प्रतिमाऐं सर्वोत्तम शिल्प की परिचायक हैं जो कि दर्शकों की भावनाओं को अत्यंत उद्वेलित व आकर्शित करती हैं और अपनी मूर्तिकला के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं। खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाके कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी हलचल है।


खजुराहो के प्रमुख मंदिरों में लक्ष्मण, विश्वनाथ, कंदारिया महादेव, जगदम्बी, चित्रगुप्त, दूल्हादेव,पार्श्वनाथ,आदिनाथ, वामन, जवारी, तथा चतुर्भुज इत्यादि हैं।


परिचय

अगर भारत में कहीं भी मंदिर स्थापत्य व वास्तु कला का रचनात्मक, अद्वितीय, विलक्षण, भव्य, राजसी, बेजोड़, लाजवाब, शानदार और शाही सृजन है ... तो वह है केवल और केवल खजुराहो में। खजुराहो चंदेल शासकों के प्राधिकार का प्रमुख स्‍थान था जिन्‍होंने यहाँ अनेकों तालाबों, शिल्‍पकला की भव्‍यता और वास्‍तुकलात्‍मक सुंदरता से सजे विशालकाय मंदिर बनवाए। यशोवर्मन[2] ने विष्‍णु का मंदिर बनवाया जो अब लक्ष्‍मण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है और यह चंदेल राजाओं की प्रतिष्‍ठा का दावा करने वाले इसके समय के एक उदाहरण के रूप में स्थित है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशविश्‍वनाथ, पार्श्‍व नाथ और वैद्य नाथ के मंदिर राजा डांगा के समय से हैं जो यशोवर्मन के उत्तरवर्ती थे। खजुराहो का सबसे बड़ा और महान मंदिर अनश्‍वर कंदारिया महादेव का है जिसे राजा गंडा[3] ने बनवाया है। इसके अलावा कुछ अन्‍य उदाहरण हैं जैसे कि वामन, आदि नाथ, जवारी, चतुर्भुज और दुल्‍हादेव कुछ छोटे किन्‍तु विस्‍तृत रूप से संकल्पित मंदिर हैं। खजुराहो का मंदिर समूह अपनी भव्‍य छतों (जगती) और कार्यात्‍मक रूप से प्रभावी योजनाओं के लिए भी उल्‍लेखनीय है। यहाँ की शिल्‍पकलाओं में धार्मिक छवियों के अलावा परिवार, पार्श्‍व, अवराणा देवता, दिकपाल और अप्‍सराएँ तथा सूर सुंदरियाँ भी हैं। यहाँ वेशभूषा और आभूषण भव्‍यता मनमोहक हैं।[4]

इतिहास

खजुराहो का प्राचीन नाम 'खर्जुरवाहक' है। 900 से 1150 ई. के बीच यह चन्देल राजपूतों के राजघरानों के संरक्षण में राजधानी और नगर था, जो एक विस्तृत क्षेत्र 'जेजाकभुक्ति' (अब मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र) के शासक थे। चन्देलों के राज्य की नींव आठवीं शती ई. में महोबा के चन्देल नरेश चंद्रवर्मा ने डाली थी। तब से लगभग पाँच शतियों तक चन्देलों की राज्यसत्ता जुझौति में स्थापित रही। इनका मुख्य दुर्ग कालिंजर तथा मुख्य अधिष्ठान महोबा में था। 11वीं शती के उत्तरार्द्ध में चन्देलों ने पहाड़ी क़िलों को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बना लिया। लेकिन खजुराहो का धार्मिक महत्व 14वीं शताब्दी तक बना रहा। इसी काल में अरबी यात्री इब्न बतूता यहाँ पर योगियों से मिलने आया था। खजुराहो धीरे-धीरे नगर से गाँव में परिवर्तित हो गया और फिर यह लगभग विस्मृति में खो गया।


यातायात

खजुराहो, महोबा से 54 किलोमीटर दक्षिण में, छतरपुर से 45 किलोमीटर पूर्व और सतना ज़िले से 105 किलोमीटर पश्‍चिम में स्‍थित है तथा निकटतम रेलवे स्‍टेशनों अर्थात् महोबा, सतना और झांसी से पक्‍की सड़कों से खजुराहो अच्‍छी तरह जुड़ा हुआ है।[5]

हवाई मार्ग खजुराहो के लिए दिल्ली, बनारस और आगरा से प्रतिदिन विमान–सेवा उपलब्ध रहती है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशरेल मार्ग दिल्ली से खजुराहो माणिकपुर होते हुए उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति ट्रेन से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, दिल्ली-चेन्नई रेल मार्ग पर पड़ने वाले स्टेशनों महोबा (61 किमी ), हरपालपुर (94 किमी ) और झांसी (172 किमी ) से भी ट्रेन बदलकर खजुराहो जाया जा सकता है।

बस मार्ग खजुराहो सतना, हरपालपुर, झांसी और महोबा से बस सेवा द्वारा जुड़ा हुआ है।

मन्दिरों की खोज

1838 में एक ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट को अपनी यात्रा के दौरान अपने कहारों से इसकी जानकारी मिली। उन्होंने जंगलों में लुप्त इन मन्दिरों की खोज़ की और उनका अलंकारिक विवरण बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के समक्ष प्रस्तुत किया। 1843 से 1847 के बीच छतरपुर के स्थानीय महाराजा ने इन मन्दिरों की मरम्मत कराई। जनरल अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने इस स्थान की 1852 के बाद कई यात्राएँ कीं और इन मन्दिरों का व्यवस्थाबद्ध वर्णन अपनी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट (आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट्स) में किया। खजुराहों के स्मारक अब भारत के पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की देखभाल और निरीक्षण में हैं। जिसने अनेक टीलों की खुदाई का कार्य करवाया है। इनमें लगभग 18 स्थानों की पहचान कर ली गई है। सन 1950-51 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद खजुराहो आए। इस दौरान यहां के निवासियों ने खजुराहो के विकास की रूप्रेखा उनके समक्ष रखी,उसके बाद वर्ष 1955 में पंडित जवाहर लाल नेहरू का भी खजुराहो आगमन हुआ। उन्होंने खजुराहो के मंदिरों की सराहना करते हुए इसके विकास की दिशा में क़दम उठाने का आश्वासन दिया। इन्हीं मंदिरों की वजह से खजुराहो पर्यटन स्थल के रूप में शीघ्र विकसित हुआ। आज विश्व पर्यटन के मानचित्र पर खजुराहो का विशिष्ट स्थान है। खजुराहो को यूनेस्को से 1986 ई. में विश्व धरोहर स्थल का दर्जा भी मिला। आधुनिक खजुराहो एक छोटा-सा गाँव है, जो होटलों और हवाई अड्डे के साथ पर्यटन व्यापार की सुविधा उपलब्ध कराता है।

कलात्मकता

खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना हैं। खजुराहो में चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए ख़ूबसूरत मंदिरो में की गई कलाकारी इतनी सजीव है कि कई बार मूर्तियाँ ख़ुद बोलती हुई मालूम देती हैं। दुनिया को भारत का खजुराहो के कलात्मक मंदिर एक अनमोल तोहफ़ा हैं। उस समय की भारतीय कला का परिचय इनमे पत्थर की सहायता से उकेरी गई कलात्मकता देती है। खजुराहो के मंदिरों को देखने के बाद कोई भी इन्हें बनाने वाले हाथों की तारीफ़ किए बिना नहीं रह सकता।

निर्माण के पीछे कथा

खजुराहो के मंदिरों के निर्माण के पीछे एक बेहद रोचक कथा है। कहा जाता है कि हेमवती एक ब्राह्मण पुजारी की बेटी थी। एक बार जब जंगल के तालाब में नहा रही थी, तो चंद्र देव यानी कि चंद्रमा उस पर मोहित हो गए और दोनों के एक बेटा हुआ।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशहेमवती ने अपने बेटे का नाम चंद्रवर्मन रखा। इसी चंद्रवर्मन ने बाद में चंदेल वंश की स्थापना की। चंद्रवर्मन का लालन-पालन उसकी मां ने जंगल में किया था। राजा बनने के बाद उसने मां का सपना पूरा करने की ठानी। उसकी मां चाहती थी कि मनुष्य की तमाम मुद्राओं को पत्थर पर उकेरा जाए। इस तरह चंद्रवर्मन की मां हेमवती की इच्छा स्वरूप इन ख़ूबसूरत मंदिरों का निर्माण हुआ। खजुराहो के ये मंदिर पूरी दुनिया के लिए एक धरोहर हैं।

सर्वोत्कृष्ट कलाकृतियाँ

वास्तु और मूर्तिकला की दृष्टि से खजुराहो के मन्दिरों को भारत की सर्वोत्कृष्ट कलाकृतियों में स्थान दिया जाता है। यहाँ की श्रृंगारिक मुद्राओं में अंकित मिथुन-मूर्तियों की कला पर सम्भवतः तांत्रिक प्रभाव है, किन्तु कला का जो निरावृत और अछूता सौदर्न्य इनके अंकन में निहित है, उसकी उपमा नहीं मिलती। इन मन्दिरों के अलंकरण और मनोहर आकार-प्रकार की तुलना में केवल भुवनेश्वर के मन्दिर की कला टिक सकती है। मुख्य मन्दिर तथा मण्डपों के शिखरों पर आमलक स्थित है। ये शिखर उत्तरोत्तर ऊँचे होते गए हैं, और इसलिए बड़े प्रभावोत्पादक तथा आकर्षक दिखाई देते हैं। मन्दिरों की मूर्तिकला की सराहना सभी पर्यवेक्षकों ने की है। मन्दिर का अपूर्व सौन्दर्य, काफ़ी विस्तार और चित्रकार की कूची को लज्जित करने वाला बारीक नक़्क़ाशी का काम देखकर चकित होना पड़ता है।


खजुराहो की मिथुन प्रतिमाऐं

इन मूर्तियों के बारे में भिन्न भिन्न व्याख्याऐं व विचार हैं। कुछ की मान्यता है कि ये प्रतिमाऐं समकालीन समाज की जर्जर व कमज़ोर नैतिकता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ की धारणा है कि यह कामशास्त्र के पौराणिक ग्रंथों के रत्यात्मक आसनों का निदर्शन है। यह भी माना जाता है कि ये प्रतिमाऐं, कुछ विशेष मध्यकालीन भारतीय पंथ जो कि कामुक कृत्य को धार्मिक प्रतीकवाद मानते थे, का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये लोग मोक्ष पाने के लिए योग तथा भोग दोनों ही मार्गों का अनुसरण करते रहे होंगे।


लक्ष्मण मन्दिर, खजुराहोयहां हमें यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि प्रारम्भिक काल से ही भारतीय कला, साहित्य तथा लोक परम्परा में सदा ही एक कामुक तत्त्व की उपस्थिति रही है। मिथुन (प्रेमी युगल) प्रतिमाऐं तो शुंग काल की मूर्तिकला तथा मृण्मूर्तियों में भी मौजूद थीं। इस कला ने अमरावती और मथुरा से शुरू होकर बाद की सभी कला शैलियों को अनुप्राणित किया।


बौद्ध धर्म

खजुराहो में विराजमान बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा के प्राप्त होने से यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का भी प्रचलन था, भले ही वह सीमित पैमाने पर ही क्यों न रहा हो। कनिंघम के मत में गंठाई नामक मन्दिर बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है, किन्तु यह तथ्य सत्य जान नहीं पड़ता।


हिन्दू धार्मिक प्रणाली

खजुराहो की हिन्दू धार्मिक प्रणाली तंत्र पर आधारित थी, लेकिन कापालिक सम्प्रदाय के खोपड़ी धारियों (शिव के कापाली स्वरूप के पूजक) से पृथक थी। ये लोग उग्र तांत्रिक नहीं थे, ये परम्परागत रूढ़िवादी और ब्राह्मणवादी धारा के थे, जो वैदिक पुनरुत्थान और पौराणिक तत्वों से प्रभावित थे, जैसा कि मन्दिरों के शिलालेखों से प्रमाण मिलता है।


पर्यटन स्थल

खजुराहो प्रसिद्ध पर्यटन और पुरातात्विक स्थल है। जिसमें हिन्दू व जैन मूर्तिकला से सुसज्जित 25 मन्दिर और तीन संग्रहालय हैं। 25 मन्दिरों में से 10 मंदिर विष्णु को समर्पित हैं, जिसमें उनका एक सशक्त मिश्रित स्वरूप वैकुण्ठ शामिल है। नौ मन्दिर शिव के, एक सूर्य देवता का, एक रहस्यमय योगिनियों (देवियों) का और पाँच मन्दिर दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के तीर्थकारों के हैं। खजुराहो के मन्दिर में तीन बड़े शिलालेख हैं, जो चन्देल नरेश गण्ड और यशोवर्मन के समय के हैं। 7वीं शती में चीनी यात्री युवानच्वांग ने खजुराहो की यात्रा की थी। उसने उस समय भी अनेक मन्दिरों को वहाँ पर देखा था। पिछली शती तक खजुराहो में सबसे अधिक संख्या में मन्दिर स्थित थे, किन्तु इस बीच वे नष्ट हो गए हैं।


पश्चिमी समूह के मंदिर

खजुराहो के पश्चिमी समूह में लक्ष्मण, कंदारिया महादेव, मतंगेश्वर, विश्वनाथ, लक्ष्मी, जगदम्बी, चित्रगुप्त, पार्वती तथा गणेश मंदिर आते हैं। यहीं पर वराह व नन्दी के मंडप भी हैं।


लक्ष्मण मंदिर

लक्ष्मण मन्दिर, खजुराहोयह वैष्णव मंदिर, पंचायतन शैली का संधार मंदिर है। इस मंदिर को 930 से 950 ईसवी के बीच, चंदेल शासक यशोवर्मन ने बनवाया था। इस मंदिर की लम्बाई 29 मीटर तथा चौड़ाई 13 मीटर है। स्थापत्य तथा वास्तु कला के आधार पर, बलुआ पत्थरों से बने मंदिरों में लक्ष्मण मंदिर सर्वोत्तम है। ऊंची जगत पर स्थित इस मंदिर के गर्भगृह में 1.3 मीटर ऊंची विष्णु की मूर्ति अलंकृत तोरण के बीच स्थित है। पूरा मंदिर एक ऊंची जगत पर स्थित होने के कारण मंदिर में विकसित इसके सभी भाग देखे जा सकते हैं। जिनके अर्धमंडप, मंडप, महामंडप, अंतराल तथा गर्भगृह में, मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रतिमाओं की दो पंक्तियां जिनमें देवी देवतागण, युग्म और मिथुन वगैरह हैं। मंदिर के बाहरी हिस्से की दीवारों तथा चबूतरे पर युद्ध, शिकार, हाथी, घोड़ों, सैनिक, अप्सराऑं और मिथुनाकृतियों के दृश्य अंकित हैं। सरदल के मध्य में लक्ष्मी है, जिसके दोनों ओर ब्रह्मा एवं विष्णु हैं।

विश्वनाथ मंदिर

आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व पंचायतन शैली में महाराजा धंगदेव वर्मन द्वारा बनवाए गए विश्वनाथ[6] मंदिर में तीन सिर वाले ब्रह्माजी की मूर्ति स्थापित है। अब इसका कुछ भाग खंडित हो चुका है। भारत देश में भगवान विष्णु और शिव शंकर के मंदिर तो बहुत जगह हैं, लेकिन ब्रह्मा जी के मंदिर देश में ढूंढने से भी नहीं मिलते हैं। मंदिर की उत्तरी दिशा में स्थित शेर और दक्षिणी दिशा में स्थित हाथी की प्रतिमाएँ काफ़ी सजीव लगती हैं। इनके अलावा एक नंदी की प्रतिमा भगवान की ओर मुँह किए हुए भी मौज़ूद है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशकंदारिया महादेव

कंदारिया महादेव मंदिर[7] खजुराहो के मंदिरों में सबसे बड़ा, ऊंचा और कलात्मक यही मंदिर है। यह मंदिर 109 फुट लम्बा, 60 फुट चौड़ा और 116 फुट ऊँचा है। इस मन्दिर के सभी भाग- अर्द्धमण्डप, मण्डप, महामण्डप, अन्तराल तथा गर्भगृह आदि, वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं। गर्भगृह चारों ओर से प्रदक्षिणापथ युक्त है। यह मंदिर शिव को समर्पित है तथा इस मंदिर में शिवलिंग के अलावा तमाम देवी-देवताओं की कलात्मक मूर्तियाँ मन मोह लेती हैं।

मन्दिर के प्रत्येक भाग में केवल दो और तीन फुट ऊँची मूर्तियों की संख्या ही 872 है। छोटी मूर्तियाँ तो असंख्य हैं। पूरी समानुपातिक योजना, आकार, ख़ूबसूरत मूर्तिकला एवं भव्य वास्तुकला की वजह से यह मंदिर मध्य भारत में अपनी तरह का शानदार मंदिर है।

मंदिर में सोपान द्वारा अलंकृत कीर्तिमुख, नृत्य दृश्य युक्त तोरण द्वार से प्रवेश किया जा साकता है। बाहर से देखने पर इसका मुख्य द्वार एक गुफ़ा यानी कि कंदरा जैसा नज़र आता है, शायद इसीलिए इस मंदिर का नाम कंदारिया महादेव पड़ा है। गर्भगृह के सरदल पर विष्णु, उनके दाऎं ब्रह्मा एवं बाऎं शिव दिखाए गए हैं। कुछ अन्य मंदिरों की तरह इस मंदिर की भी यह विशेशता है कि अगर कुछ दूर से आप इसे देखें तो आपको लगेगा कि आप सैंड स्टोन से बने मंदिर को नहीं बल्कि चंदन की लकड़ी पर तराशी गई कोई भव्य कृति देख रहे हैं। अब सवाल उठता है कि अगर यह मंदिर बलुआ पत्थर से बना है तो फिर मूर्तियों, दीवारों और स्तम्भों में इतनी चमक कैसे, दरअसल यह चमक आई है चमड़े से ज़बरदस्त घिसाई करने के कारण। अपनी तरह के इस अनोखे मंदिर की दीवारें और स्तम्भ इतने ख़ूबसूरत बने हुए हैं कि पर्यटक उन्हें देखकर हैरान रह जाते हैं।

चित्रगुप्त मंदिर

चित्रगुप्त मन्दिर पूर्व की ओर मुख वाला मंदिर है। यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। इस मंदिर के अंदर 5 फुट ऊँचे सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा मनमोहक है। इस मंदिर की दीवारों पर राजाओं के शिकार और उनकी सभाओं में समूह नृत्य के दृश्य काफ़ी ख़ूबसूरती के साथ उकेरे गए हैं। इससे चंदेल राजाओं की संपन्नता का पता लगता है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशजगदंबी मंदिर

राजा गंडदेव वर्मन द्वारा निर्मित यह मंदिर चित्रगुप्त मंदिर के ही समीप स्थित है। विष्णु भगवान के इस मंदिर में सैकड़ों वर्ष बाद छतरपुर के महाराजा ने यहाँ पर पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई थी, इसीलिए इसे ‘जगदंबी मंदिर’ कहा जाता है।

मतंगेश्वर मंदिर

राजा हर्षवर्मन द्वारा सन् 920 ईसवी में बनवाया गया यह मंदिर खजुराहो में चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए सभी मंदिरों में सबसे पुराना माना जाता है। यहाँ के सभी पुराने मंदिरों में यही एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ अभी भी पूजा–अर्चना की जाती है।[8]

चौंसठ योगिनी मन्दिर

खजुराहो में 64 योगिनियों का खुला मन्दिर[9] खुरदुरे ग्रेनाइट पत्थर का बना हुआ है। उत्तरमुखी इस मन्दिर का निर्माण 900 ईसवी में माना जाता है। जबकि 10वीं शताब्दी के मध्य में बने नागर शैली के उत्कृष्ट मन्दिर, चिकने बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। यहां से ब्रह्माणी, इंद्राणी व महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमाऐं प्राप्त हुई हैं।

पूर्वी समूह के मन्दिर

पूर्वी समूह के मंदिरों में हैं - ब्रह्मा, वामन, जवारी व हनुमान मन्दिर ... और जैन मंदिरों में हैं - पार्श्वनाथ, आदिनाथ व घंटाई मंदिर।

वामन मन्दिर

खजुराहो, मध्य प्रदेशयह मंदिर विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। इसके भू-विन्यास में सप्तरथ, गर्भगृह, अंतराल, महामंन्डप तथा मुखमंडप हैं। इसका गर्भगृह निरंधार है तथा चतुर्भुज वामन की प्रतिमा स्थापित की हुई है। जिनके दोनो ओर क्रमशः चक्रपुरुष व शंखपुरुष हैं। इस मंदिर के महामण्डप की छत पश्चिमी भारत के मध्यकालीन मंदिरों के समान संवर्ण शैली के अनुरूप हैं। मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार सप्त शाखाऔं से अलंकृत हैं। जो लता, पुष्प, नृत्यरत गण, मिथुन, कमला पुरुष, कुण्डलीयुक्त नारी की आकृति से सुसज्जित हैं।


प्रवेश द्वार के निचले हिस्से में स्त्री परिचर व द्वारपाल सहित गंगा और यमुना को त्रिभंग में बताया गया है, जो हाथों में कलश तथा मालाऐं लिए हुए हैं।

सरदल के मध्य भाग में चतुर्भुज विष्णु तथा दोनों ओर आलियों में ब्रह्मा और विष्णु किए गए हैं। मंदिर के मध्य भाग में प्रतिमाओं की दो पंक्तियां हैं,जिनका आकर्षण सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएं हैं। साथ ही गर्भगृह के बाहरी भाग पर प्रमुख आलियों में वराह व नृसिंह वामन की प्रतिमाऐं लगी हुई हैं।

जवारी मन्दिर

सन 1075 से 1100 ईसवी के बीच निर्मित इस मंदिर की सानुपातिक संरचना के प्रदक्षिणापथविहीन, गर्भगृह, अंतराल तथा मंडप विद्यमान है। यह उत्कृष्ट मकरतोरण तथा सुंदर शिखर से अलंकृत है तथा बाह्य दीवारें सुंदर प्रतिमाओं से सुसज्जित हैं जो कि तीन पंक्तियों में उत्कीर्ण हैं। यह मंदिर खजुराहो के चतुर्भुज मंदिर से निकट साम्य रखता है। इसके अलावा अन्य विशेषताऐं मध्य भारत की मध्य युगीन मंदिर संरचना से समानता रखती हैं।



हनुमान मंदिर

खजुराहो एक ऐसा धार्मिक केन्द्र था, जहाँ कई सम्प्रदाय फले-फूले थे। खजुराहो की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर हनुमान की 3 मीटर ऊंची प्रतिमा एक चबूतरे पर स्थित है। इस मूर्ति का महत्व इसलिए भी है क्यों कि यहां जो शिला लेख उत्कीर्ण है वह 922 ईसवी का है। इस हिसाब से खजुराहो का यह सबसे पुराना मंदिर है।

प्रतिभा व स्थापत्य शैली के आधार पर इस मंदिर का निर्माण काल तक़रीबन 1050 से 1075 ईसवी के बीच निर्धारित किया गया है।

जैन मन्दिर

खजुराहो में जो मन्दिर बनवाए गए उनमें से तीस आज भी स्थित हैं। इन मंदिरों में आठ जैन मन्दिर हैं। जैन मन्दिरों की वास्तुकला अन्य मन्दिरों के शिल्प से मिलती-जुलती है। सबसे बड़ा मन्दिर पार्श्वनाथ का है, जिसका निर्माण काल 950-1050 ई. है। यह 62 फुट लम्बा और 31 फुट चौड़ा है। इसकी बाहरी भित्तियों पर तीन पंक्तियों में जैन मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।

पार्श्वनाथ मंदिर

खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाके कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी जुंबिश नज़र आती है।

खजुराहो में जितने भी प्राचीन जैन मंदिर हैं, उनमें से यह सबसे सुंदर, विशाल व भव्य है। यह अपने भू विन्यास में विशिष्ट है। हां ...यह मंदिर साधारण है, लेकिन फिर भी इसमें किसी भी प्रकार का वातायन नहीं है। इसकी अन्य विशेषता यह है कि इसके गर्भगृह के पीछे एक और छोटा मंदिर भी जुड़ा है। दूसरे अर्थों में यह कहा जा सकता है कि यह विकसित खजुराहो (चंदेल) शैली का एक मंदिर है जिसमें अद्भुत अलंकरण तथा प्रतिमाऑं की सौम्यता दृष्ट्व्य होती है। इस मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी के मध्य हुआ था। मूलरूप से यह मंदिर प्रथम तीर्थंकर को समर्पित किया गया था।

आदिनाथ मंदिर

इस मंदिर के गर्भगृह में आदिनाथ प्रतिमा स्थापित होने के कारण यह जैन मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह निरंधार शैली का मंदिर है जिसमें मंडप तथा अर्धमंडप रहा होगा जो कि वर्तमान में पूर्ण रूप से नष्ट हो चुका है। आजकल इस में गर्भगृह तथा अंतराल हैं। इसके साथ ही वर्तमान समय में निर्मित मेहराबदार निर्माण देखा जा सकता है। जिसके अंदर गुम्बदनुमा छत है जो कि प्राचीन निर्माण से जुड़ी है। यह मंदिर सप्तरथ है एवं इसका भूविन्यास वामन मंदिर जैसा है, फिर भी यह मंदिर अत्याधिक विकसित शैली का है। इसका शिखर तथा जंघा भाग वामन मंदिर के समान ही अलंकृत है। शैली के आधार पर यह मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में निर्मित हुआ था।

दक्षिणी समूह के मंदिर

खजुराहो के दक्षिणी समूह के मंदिरों में आते हैं चतुर्भुज और दूल्हादेव मंदिर।

चतुर्भुज मंदिर

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशइस मंदिर में प्रदक्षिणा पथ रहित गर्भगृह, अंतराल, मंडप तथा मुखमंडप है। यह मंदिर एक साधारण चबूतरे पर स्थित है। खजुराहो में यह एक ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन मूर्तियों का अभाव है। दीवार के चारों तरफ़ मूर्तियों की तीन श्रंखलाऐं हैं, जिनमें से ऊपरी पंक्ति में अंकित विद्याधरों की प्रतिमाओं के अलावा अन्य सभी प्रतिमाऐं एक जैसी हैं, जो कि शिल्पकला में हुए पतन का द्योतक है। दीवारों में जड़ी प्रतिमाऑं के अंतर्गत प्रथम पंक्ति में दिक्पाल की प्रतिमाऐं मध्य भाग में अष्ट बसु तथा शेष पंक्तियों में अप्सराऔं का अंकन है। आलियों में व्याल विशेष उल्लेखनीय हैं। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के निचले भाग में त्रिभंग मुद्रा में गंगा, यमुना व द्वारपालों को प्रदर्शित किया गया है। इस मन्दिर के गर्भगृह में शिव की दक्षिणा मूर्ति स्थापित है, जिनकी मुखाकृति शांतभाव परिलक्षित करती है।

इस मंदिर का निर्माण काल सन 1100 ईसवी माना जाता है।

लाइट एंड साउंड शो

खजुराहो जैसी ऐतिहासिक जगह पर घूमने के बाद भी पर्यटकों के मन में इसके इतिहास से जुड़े कई सवाल अधूरे रह जाते हैं। पर्यटकों की तमाम शंकाओं के समाधान के लिए खजुराहो में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया जाता है। इस शो में चंदेल राजाओं के वैभवशाली इतिहास से लेकर इन अप्रतिम मंदिरों के निर्माण की कहानी बताई जाती है। वेस्टर्न ग्रुप के मंदिरों के पास ही बने एक कॉम्पलेक्स में 50 मिनट तक चलने वाले एक शो में सुपर स्टार अमिताभ बच्चन अपनी आवाज में दर्शकों को खजुराहो के गौरवशाली इतिहास से रूबरू कराते हैं। ये शो रोजाना शाम को हिंदी और अंग्रेज़ी में चलाए जाते हैं।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशस्टेट म्यूज़ियम और ट्राइबल एंड फ़ोक आर्ट्स

यह संग्रहालय 'चंदेल कल्चरल कॉम्पलेक्स' में स्थित है। इस संग्रहालय में पूरे मध्य प्रदेश की आदिवासी जनजातियों की लोक कला के नमूने रखे गए हैं। मध्य प्रदेश सरकार के इस संग्रहालय में टेराकोटा, धातु शिल्प, काष्ठ शिल्प, आदिवासी और लोक चित्रकारी, टैटू, ज़ेवर और मुखौटों के 500 से ज़्यादा नमूने मौजूद हैं। यह संग्रहालय सोमवार और सरकारी छुट्टियों के अलावा रोजाना 12 बजे से 8 बजे तक खुलता है।

खजुराहो नृत्य समारोह

हर साल फ़रवरी - मार्च में खजुराहो में एक नृत्य समारोह का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस सास्कृतिक कार्यक्रम के लिए खजुराहो के मंदिरों के पश्चिमी समूह को एक पृष्ठपट की तरह इस्तैमाल किया जाता है। भारत का हर शास्त्रीय नर्तक इस भव्य समारोह में हिस्सा लेना अपना सौभाग्य समझता है।

रनेह जल प्रपात (रनेह फ़ॉल्स) तथा केन घड़ियाल अभयारण्य

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशरनेह (कृपया इसे "स्नेह" न समझें) प्रपात खजुराहो से केवल 19 किलो मीटर दूर है और यह वहीं स्थित है जहां से केन घड़ियाल अभयारण्य शुरू होता है। दरअसल केन घड़ियाल अभयारण्य में घड़ियाल स्थानीय नहीं हैं बल्कि लखनऊ से लाकर डाले गए हैं।

जिन चट्टानों पर रनेह जल प्रपात गिरता और बहता है, वे रंग बिरंगे ग्रेनाइटों से बनी हैं। यह चट्टानें लाल, नीले, फ़िरोज़ी और काले रंग में इतनी अद्भुत लगती हैं कि बिना इन्हें देखे इनकी भव्यता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके अलावा वहीं एक ज्वालामुख (क्रेटर) भी है, रनेह जल प्रपात जब रंगीन चट्टानों से गिरता हुआ इस ज्वालामुख से गुज़रता है तो बस वह नज़ारा देखते ही बनता है।

पन्ना नेशनल पार्क

पन्ना नेशनल पार्क खजुराहो से मात्र 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केन नदी के किनारे स्थित यह नेशनल पार्क खजुराहो से सिर्फ आधा घंटे की दूरी पर है। पन्ना नेशनल पार्क में आप शेर के अलावा, चीता, भेड़िया और घड़ियाल देख सकते हैं। इसके अलावा, यहाँ नीलगाय, सांभर और चिंकारा के झुंड अक्सर घूमते नज़र आ जाते हैं। यहीं एक भव्य जलप्रपात तथा कुछ ग़ुफ़ाएं हैं जिन्हें पांडव जल प्रपात (पांडव फ़ॉल्स) तथा पांडव गुफ़ाऑं के नाम से जाना जाता है। [10]

पांडव (फ़ॉल्स) जल प्रपात

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में स्थित पांडव फ़ॉल्स घने जंगलों से घिरा है तथा खजुराहो से यह लगभग 34 किलोमीटर दूर है। 98 फ़ुट से भी अधिक ऊंचाई से अनवरत गिरती एक मोटी जलधारा,पांडव गुफाओं की शोभा को और भी बढ़ा देती है। माना जाता है कि यहां पांडव आकर ठहरे थे। पौराणिक के साथ साथ इस स्थान का महत्व ऐतिहासिक भी है क्यों कि स्वतंत्रता सैनानी चंद्रशेखर आज़ाद ने यहां एक गुप्त गोष्ठी की थी।

खजुराहो में नई खोजें

इससे तो हम वाकिफ़ हैं ही कि खजुराहो के दृश्यपटल पर 22 मंदिर दिखाई देते हैं लेकिन सच्चाई और यथातथ्यता उन मंदिरों की अभिनिश्चित करनी थी जिनकी संख्या अनुश्रुति के अनुसार 84 बताई जाती है और जो दिखाई नहीं देते। तो इस कार्य को सम्पन्न करने का बीड़ा 1980 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने उठया और मंदिरों की खोज आरम्भ करदी। अब तक वे 18 प्राचीन टीलों को खोज निकालने में क़ामयाब रहे हैं। मार्च 1999 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण एक ऐसे टीले को खोजने में सफल हुआ जो कि अ‍गर ध्वस्त न हुआ होता तो वह खजुराहो का सबसे बड़ा मंदिर होता। इस का नाम है बीजमंडल और आश्चर्यजनक बात यह है कि यह कंदारिया महादेव मंदिर से चार मीटर बड़ा है।

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February 04, 2011

हिंदुत्व: धर्म या जीवन पद्धति
                                       धर्म ही सिखाता है कैसे जीएँ

हिंदुत्व के चार सिद्धांत (पुरुषार्थ):- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।




तर्क का काम वेश्याओं की तरह होता है। जिनके पास ताकत होती है उनका तर्क चलता है फिर भले ही वे कुतर्क कर रहे हों। तर्क से अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा सिद्ध किया जा सकता है। तर्क के आगे तथ्‍य और तत्व कमजोर सिद्ध होता आया है।

यदि यह कहा जाए कि हिंदुत्व धर्म है और धर्म से ही जीवन पद्धति मिलती है तो इसके खिलाफ तर्क जुटाए जा सकते हैं और यह कहा जाए कि हिंदुत्व धर्म नहीं जीवन पद्धति है, तो फिर इसके खिलाफ भी तर्क जुटाए जा सकते हैं। किंतु शास्त्र कहते हैं कि धर्म की बातें तर्क से परे होती हैं। बहस से परे होती हैं।

हिंदू धर्मग्रंथ को पढ़कर समझने वाले ही धर्म को जानते हैं और फिर उस पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने, बहस करने से कतराते हैं। करते भी हैं तो कहते हैं कि ऐसा वेद, उपनिषद या गीता में लिखा है, यह मेरा मत नहीं है। धर्म पर किसी भी प्रकार की बहस नहीं होती। बहस करने वाले लोग अधूरे ज्ञान के शिकार होते हैं। अधूरा ज्ञान गफलत पैदा करता है।

हिंदुत्व को लेकर मनमानी व्याख्याओं और टिप्पणियों का दौर बहुत समय से रहा है। वर्तमान में आरएसएस और भाजपा में इसको लेकर गफलत की स्थिति है। आरएसएस के मुखिया अपने शिविरों में हिंदुत्व की परिभाषा व्यक्त करते रहते हैं। उनकी परिभाषा गोलवरकरजी और हेडगेवारजी से निकलती है।

सर संघचालक मोहन भागवत ने संघ मुख्यालय पर एक महीने तक चले प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

इससे यह प्रतिध्वनित होता है कि इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध और जैन सभी धर्म है। धर्म अर्थात आध्यात्मिक मार्ग, मोक्ष मार्ग। धर्म अर्थात जो सबको धारण किए हुए हो। यह अस्तित्व और ईश्वर है। लेकिन हिंदुत्व तो धर्म नहीं है। जब धर्म नहीं है तो उसके कोई पैगंबर और अवतारी भी नहीं हो सकते। उसके धर्मग्रंथों को फिर धर्मग्रंथ कहना छोड़ो, उन्हें जीवन ग्रंथ कहो। गीता को धर्मग्रंथ मानना छोड़ दें? भगवान कृष्ण ने धर्म के लिए युद्ध लड़ा था कि जीवन के लिए?

जहाँ तक हम सभी धर्मों के धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं तो पता चलता है कि सभी धर्म जीवन जीने की पद्धति बताते हैं। यह बात अलग है कि वह पद्धति अलग-अलग है। फिर हिंदू धर्म कैसे धर्म नहीं हुआ? धर्म ही लोगों को जीवन जीने की पद्धति बताता है, अधर्म नहीं। क्यों संत-महात्मा गीताभवन में लोगों के समक्ष कहते हैं कि 'धर्म की जय हो-अधर्म का नाश हो'?

भ्रमित हिंदूजन :पिछले 10-15 वर्षों में हिंदुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिंदू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया जो आज भी जारी है।



भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परम्परा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, चालीसाएँ, प्रार्थनाएँ विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा पंडितों को पूजा जाता है।


आए दिन धर्म का मजाक उड़ाया जाता है, मसलन कि किसी ने लिख दी लालू चालीसा, किसी ने बना दिया अमिताभ का मंदिर। भगवत गीता को पढ़ने के अपने नियम और समय हैं किंतु अब तो कथावाचक चौराहों पर हर माह भागवत कथा का आयोजन करते हैं। यज्ञ के महत्व को समझे बगैर वेद विरुद्ध यज्ञ किए जाते हैं।

आचार्यों को अधिकार : धर्म पर बोलने का अधिकार सिर्फ उसे है तो आचार्य है। आचार्य वह होता है जो विधिवत रूप से हिंदू साधु सम्प्रदाय में दीक्षा लेकर धर्मग्रंथ अध्ययन और साधना करता है और फिर वह क्रमश: आगे बढ़कर आचार्य कहलाता है। हिंदू धर्म में भी साधुओं को श्रेणीबद्ध किया गया है। परमहंस की पदवी सबसे ऊपर मानी गई है। जो परमहंस होता है उसका वचन ही धर्म होता है। कथावाचकों और आमजन को अधिकार नहीं कि वे धर्म पर टिप्पणी करें।


वेद, उपनिषद और गीता में जो लिखा है आप उसे वैसा का वैसा ही कह सकते हैं लेकिन उस पर व्याख्या या टिप्पणी करने का अधिकार किसे है, इसके लिए भी शास्त्र मार्ग बताते हैं। फिर भी जो मनमानी व्याख्या या टिप्पणी करता है तो उसे रोकने का कोई उपाय नहीं, क्योंकि हिंदू धर्म हिंसक मार्ग नहीं बताता।


जीवन जीने की पद्धति : क्या आप मानते हैं कि ऑर्ट ऑफ लिविंग धर्म का हिस्सा नहीं है, जबकि धर्म ही बताता है जीवन को सही तरीके से जीने की पद्धति। क्या ध्यान और योग धर्म का हिस्सा नहीं है? धर्म और जीवन कैसे एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं, जबकि हिंदू धर्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अर्थात संसार और संन्यास का मार्ग विकसित किया गया है। उक्त सिद्धांत के आधार पर ही चार आश्रम विकसित किए गए थे।

भगवान राम की वंश परंपरा

हिंदू धर्म में राम को विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता है। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे।

मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी।

रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।

इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।

भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।

रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं। वा‍ल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।

February 02, 2011

आज़ाद भारत???


मित्रों मुझे तो अभी शंका ही है कि भारत आज़ाद है
क्यों कि भारत आज़ाद होता तो यहाँ किसी विदेशी के आने पर उससे पासपोर्ट और वीजा माँगा जाना चाहिए, किन्तु १९९७ में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबैथ के भारत आने पर पासपोर्ट नहीं लगा था वह बिना पासपोर्ट के भारत आई थी
१९४७ से पहले जब कोई ब्रीटिश अधिकारी या महारानी का भारत आना होता था तब उनसे पासपोर्ट पूछने वाला कोई नहीं था क्यों कि उस समय भारत इंग्लैण्ड का एक उपनिवेश था
किन्तु आज तो हम शायद भारत को आज़ाद कहते हैं न?

मित्रों आपको पता होगा कि आज के समय में जब चुनाव के बाद कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आती है तो शपथ ग्रहण समारोह के बाद नया प्रधान मंत्री एक कागज़ पर हस्ताक्षर करता है जिसे सत्ता का हस्तांतरण कहते हैं, और उस पर हस्ताक्षर करने के बाद पुरानी पार्टी को देश निकाला नहीं दिया जाता, उसे भी भारत में सामान अधिकार के साथ जीने का हक़ दिया जाता है क्यों कि उस पार्टी के नेता भी भारत के संविधान में भारत के नागरिक हैं, अत: जो अधिकार एक साधारण भारतीय के हैं वे पुरानी पार्टी के नेता के भी हैं क्यों कि हम आज़ाद हैं
मित्रों १९४७ में भी नेहरु ने उसी कागज़ (सत्ता का हस्तांतरण) पर हस्ताक्षर किया था और हमें यह बताया गया था कि अब हम अंग्रेजों से आज़ाद हो गए हैं तो अब महारानी को यह विशेषाधिकार क्यों दिया गया? मतलब महारानी आज भी भारत की नागरिक है, कौनसे क़ानून के अनुसार? १८९७ के Indian Citizenship Act के अनुसार
यह बात आपको लेख में कहीं समझ आ जाएगी




१९४६ में अंगेजों ने भारत को आज़ाद करने से पहले एक क़ानून बनाया था जिसका नाम है Indian independence Act. मित्रों आप में से कूछ राष्ट्रवादी यह बात जानते होंगे कि भारत और पाकिस्तान का विभाज़न हिन्दू या मुसलामानों की तरफ से नहीं अंग्रेजों की तरफ से हुआ था
अंग्रेजों द्वारा बनाए गए Indian independence Act में दो बातें हैं जो मै आपके सामने रखना चाहता हूँ


1. Two independent dominions India and Pakistan shall be set up in India.

2. Both dominions will be completely self governing in their internal affairs, foreign affairs and national security, but the British monarch will continue to be their head of state represented by the Governor General of India and a new Governor General of Pakistan.


मित्रों सबसे ज्यादा आपतिजनक ये दो बिंदु हैं, जिनमे साफ़ साफ़ लिखा है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत और पाकिस्तान दो Dominion States होंगे
मित्रों Dominion States का अर्थ कहीं से भी पता कर लो इसका अर्थ होता है एक बड़े राज्य के अधीन छोटे राज्य अर्थात भारत और पाकिस्तान आज भी ब्रिटेन के Dominion States हैं न कि Independent Nations. मित्रों Indian independence Act बाज़ार में शायद दस रुपये का मिलता है आप चाहें तो उसे खरीद कर पढ़ सकते हैं
पूरा क़ानून न भी पढ़ें केवल उसकी प्रस्तावना पढ़ लें आपको पता चल जाएगा कि क्यों ब्रिटेन की महारानी का नाम भारत के राष्ट्रपति से ऊपर लिखा जाता है? और आप में से शायद कुछ यह जानते होंगे कि आज भी Comman Wealth Contries में भारत और पाकिस्तान का नाम as a British Dominion States के रूप में लिखा हुआ है न कि as a Indian and Pakistan Republic, मतलब हम आज भी महारानी के Dominion States हैं
कहीं उसी क़ानून के अनुसार तो महारानी भारत में बिना पासपोर्ट के तो नहीं आई थी?

मित्रों यह एक बहुत ही गंभीर प्रश्न है जिसे आज़ादी से पहले ही नेहरु द्वारा उठाया जाना चाहिए था किन्तु नेहरु ने तो इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया
क्यों कि नेहरु एक सत्ता का भूखा आदमी था जो बड़ी ही चालाकी से भारत का प्रधान मंत्री बना
उसकी चालाकी के सम्बन्ध में मै आपको कुछ बताना चाहता हूँ
मित्रों आज़ादी से पहले Congress Working Committee की एक बैठक हुई थी जिसमे यह निर्णय लिया गया था कि नेहरु और सरदार पटेल के नाम पर कांग्रेस के सभी प्रदेश अध्यक्षों द्वारा चुनाव होगा और जिसके पक्ष में सबसे अधिक वोट पड़ेंगे वही कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभालेगा और वही आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री होगा
उस समय भारत में कांग्रेस के १५ प्रदेश अध्यक्ष थे जिनमे से १४ ने सरदार पटेल के समर्थन में अपना मत दिया था केवल एक मत नेहरु के पक्ष में था
क्यों कि कांग्रेस में नेहरु को पसंद नहीं किया जाता था, और पसंद इसलिए नहीं किया जाता था क्यों कि नेहरु चरस पीता था, नेहरु सिगरेट पीता था, नेहरु एक ऐयाश व्यक्ति था, नेहरु एक चरित्रहीन व्यक्ति था
माउंट बैटन की पत्नी से उसके सम्बन्ध छिपे नहीं हैं
आप चित्र देख सकते हैं
तो मित्रों Congress Working Committee के निर्णय के आधार पर सरदार पटेल जीत गए और नेहरु हार गया
और इसी निर्णय के आधार पर सरदार पटेल को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना तय हुआ और आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री भी सरदार पटेल को बनाना तय हुआ था
उस समय नेहरु की गद्दारी की एक घटना मै आपके सामने रखना चाहता हूँ
जिस व्यक्ति को हम जीवन भर चाचा नेहरु कहते रहे उसकी गद्दारी मुझे भी नहीं पता थी

मित्रों जैसा कि आप ने अभी पढ़ा कि कांग्रेस में नेहरु को कोई पसंद नहीं करता था किन्तु नेहरु को पसंद करने वालों में सबसे ऊपर थे अंग्रेज़ और उन्ही अंग्रेजों का नुमाइंदा माउंट बैटन
माउंट बैटन को भारत भेजने का मुख्य कारण ही यह था कि अंग्रेज़ नेहरु को फाँसना चाहते थे और यह काम किया माउंट बैटन और उसकी पत्नी ने
नेहरु कोई जन नेता नहीं था उसे तो अंग्रेजों ने मीडिया द्वारा प्रचारित किया और उसकी उज्वल छवि बनानी चाहि क्यों कि सभी अंग्रेज़ नेहरु के बारे में कहा करते थे कि यह आदमी शरीर से भारतीय है किन्तु इसकी आत्मा बिल्कुल अंग्रेज़ है, अंग्रेज़ भारत छोड़ भी दें तो नेहरु अंग्रेजों का शासन और उनके क़ानून भारत में चलाता रहेगा और भारत हमेशा के लिये British Domenion State बनकर रहेगा
चुनाव हारने के बाद जब नेहरु को लगा कि अब मेरी दाल नहीं गलने वाली तो वह गांधी जी के पास गया और उन्हें धमकाया कि अगर मै प्रधान मंत्री नहीं बना तो मै कांग्रेस में फूट दाल दूंगा
और उस समय गांधी जी शायद अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की
क्यों कि गांधी जी को लगा कि अगर कांग्रेस में फूट पड़ी तो अंग्रेजों को भारत ना छोड़ने का एक बहाना मिल जाएगा कि हम किस कांग्रेस के हाथ में सत्ता सौंपें, नेहरु वाली या सरदार पटेल वाली? और इसी कारण गांधी जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की और सरदार पटेल को एक पत्र लिखा और उसमे गांधी जी ने पटेल से अपना नाम प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार से वापस लेने की प्रार्थना की
और यह पत्र आप चाहें तो देख सकते हैं
गांधी वांग्मय के सौ अंक हैं जो भारत सरकार ने छापे और इनमे से अंतिम कुछ अंकों के आधार पर गांधी जी के सचीव कहे जाने वाले प्यारे मोहन ने एक किताब लिखी जिसका नाम है पूर्ण आहूति इस किताब में गांधी जी का यह पत्र भी है
पत्र पढने के बाद सरदार पटेल खुद गांधी जी के पास गए और उनसे कहा कि "बापू अगर आपकी अंतरात्मा कहती है तो मै तो आपका सेवक हूँ और यह पद मै नेहरु के लिये छोड़ सकता हूँ
" और सरदार पटेल ने दरियादिली दिखाते हुए आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री बनने का सौभाग्य छोड़ दिया और उसे हथिया लिया नेहरु ने
और उसी के बाद भारत पाकिस्तान के विभाज़न की बात सामने आई है, सरदार पटेल यदि प्रधान मंत्री होते तो ऐसा कभी नहीं होने देते क्यों कि भारत की छोटी छोटी रियासतों को एक करने का काम पटेल ने ही किया था और कश्मीर का विलय भी भारत में पटेल ने ही किया किन्तु नेहरु ने वहां भी टांग अडाई और कश्मीर में धारा ३७० लागू नहीं हुई
और उसी के कारण आज आधा कश्मीर पाकिस्तान के कब्ज़े में है, लद्दाख का कुछ भाग और तिब्बत आज चीन के कब्ज़े में है

और मित्रों आपमें से कूछ यह भी जानते होंगे कि कांग्रेस पार्टी एक अंग्रेज़ द्वारा ही बनाई गयी थी

सन १८८५ में मुंबई (उस समय बम्बई) में गोकुल दास तेजपाल भवन में Allan Octavian Hume द्वारा कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई थी
और यह पार्टी एक मनोरंजन क्लब के रूप में स्थापित की गयी थी
अंग्रेज कांग्रेस के बारे में कहा करते थे कि इस क्लब में हम उन भारतीयों को जमा करेंगे जिनके मन में कूछ बलबला है अर्थात देश को आज़ाद करवाने की इच्छा है, ताकि वह बलबला फूट कर कांग्रेस पार्टी में ही बाहर आ जाए, बाहर न जाने पाए
और इसीलिए अंग्रेज़ कांग्रेस को सेफ्टी वॉल्व कहा करते थे
वो तो सौभाग्य था देश का जो गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये
उनसे पहले तो कोई जानता तक नहीं था कि कांग्रेस जैसी कोई चीज़ भारत में है, गांधी जी ने इसमें प्राण फूंके, गांधी जी ने अन्न्ग्रेजों द्वारा बनाए गए इस क्लब को जन आन्दोलन का रूप दिया और बाद में खुद गांधी जी ने ही इस पार्टी से किनारा कर लिया, उन्होंने आजीवन कांग्रेस पार्टी का त्याग कर दिया
गांधी जी कांग्रेस पार्टी के सदस्य ही नहीं रहे थे
और अंतिम क्षणों में गांधी जी ने यहाँ तक कह डाला था कि इस कांग्रस को खत्म कर दो नहीं तो यह पार्टी देश को ऐसे ही लूटेगी जैसे कि अंग्रेजों ने लूटा है, क्यों कि गांधी जी नेहरु जैसों की नीयत भांप चुके थे
मित्रों गांधी जी की यह भविष्यवाणी भी सत्य सिद्ध हुई, घोटालों के रिकॉर्ड इस पार्टी ने पिछले ६३ वर्षों में कायम किये और ताज़ा तरीन मामला आप राष्ट्र मंडल खेलों का भी ले सकते हैं
नेहरु ने कांग्रेस को अपने बाप की जागीर बना डाला और इसी की संतानों ने देश को
वरना क्या वजह थी कि कांग्रेस पार्टी को प्रधान मंत्री के पद के लिये अपने घर के बाहर उम्मीदवार ही नहीं मिले
और जो मिले उन्हें खुद कांग्रेस ने ही ख़त्म कर डाला
लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण आप देख सकते हैं
क्यों कि इनकी जड़ तो नेहरु ही था

और आप जानते होंगे कि १४ अगस्त १९४७ की रात गांधी जी दिल्ली ही नहीं आये, वे नोआखाली में थे....
कांग्रेस के बड़े बड़े नेता गांधी जी को बुलाने गए किन्तु उन्होंने मन कर दिया और कहा कि मै मानता नहीं कि आज़ादी जैसी कोई चीज़ इस देश में आ रही है
यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का सौदा हुआ है
गांधी जी ने नोआखाली से ही एक Press Statement दिया था जो कि पूर्ण आहुति में छपा भी था कि "यह जो कथित आज़ादी आ रही है यह हमारा लक्ष्य नहीं था, यह आज़ादी मै नहीं चाहता था, ये तो सत्ता के लालची लोग ले कर आये हैं
" वरना क्या कारण था कि भारत की आज़ादी की क्रांति का सबसे बड़ा पुरोधा ही आज़ादी के जश्न में शामिल नहीं हुआ? क्यों कि सत्ता के हस्तांतरण पर नेहरु ने हस्ताक्षर किया था और भारत को एक British Domenion State बना डाला था
माउन्ट बैटन ने अपनी सत्ता नेहरु को सौंपी थी और हमें समझाया गया कि स्वराज आ गया है, किन्तु यह स्वराज नहीं था और शायद यही समझाने महारानी का भारत में आगमन बिना पासपोर्ट और वीजा के हुआ कि तुम अभी भी मेरे गुलाम ही हो.........

:-(







January 27, 2011

Five life lessons my driver taught me
-Prakash Iyer

He is MD, Kimberly-Clark Lever and Executive Coach. Iyer's book 'The Habit of Winning' will be released in February 2011

He is 58 years old, bespectacled with distinguished silver grey hair. He's spent 25 years working for one of India's most respected corporate houses. I have learnt a lot from him. But it is unlikely you would have ever heard of him. His name is Karunan. And he worked with me as my driver.
Sometimes, the biggest lessons in life come from very unlikely sources. And as Karunan spoke to me one morning about his life and times, I thought young people would benefit from listening to what he has to say. Since Karunan will probably never be invited to deliver a convocation speech or a commencement.

1. Getting a driving license does not make you a driver.
"I was 18 when I got my license. But it was only after several months of driving a car that I actually learnt to drive, and became a real driver." A license is only a permit -- and not a stamp of authority. An MBA does not make you a manager. It is only after you spend several more years learning on the job that you truly qualify to call yourself a manager.
Many young people confuse getting a degree as signifying the end of their learning. Wrong. It's just the beginning. A degree or a diploma -- the licence -- simply marks you out as someone qualified to learn from real life experiences. It doesn't make you an expert.


2. The real world is very different from a classroom

I learnt to drive a car. But my first job required me to drive a little tempo. The steering wheel was different, and so were the gears. I thought I knew how to drive -- but I couldn't even get the tempo started."


The world outside the classroom is a very different place. That's as true for engineers and MBAs and accountants as it is for drivers. Get ready to get surprised.

3. Slog. Get your hands dirty

I spent nights working as a cleaner. That's when I learnt all about the insides of an automobile. Knowing what's under the bonnet has made me a better driver today."


The brightest marketing professionals in the country will tell you that they learnt their biggest lessons in the days they spent slogging in small towns selling soaps or colas. There's no other way. If you want to be successful, work hard, dirty your hands -- and go beyond your specific role.

4. Initially, what you learn is more important than what you earn

In my first job, the pay was bad but the boss was good. He gave me opportunities to learn, make mistakes. I banged his tempo quite a bit. While the dents were quickly repaired, the lessons I learnt remain firmly etched in my mind."

In your first job -- don't worry about pay packet or the size of the organisation. Get a good boss. A good mentor. That's priceless


5. Don't worry about which car you drive. Focus on being a good driver.

I always wanted to drive the best cars -- but rather than complain about having to drive a tempo or a school van or the city transport bus, I focused on driving well. I told myself that if I do that, the good cars will come. And they did."


Now that's a great lesson. It's not about the company. It's about you. Do the best with what you have, wherever you are. Karunan spent 15 years struggling in odd jobs before landing a driver's job in one of India's largest companies. We could all benefit by staying focused on doing a great job -- rather than worrying about the next job, or the next promotion. Do a good job. Success and happiness will follow. Inevitably.

Those then are five fabulous life lessons from an unlikely guru. Follow Karunan's advice and I guarantee they'll make a difference to your career. And to your life!















January 25, 2011

यहूदी धर्म को जानें 


                                                                                                       प्राचीन धर्मों में से एक

आज से करीब 4000 साल पुराना यहूदी धर्म वर्तमान में इजराइल का राजधर्म है। दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई है। यहूदी एकेश्वरवाद में विश्वास करते हैं। मूर्ति पूजा को इस धर्म में पाप समझा जाता है।
अब्राहम : यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम) से मानी जाती है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे। पैगंबर अलै. अब्राहम के पहले बेटे का नाम हजरत इसहाक अलै. और दूसरे का नाम हजरत इस्माईल अलै. था। दोनों के पिता एक थे, किंतु माँ अलग-अलग थीं। हजरत इसहाक की माँ का नाम सराह था और हजरत इस्माईल की माँ हाजरा थीं।
पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। याकूब का ही दूसरा नाम इजरायल था। याकूब ने ही यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक सम्मिलित राष्ट्र इजरायल बनाया था।

याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा (जूदा) था। यहूदा के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म कहलाया। हजरत अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहम और अब्राहम से मूसा तक यहूदी, ईसाई और इस्लाम सभी के पैगंबर एक ही है किंतु मूसा के बाद यहूदियों को अपने अगले पैंगबर के आने का अब भी इंतजार है।

यहोवा : यहूदी अपने ईश्वर को यहवेह या यहोवा कहते हैं। यहूदी मानते हैं कि सबसे पहले ये नाम ईश्वर ने हजरत मूसा को सुनाया था। ये शब्द ईसाईयों और यहूदियों के धर्मग्रंथ बाइबिल के पुराने नियम में कई बार आता है।

धर्मग्रंथ : यहूदियों की धर्मभाषा 'इब्रानी' (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम 'तनख' है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया है। इसे 'तालमुद' या 'तोरा' भी कहते हैं। असल में ईसाइयों की बाइबिल में इस धर्मग्रंथ को शामिल करके इसे 'पुराना अहदनामा' अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट कहते हैं। तनख का रचनाकाल ई.पू. 444 से लेकर ई.पू. 100 के बीच का माना जाता है।

मूसा (मोजेस) : ईसा से लगभग 1,500 वर्ष पूर्व अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम 'पैगंबर मूसा' का है। मूसा ही यहूदी जाति के प्रमुख व्यवस्थाकार हैं। मूसा को ही पहले से ही चली आ रही एक परम्परा को स्थापित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है।

दस आदेश : मूसा मिस्र के फराओ के जमाने में हुए थे। ऐसा माना जाता है कि उनको उनकी माँ ने नील नदी में बहा दिया था। उनको फिर फराओ की पत्नी ने पाला था। बड़े होकर वे मिस्री राजकुमार बने। बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वे तो यहूदी हैं और उनका यहूदी राष्ट्र त्याचार सह रहा है और यहाँ यहूदी गुलाम है तो उन्होंने यहूदियों को इकठ्ठाकर उनमें नई जाग्रती लाई।

मूसा को ईश्वर द्वारा दस आदेश मिले थे। मूसा का एक पहाड़ पर परमेश्वर से साक्षात्कार हुआ और परमेश्वर की मदद से उन्होंने फराओ को हराकर यहूदियों को आजाद कराया और मिस्र से पुन: उनकी भूमि इसराइल में यहूदियों को पहुँचाया। इसके बाद मूसा ने इसराइल में इस्राइलियों को ईश्वर द्वारा मिले 'दस आदेश' दिए जो आज भी यहूदी धर्म के प्रमुख सैद्धांतिक है।


सुलेमान : अब्राहम और मूसा के बाद दाऊद और उसके बेटे सुलेमान को यहूदी धर्म में अधिक आदरणीय माना जाता है। सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इजरायल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान का यदूदि जाति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन 937 ई.पू. में सुलेमान की मृत्यु हुई।

यहूदी त्योहार : शुक्कोह, हुनक्का, पूरीम, रौशन-शनाह, पासओवर, योम किपुर।

यरुशलम : येरुशलम इसराइल देश की विवादित राजधानी है। इस पर यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म, तीनों ही दावा करते हैं, क्योंकि यहीं यहूदियों का पवित्र सुलैमानी मन्दिर हुआ करता था, जो अब एक दीवार मात्र है। यही शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रहा है। यहीं से हजरत मुहम्मद स्वर्ग गए थे। इसीलिए यह विवाद का केंद्र है। लेकिन असल में येरुशलम प्राचीन यहूदी राज्य का केंद्र और राजधानी रहा है। यही पर मूसा ने यहूदियों को धर्म की शिक्षा दी थी।

अन्य पैंगबर : आदम, अब्राहम के अलावा मान्यता है कि राजा 'मनु' को ही यहूदियों ने 'नूह' माना है। नूह ने ईश्वर के आदेश पर जल प्रलय के समय बड़ी-सी किश्ती बनाई थी और उसमें सृष्टि के सभी प्राणियों को रखकर सृष्टि को बचाया था। राजा मनु की कहानी भी ऐसी ही है।.see my blog (JAN,2011)

महान यहूदी : ईसा मसीह के बाद कलाकार एंजेलो, चित्रकार पाब्लो पिकासो, कार्ल मार्क्स और अल्बर्ट आइंसटीन के अलावा ऐसे सैकड़ों प्रसिद्ध यहूदी हुए हैं जिनका विज्ञान और व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहूदियों द्वारा मानव समाज के विकास में जो योगदान किया गया है उसे भूला नहीं जा सकता।


यहूदी इतिहास : यहूदी धर्म का इतिहास करीब 4000 साल पुराना माना जाता है। कहते हैं कि मिस्र के नील नदी से लेकर इराक के दजला-फरात नदी के बीच आरंभ हुआ यहूदी धर्म का इजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। मूसा से लेकर सुलेमान तक प्राचीन समय में ही यहूदियों का 'भारत' से गहरा संबंध रहा है इस बात के कई प्रमाण है।

मिस्र पर कुछ समय तक यदुवंशियों का भी राज रहा था। वैसे इसका प्रचीन धर्म इजिप्ट था। ऐसा माना जाता है कि पहले यहूदी मिस्र के बहुदेववादी इजिप्ट धर्म के राजा फराओ के शासन के अधिन रहते थे। बाद में मूसा के नेतृत्व में वे इजरायल आ गए। ईसा के 1100 साल पहले जैकब की 12 संतानों के आधार पर अलग-अलग यहूदी कबीले बने थे, जो दो गुटों में बँट गए। पहला 10 कबीलों का बना था वह इजरायल कहलाया और दूसरा जो बाकी के दो कबीलों से बना था वह जुडाया कहलाया। जुडाया पर बेबीलन का अधिकार हो गया। बाद में ई.पू. सन् 800 के आसपास यह असीरिया के अधीन चला गया। असीरिया प्राचीन मेसोपोटामिया का एक साम्राज्य था, जो यह दजला नदी के उपरी हिस्से में बसा था। 10 कबीलों का क्या हुआ पता नहीं चला।

फारस के हखामनी शासकों ने असीरियाइयों को ई.पू. 530 तक हरा दिया तो यह क्षेत्र फारसी शासन में आ गया। यूनानी विजेता सिकन्दर ने जब दारा तृतीय को ई.पू. 330 में हराया तो यहूदी लोग ग्रीक शासन में आ गए। सिकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस के साम्राज्य और उसके बाद रोमन साम्राज्य के अधीन रहने के बाद ईसाईयत का उदय हुआ। इसके बाद यहूदियों को यातनाएँ दी जान लगी।

7वीं सदी में इस्लाम के आगाज के बाद यहूदियों की मुश्किलें और बड़ गई। तुर्क और मामलुक शासन के समय यहूदियों को इजराइल से पलायन करना पड़ा। अंतत: यहूदियों के हाथ से अपना राष्ट्र जाता रहा। मई 1948 में इजराइल को फिर से यहूदियों का स्वतंत्र राष्ट्र बनाया गया। दुनिया भर में इधर-उधर बिखरे यहूदी आकर इजरायली क्षेत्रों में बसने लगे। वर्तमान में अरबों और फिलिस्तिनियों के साथ कई युद्धों में उलझा हुआ है एकमात्र यहूदी राष्ट्र इजरायल।
भारतीय संस्कृति और हज

* 'अयोध्या' का अर्थ होता है वह जगह जहाँ युद्ध, लड़ाई व झगड़ा न हो, शांति हो। यदि देखें तो मक्का स्थित काबा शरीफ का हरम भी अयोध्या ही है। वहाँ लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। बाप का हत्यारा भी सामने आ जाए तो वहाँ बदला नहीं ले सकते। झाड़, फूल-पत्ती व काँटे तोड़ना मना है।

शिकार खेलना, शिकार की ओर इशारा करना भी मना है। किसी भी जीव-जंतु को मारना मना है। सर की जूँ भी नहीं मार सकते। एहराम की हालत में ये सारी बातें वर्जित होती हैं। एहराम का कपड़ा, जो एक लुंगी और ऊपर एक कपड़ा लपेटा जाता है, है। इसी तरह भारतीय संस्कृति में भी बिना सिला कपड़ा पहनने की परंपरा है। दोनों में कितनी समानता है।

* पैर के खड़ाऊ में पैर ऊपर से खुला रहता है। वहाँ भी हाजी जो चप्पल पहनते हैं, उसमें भी पैर ऊपर से खुला रहता है।


'अयोध्या' का अर्थ होता है वह जगह जहाँ युद्ध, लड़ाई व झगड़ा न हो, शांति हो। यदि देखें तो मक्का स्थित काबा शरीफ का हरम भी अयोध्या ही है। वहाँ लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। बाप का हत्यारा भी सामने आ जाए तो वहाँ बदला नहीं ले सकते। झाड़, फूल-पत्ती तोड़ना मना हैं।

* हमारे देश के सारे मंदिरों का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है। पूजा करते समय पुजारी का मुँह पश्चिम की ओर होता है। नमाजी नमाज पढ़ता है तो उसका मुँह भी उसी ओर रहता है। धर्मप्रेमी लोगों के लिए ये विचारणीय मुद्दे हैं। भारत और अरब के लोगों के संबंध बहुत पुराने हैं।

* हज के लिए सारे इंसानों को कोई बाधा और रोक-टोक नहीं। वहाँ का वीजा केवल यह है कि इंसान अपने प्रभु को एक मान ले। उसके अंतिम पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्ल. (उन पर ईश्वर की कृपा की वर्षा हो) पर विश्वास कर ले। ये शर्तें इतनी सहज और सरल हैं कि तनिक निष्पक्ष विचार से समझी जा सकती हैं।


* मुसलमान जब पवित्र काबा की परिक्रमा करते हैं तो जिस कोने से यह तवाफ (परिक्रमा) शुरू करते हैं, वहाँ कोने पर एक काला पत्थर लगा है। यह मान्यता है कि यह पत्थर जन्नत से लाकर यहाँ लगाया गया था। यह केवल एक पत्थर है।
इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर (रजि.) ने एक बार इस पत्थर की ओर इशारा करके कहा था- 'मैं खूब जानता हूँ कि तू सिर्फ एक पत्थर है। तेरे बस में न किसी का नुकसान है और न नफा। अगर मैं रसूल अल्लाह सल्ल. को तुझे बोसा (चुंबन) देते न देखता तो मैं तुझे कभी बोसा न देता।'





राजा मनु और  नूह...

हमने पढ़ा है कि राजा मनु को ही हजरत नूह माना जाता हैं। नूह ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम के पैगंबर हैं। इस पर शोध भी हुए हैं। जल प्रलय की ऐतिहासिक घटना संसार की सभी सभ्‍यताओं में पाई जाती है। बदलती भाषा और लम्बे कालखंड के चलते इस घटना में कोई खास रद्दोबदल नहीं हुआ है। मनु की यह कहानी यहूदी, ईसाई और इस्लाम में ‘हजरत नूह की नौका’ नाम से वर्णित की जाती है।

इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, श्रीलंका आदि द्वीपों के लोगों ने अपनी लोक परम्पराओं में गीतों के माध्यम से इस घटना को आज भी जीवंत बनाए रखा है। इसी तरह धर्मग्रंथों से अलग भी इस घटना को हमें सभी देशों की लोक परम्पराओं के माध्यम से जानने को मिलता है।

नूह की कहानी : उस वक्त नूह की उम्र छह सौ वर्ष थी जब यहोवा (ईश्वर) ने उनसे कहा कि तू एक-जोड़ी सभी तरह के प्राणी समेत अपने सारे घराने को लेकर कश्ती पर सवार हो जा, क्योंकि मैं पृथ्वी पर जल प्रलय लाने वाला हूँ।

सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा। धीरे-धीरे जल पृथ्वी पर अत्यन्त बढ़ गया। यहाँ तक कि सारी धरती पर जितने बड़े-बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। डूब गए वे सभी जो कश्ती से बाहर रह गए थे, इसलिए वे सब पृथ्वी पर से मिट गए। केवल हजरत नूह और जितने उनके साथ जहाज में थे, वे ही बच गए। जल ने पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक पहाड़ को डुबोए रखा। फिर धीरे-धीरे जल उतरा तब पुन: धरती प्रकट हुई और कश्ती में जो बच गए थे उन्ही से दुनिया पुन: आबाद हो गई।
मनु की कहानी : द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) के समक्ष भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन भूमि जल प्रलय के समुद्र में डूब जाएगी। तब तक एक नौका बनवा लो। समस्‍त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर तथा सब प्रकार के बीज लेकर सप्‍तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। प्रचंड आँधी के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य रूप में बचाऊँगा।

तुम लोग नाव को मेरे सींग से बाँध देना। तब प्रलय के अंत तक मैं तुम्‍हारी नाव खींचता रहूँगा। उस समय भगवान मत्स्य ने नौका को हिमालय की चोटी ‘नौकाबंध’ से बाँध दिया। भगवान ने प्रलय समाप्‍त होने पर वेद का ज्ञान वापस दिया। राजा सत्‍यव्रत ज्ञान-विज्ञान से युक्‍त हो वैवस्‍वत मनु कहलाए। उक्त नौका में जो बच गए थे उन्हीं से संसार में जीवन चला।

विचारणीय है कि कितने लोग होंगे जो मनु और नूह को एक ही शख्स मानते होंगे या धार्मिक कट्टरता के चलते नहीं भी मानते होंगे। फिर भी यहाँ इतना तो कह ही सकते हैं कि तौरात, इंजिल, बाइबिल और कुरआन से पूर्व ही मत्स्य पुराण लिखा गया था, जिसमें उक्त कथा का उल्लेख मिलता है। यहाँ यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं है कि अन्य धर्म ग्रंथों में पुराण से ही ली गई कथा है, जिसे अपने तरीके से गढ़ा। तथ्‍य यह है कि उक्त घटना का स्थान, समय और परम्परा के मान से अलग-अलग प्रभाव पड़ा और लोगों ने इसे दर्ज किया। यह मानव जाति का इतिहास है न कि किसी धर्म विशेष का।

January 08, 2011

Management Decision- If management has decided to screw you...There is no ESCAPE

Once SONIA GANDHI, L.K. Advani and Laloo Prasad Yadav were
travelling in an autorickshaw. They met with an accident and all three of
them died.
Yama Raja was waiting for this moment at the doorstep of death.

He asks Mrs GANDHI and Advani to go to HEAVEN.
But, for Laloo, Yama had already decided that he should be sent to HELL.
Laloo is not at all happy with this decision.
He asks Yama as to why this discrimination is being made. All the three of
them had served the public. Similarly, all took bribes, all misused public
positions, etc.
Then why the differential treatment?
He felt that there should be a formal test or an objective evaluation before
a decision is made; and should not be just based on opinion or pre-conceived
notions.
Yama agrees to this and asks all the three of them to appear for an English
test.
Mrs GANDHI is asked to spell " INDIA " and she does it correctly.
Advani is asked to spell " ENGLAND " and he too passes.
It is Laloo's turn and he is asked to spell " CZECHOSLOVAKIA ".
Laloo protests that he doesn't know English.
He says this is not fair and that he was given a tough question and thus
forced to fail with false intent.
Yama then agrees to conduct a written test in Hindi (to give another chance
assuming that Laloo should at least feel that Hindi would provide an equal
platform for all three).

Mrs GANDHI is asked to write "KUTTA BOLA BHOW BHOW". She writes it easily and
passes.
Advani is asked to write "BILLY BOLI MYAUN MYAUN". He too passes..
Laloo is asked to write "BANDAR BOLA GURRRRRR....."
Tough one. He fails again.
Laloo is extremely unhappy.
Having been a student of history (which the other two weren't),he now
requested for all the 3 to be subjected to a test in history
Yama says OK but this would be the last chance and that he would not take
any more tests.

Mrs GANDHI is asked: "When did India get Independence ?". She replied "1947" and
passed.
Advani is asked "How many people died during the independence struggle?".
He gets nervous. Yama asked him to choose from 3 options: 100,000 or 200,000
or 300,000.

Advani catches it and says 200,000 and passes.

It's Laloo's turn now.

'

'

Yama asks him to give the Name and Address of each of the 200,000 who died
in the struggle.

Laloo accepts defeat and agrees to go to HELL.

Moral of the story: IF YOUR MANAGEMENT HAS DECIDED TO SCREW YOU, THERE IS NO ESCAPE..... :-

January 03, 2011

धर्मों में ॐ उच्चारण का महत्व

हिंदू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में 'ॐ' शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था। ॐ का हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्मों में भी महत्व है।

योगियों में यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और वह स्वस्थ हो जाता है। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती है। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता है। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध हो जाता है।


ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है। जिनका उच्चारण एक के बाद एक होता है। ओ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है, जिसके अनुसार साधक या योगी इसका उच्चारण ध्यान करने के पहले व बाद में करता है।

ॐ 'ओ' से प्रारंभ होता है जो चेतना के पहलेस्तर को दिखाता है। चेतना के इस स्तर में इंद्रियाँ बहिर्मुख होती हैं। इससे ध्यान बाहरी विश्व की ओर जाता है। चेतना के इस अभ्यास व सही उच्चारण से मनुष्य को शारीरिक व मानसिक लाभ मिलता है।

आगे 'उ' की ध्वनि आती है, जहाँ पर साधक चेतना के दूसरे स्तर में जाता है। इसे तेजस भी कहते हैं। इस स्तर में साधक अंतर्मुखी हो जाता है और वह पूर्व कर्मों व वर्तमान आशा के बारे में सोचता है। इस स्तर पर अभ्यास करने पर जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं व उसे आत्मज्ञान होने लगता है। वह जीवन को माया से अलग समझने लगता है। हृदय, मन, मस्तिष्क शांत हो जाता है।


'म' ध्वनि के उच्चार से चेतना के तृतीय स्तर का ज्ञान होता है, जिसे 'प्रज्ञा' भी कहते हैं। इस स्तर में साधक सपनों से आगे निकल जाता है व चेतना शक्ति को देखता है। साधक स्वयं को संसार का एक भाग समझता है और इस अनंत शक्ति स्रोत से शक्ति लेता है। इसके द्वारा साक्षात्कार के मार्ग में भी जा सकते हैं। इससे साधक के शरीर, मन, मस्तिष्क के अंदर आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है। शरीर, मन, मस्तिष्क, शांत होकर तनावरहित हो जाता है।



हिंदू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में 'ॐ' शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था।


ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। साधक बैठने में असमर्थ हो तो लेटकर भी इसका उच्चारण कर सकता है। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।



November 09, 2010

Q & A  with DR.SUNIL KAUSAHL Ayurvedacharya  (IBIBO.COM)
CONSULT With ur doctor too******

To remove gall bladder stones without surgery is to follow the following treatment schedule:


1. Every day grind 10g. papayya root with water, strain & drink, empty stomach in the morning. Take the whole root of papayya tree which was recently uprooted, wash & clean the root and keep in fridge, every day cut a pc. of average 10g. and make its juice as said above.

2. Surendrabhra Vati : 1 tab. morning & 1 tab. evening (this medicine is not very popular as very few people go for gall stone remedy and approach an Ayurvedic doctor, most people opt for sergical removal of gall bladder, so no company other than Nidco produces this medicine.

There are hundreds of medicines which are not produced just because they do not sell but are really effective and can abort many operations and health problems. All companies produce medicines which are hottest selling.

I am 36 years, I have Gas trouble. kindly suggest best remedy ?
Thier are only two reasons of gas trouble, one remaining empty stomach for long and second, undidested food that ferments in your intestines.


Do not eat old food which is again and again kept in fridge and heated in microw. Try and eat fresh food, leave maida (fine flour & sugar), yeast (breads) and fortified food, preservatives containing food, tinned/canned food.

Take a 1/4th inch (cube) of ginger with salt just begaing a food twice a day.

Treatment:

1. Hingwashtak churna : one tsp. with little ghee with first bite of food twice a day

2. Lavan Bhaskar Churna : one tsp. after meals with water twice a day.

3. Arogyavardhini Ras Vati : 2 tabs twice a day after 1/2 hr. of meals twice a day.

4. Water kept in copper vassel over night : drink two glasses empty stomach in the morning and 2 glasses evening at about 7 p.m. (your liver need copper and you give very less copper in your food to your liver).

Follow the above advices and report back in 15 days. Hope, you will be fine.

I am been recently suffering from high blood sugar and want some home remedies to keep under check. We have its family history. I am 45. Please suggest...sunil?
Eat less carbohydrates, do breathing excercise every day, do brisk walk every evening, eat or drink pomegranate/juice every day as it rejuvenate pancreas.


Eat only roti or only rice at a time do not mix both at a time.

Eat healthy breakfast (not in quantity but quality), include almonds, milk etc. as before diabetes you have to worry about the effects of diabetes that is biggest on LDL colesterol, weakening of eyes and kidneys.

Incude some herbs in your daily diet as diabetes is called in Prameha Rog catagory and is called Madu-meha and triphala balances the body of any type of prameha. Take one tsp. triphala powder with water at night.

Avoid dinner as carbohydrates and sugars taken at night are not burnt as calories and never spent, try and take either fruit salad (of assorted fruits) or vegetable salad (assorted vegetables) do not mix fruits and vegetables, at the time of dinner. You have no problem with fructose and vegetables salads have very low sugar but high fiber which will give you good bowl movement to reduce any chances of blockages in stomach to rise absorption of more and more sugar.

Keep a 1" piece of giloy in mouth during the day and let its juice included with saliva and swallow it till you stop feeling bitterness of it. It increases immunity and the main cause of type two diabetes whare your pancreas is producing insulin but your thymus gland is sending WBC's to kill that thinking it is an antibody.

With all the above advices, trust me, i have cured thousands of pre-diabetics and those who have been diagnosed diabetic but not started medicine yet.

I will also suggest all old diabetic patients also to try and follow this lifestyle to at least reduce effects and side effects of diabetes and reduce the size of medicine they have been taking.

Best of luck to you all.
 
Im 29m iw as addited for smoke drugs and alchol when i was 19 yrs.6 yrs i was been adicted.and i quit everything past 5 yrs.but i felt having very bad errection
Its good that you have quit all the bad habits. Now just take 5 gms. Ashwagandha powder twice a day with milk for at least 40 days and report results.
 
Treatment & prevention of malaria, yellow fever, encephalitis, dengue fever.?
 
The best remedy is to take white ineer bark of neem (neem antarchal) and Rasont (daruhaldi extract), Satva giloy all equal, take 1/2 tsp. twice a day with warm water will protect you from all above plus chiken gunia. Very easily, If you can find a pipal tree grown naturally on neem tree. Take 87 leaves of this treee and make paste and mix it with 1 ltr. of water , take 20 ml. thriOce a day with mixed in water


Try it, you can make a person suffering healthy in few days.

Put some shubhra & tankan (one pinch each) bhasma in water of bath as it will stop spread the infection to others in the family.
 
Can liver cirrhosis be fully cured by ayurveda in it's advance stage.?
 



Or take my medicine liveron to cure you permanentlyly.
 
My SGOT - 84 & SGPT - 131. I Hv Hept. B & C. I got my kidney transplant done 4 years back. Kidney is functioning ok. R above figures dangerous? Any gd Doctor?
 
I was living in Green park 4 years ago and just outsine my hose thier was a neem tree an which pipal tree was grown naturally, i grown giloy bail on it and then took 8 leaves of pipal & 12 inches of giloy, ground it in one ltr. water and gave to my patients suffering from hapatitis ABC , jaundice, spleen enlargement, kidney disorders and amazingly most of people cured in just 3 days. MCD one day while creating a new footpath destroyed the tree forever.


Now i have top floor flat and i have grown neem tree on top of that pipal tree and on top of that giloy they have grown successfully, I hope i will be able to produce successfull medicine for hepatitis ABC etc. in shortest possible time.

I am exposing my this research & formula for human health and never wish any body else or company to register it as thier patent. It is for general public to be cured. Every person can grow these kind of plants at home and cure you and your loved ones.

It cures many other diseases such as skin, hair, high cholesterol, gall bladder stones etc. etc.
 
How can you reduce SGPT for a liver test?
The extracts of Phyllanthus niruri mixed with curd taken every morning for a week will reduce SGPT level in blood serum.


It also regulate the amount of liver enzymes in blood.
The extract of Phyllanthus niruri is one of a good medicine for jaundice in India.

continue........................

November 08, 2010

Cow Urine Can Cure Many Diseases

Gomata Ark (Medicinal Distilled Cow Urine)






Medicinal distilled cow urine (200 ml), produced by ISKCON Belgaum goshala, from native Indian breed of cows. According to Ayurveda, distilled cow urine is the best medicine for all diseases. It is a miracle cure for every disease. Produced and distilled according to the ancient Ayurvedic process by devotees, from protected cows.


•Increases resistance power of the body.

•Increases life span and purifies the blood.

•Effective for all kinds of diseases.

•Restores balance of the "three doshas".

•Reduces fat.

Instructions: Take 2 teaspoons with honey or water, 30 minutes before or after food



Chemical composition of distilled cow urine:


1.Nitrogen (N2, NH2): Removes blood abnormalities and toxins, Natural stimulant of urinary track,

activates kidneys and it is diuretic.

2.Sulphur (S): Supports motion in large intestines. Cleanses blood.

3.Ammonia (NH3): Stabilise bile, mucous and air of body. Stabilises blood formation.

4.Copper (Cu): Controls built up of unwanted fats.

5.Iron (Fe): Maintains balance and helps in production of red blood cells & haemoglobin. Stabilises working power.

6.Urea CO(NH2)2: Affects urine formation and removal. Germicidal.

7.Uric Acid (C5H4N4O3): Removes heart swelling or inflammation. It is diuretic therefore destroys toxins.

8.Phosphate (P): Helps in removing stones from urinary track.

9.Sodium (Na): Purifies blood. Antacid.

10.Potassium (K): Cures hereditary rheumatism. Increases appetite. Removes muscular weakness and laziness.

11.Manganese (Mn): Germicidal, stops growth of germs, protects against decay due to gangrene.

12.Carbolic acid (HCOOH): Germicidal, stops growth of germs and decay due to gangrene.

13.Calcium (Ca): Blood purifier, bone strengthener, germicidal.

14.Salt (NaCl): Decreases acidic contents of blood, germicidal.

15.Vitamins A, B, C, D, E: Vitamin B is active ingredient for energetic life and saves from nervousness and thirst, strengthens bones and reproductive ingredient for energetic life and saves from nervousness and thirst, strengthens bones and reproductive power.

16.Other Minerals: Increase immunity.

17.Lactose (C6H12O6): Gives satisfaction., strengths heart, removes thirst and nervousness.

18.Enzymes: Make healthy digestive juices, increase immunity.

19.Water (H2O): It is a life giver. Maintains fluidity of blood, maintains body temperature.

20.Hipuric acid (CgNgNox): Removes toxins through urine.

21.Creatinin (C4HgN2O2): Germicide.

22.Aurum Hydroxide (AuOH): It is germicidal and increases immunity power. AuOH is highly antibiotic and anti-toxic.
Leuchorrea (Shweta Pradar)


Following are the signs or symptoms that indicate the presence of this disease in females:

• White discharge from the vagina accompanied by backache

• General debility

• Constipation

• Headache

Causes of Leuchorrea (Shweta Pradar)

In this ailment kapha dosha is responsible for originating this disease.

Leuchorrea (Shweta Pradar) Pathogenesis

This ailment is the result of aggravation of kapha dosha in the female body due to certain diets and lifestyle. Aggravated kapha contaminates the vagina and produces stickiness and itching in the vagina accompanied by a thick white discharge.

Treatment for Leuchorrea (Shweta Pradar)

The medical treatment given to women in this ailment is as follows:

• Pradrank Churna

• Pushyanuga Churna.

There are few remedies that are beneficial for curing this ailment:

Mix one teaspoon of Amla (Indian Gooseberry) powder with 1 teaspoon honey and take this mixture twice a day.

Recipes of Leuchorrea (Shweta Pradar)

• Boil six cups of water. Add 1cup rice and cook until rice becomes soft. Sieve the rice. The water is the rice gruel. Take one cup rice gruel and add salt (according to taste), a quarter teaspoon of black pepper. Drink warm.

• Soak five grams of fenugreek seeds in 250 ml. water (overnight or minimum of 4 hours). Boil and reduce it to 150 ml. Filter and drink warm once or twice a day.

Leuchorrea (Shweta Pradar) Panchakarma

• Mind must be pure.

• Sexual intercourse during treatment must be reduced or avoided.

• Avoid reading, watching or listening to sexually stimulating materials.

• Sattvic, easily digestible food should be taken at regular intervals.

• Non-vegetarian foods, excessive amount of puddings, garlic, onion, pickles, potatoes, sour foods, excessive fried and greasy food must be avoided.

• Bowels must be well cleansed regularly.


Yoga for Leuchorrea (Shweta Pradar)

• Paschimottanasana

• Sarvagasana


• Halasana


• Padmasana

• Bhujangasana


• Shalabhasana

मस्जिद कैसे बने?--Written By : - साध्वी चिदर्पिता

एक मुस्लिम् मित्र मिलेl खुले दिलोदिमाग के व्यक्ति हैं तो राम मंदिर पर चर्चा चल निकलीl लगे हाथ उन्होंने उच्चन्यायालय के फैसले पर बधाई भी दे डालीl मैंने कुछ हैरान होकर उनकी ओर देखा तो हँसते हुए बोले कि बधाई आपको ही नहीं हमें भी है, हमारी भी तो बला टलीl अब मुझे खुल कर पूछना पड़ा, कैसे? उन्होंने कहा कि जो लोग अयोध्या की लड़ाई लड़ रहे हैं क्या वे यह बता सकते हैं कि पहली मस्जिद कहाँ और कैसे बनी थी? अगर जानते हैं तो इस लड़ाई का औचित्य ही नहींl अब मेरी जिज्ञासा बढ़ने लगी और मैं सतर्क होकर उनकी बात सुनने लगीl उन्होंने आगे कहा कि पहली मस्जिद मदीना में बनीl जब मोहम्मद साहब मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन देख रहे थे तो लगभग हर व्यक्ति अपनी जगह देकर मस्जिद बनवाना चाहता थाl उन्होंने उसका हल निकालते हुए कहा कि मेरी ऊंटनी जहाँ जाकर बैठ जायेगी, मस्जिद वहीँ बनेगीl ऊंटनी जहाँ बैठी उस ज़मीन के मालिक दो नाबालिग यतीम बच्चे निकलेl अब दूसरी परेशानी खड़ी हो गयी कि उनसे ज़मीन कैसे ली जायेl आखिर में एक धनी उनके पास गया और उनसे ज़मीन की कीमत पूछीl बच्चों ने जो कीमत बताई उससे कईं गुना कीमत उन्हें अदा की गयीl ऐसे उस ज़मीन पर पहली मस्जिद नबवी बनीl मुस्लिम धर्म में किसी भी झगड़े की ज़मीन पर मस्जिद बनाना सख्त मना हैl किसी और इमारत को तोड़कर मस्जिद बनाना भी मना हैl जिन्होंने यह कहानी सुनाई वे काज़ी साहब के सुपुत्र और जाने-माने एडवोकेट है. उनकी बात पर शक का सवाल नहीं था पर फिर भी मैंने चेक किया तो पाया कि वे एकदम सही थे. मैंने कुछ धृष्टतापूर्वक कहा कि कहीं यही तो कारण नहीं था जिससे शाहजहाँ ने सुंदर शिव मंदिर को मस्जिद न बनाकर मकबरा बना दिया? उन्होंने कुछ मुस्कुरा कर कहा हो सकता है. ज़ाहिर सी बात है कि अगर ताजमहल मकबरा न होकर मस्जिद होता तो दुनिया की सबसे खूबसूरत मस्जिदों में उसका नाम होताl अब अगर अयोध्या में मस्जिद बन ही नहीं सकती तो क्या करेंगे ज़मीन लेकर? राम की जन्मभूमि पर उनका मंदिर बन जायेगा तो किसी का क्या बिगड जायेगा?


कभी कहीं सुना था, आज याद आ रहा है,

हमीं हम हैं तो क्या हम हैं, तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो? (लेखक अध्‍यात्‍म जगत से गहरे जुड़ी हैं।)

October 26, 2010



संस्कृत पांडुलिपियों का संरक्षण जरूरी
 
 
रायपुर के संस्कृत महाविद्यालय में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के सौजन्य से पांडुलिपियों को सहेजने की विधियों को लेकर कार्यशाला चल रही है। नष्ट होती संस्कृत की महान विरासत को बचाए रखने के लिए ऐसे प्रयास काफी अहम हैं। संस्कृत महाविद्यालय में बड़ी संख्या में पुरानी पांडुलिपियाँ हैं जो संरक्षण के अभाव में खराब हो रही हैं, कार्यशाला से इन्हें सहेजने में मदद मिलेगी।

कार्यशाला में परंपरागत तरीकों से पांडुलिपियों को सहेजने की विधियाँ बताई गई हैं। यह काफी उपयोगी हो सकती हैं, क्योंकि इन्हीं विधियों के प्रयोग से ऋग्वेद की कुछ ऐसी पांडुलिपियाँ भी संरक्षित रहीं जो हजार साल पहले लिखी गई थी।

फिर भी यह कहना होगा कि इस संबंध में आधारित ढाँचा बनाए बगैर इस प्रकार की कवायद व्यर्थ ही होगी। पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए एक तंत्र तैयार कर सरकार को संरक्षण की आधुनिक विधियों को अपनाना होगा, जैसा कि भंडारकर शोध संस्थान, पुणे जैसी संस्थाओं में अपनाया जा रहा है। इन्हें न केवल संरक्षित करने की जरूरत है, अपितु इनके विषय-वस्तु का अत्याधुनिक विधियों द्वारा स्कैन करना भी जरूरी है ताकि इन्हें जरा भी क्षति पहुँचाए बगैर इनकी सामग्री सुरक्षित रखी जा सके।

दरअसल, जब भारत में मैकाले शिक्षा पद्धति लागू की गई तो एक षड्यंत्र के तहत केवल यूरोपीय पद्धति पर आधारित शिक्षा को भारत में लागू किया गया। इसके पीछे मकसद केवल क्लर्क तैयार नहीं करना था, अपितु साथ ही भारत के पाश्चात्यीकरण की तैयारी भी करनी थी, लोगों के मन में संस्कृत भाषा के प्रति हीनभावना भरनी थी।
जब आधुनिक शिक्षा पद्धति पर प्राच्यविदों और उपयोगितावादियों में बहस छिड़ी तब मैकाले बीच का रास्ता निकाल सकते थे जिसमें आधुनिक ज्ञान भी शामिल होता और 4000 से भी अधिक साल का संचित ज्ञान भी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संस्कृत केवल धर्म-कर्म की भाषा रह गई और अंग्रेजी ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में जानी गई। यही वजह है कि नई पीढ़ी के जो बच्चे हैरी पॉटर श्रृंखला के प्रति दीवानगी दिखाते हैं। पंचतंत्र जैसी रचनाओं के बारे में अनजान हैं, जबकि इनमें एक सुंदर कहानी के पीछे एक संदेश भी निहित था जो भारतीय शिक्षा पद्धति का सार था।

NDपांडुलिपि संरक्षण के संबंध में हमारी लापरवाही का नतीजा ही था कि भारत में सबसे पहली बार संस्कृत सीखने वाले प्राच्यविद विलियम जोन्स को अभिज्ञान शाकुन्तलम की केवल एक पांडुलिपि ही मिली और वह भी बांग्ला लिपि में। जब विलियम जोन्स ने अभिज्ञान शाकुन्तलम पढ़ना शुरू किया तो अध्ययन के मध्य ही उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखा कि मैं दो हजार वर्ष पुराने एक संस्कृत नाटक का अध्ययन कर रहा हूँ, इसका लेखन हमारे महान लेखक शेक्सपीयर के इतना निकट है कि ऐसा भ्रम होने लगता है कि शेक्सपीयर ने कहीं शाकुन्तलम का अध्ययन तो नहीं किया।


जोन्स का यह पत्र उस समय प्रकाशित नहीं हुआ अन्यथा यूरोप में बड़ी खलबली मचती। मैक्समूलर ने जिन्होंने 'सेक्रेड बुक ऑफ ईस्ट' की रचना की, संस्कृत साहित्य के बारे में लिखा कि शुरुआत में संस्कृत समझना काफी जटिल होता है, लेकिन जब आप अभ्यस्त होते जाते हैं तो ज्ञान का अपूर्व खजाना और जीवन को देखने की एक नई दृष्टि आपके भीतर विकसित होती है। यहाँ हमें समझना होगा कि संस्कृत की महान धरोहर की उपेक्षा कर, हम 4000 साल से अधिक पुराने समय के संचित ज्ञान को खो देते हैं।

जो लोग संस्कृत को केवल कर्मकांड की भाषा ही समझते हैं, वह भूल जाते हैं कि अर्थशास्त्र वैसी ही रचना है जैसे कि मैकियावेली के प्रिंस। भास्कराचार्य की रचना लीलावती गणित की ऊब से भरी अंग्रेजी किताबों का एक अच्छा विकल्प प्रस्तुत करती है। अपनी बेटी को गणित सिखाने के लिए लिखी इस रचना में भास्कराचार्य ने कहानी कहने के अंदाज में गणित की बुनियादी समस्याएँ हल करने की आसान विधियाँ बताईं।

संस्कृत साहित्य के प्रति उदासीनता के चलते हम भवभूति और बाण जैसे महान लेखकों की रचनाओं के आनंद से वंचित रह जाते हैं। उपनिषदों में यम-नचिकेता संवाद अथवा याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद हमें दर्शन की गहराइयों में ले जाते हैं। यह केवल बौद्धिक खुराक के लिए जरूरी नहीं, अपितु जीवन के संबंध में आँखें खोल देने वाला अनुभव होगा जिससे हम अपने मनुष्य होने की गरिमा को और बेहतर ढंग से महसूस कर पाएँगे।
ऐसे समय में जब अमेरिका के हॉवर्ड जैसे माने हुए विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रम में गीता और पंचतंत्र शामिल कर रहे हैं, भारतीय शिक्षा पद्धति में इनके प्रति उदासीनता झलकती है। जैसा कि एक पुरानी कहानी है कि राक्षस की जान तोते में रहती है, तोता खत्म तो राक्षस भी खत्म। वैसे ही पांडुलिपि संरक्षण के कार्यक्रमों को तभी सार्थकता मिलेगी, जब लोग संस्कृत भाषा के जादू को जान पाएँगे।

पांडुलिपि संरक्षण के लिए नई पीढ़ी को जागरूक करने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। यह तभी हो पाएगा जब उन्हें संस्कृत साहित्य की समृद्धि का ज्ञान होगा। इसके लिए भी हमें बड़ी मनोवैज्ञानिक लड़ाई लड़नी होगी। 

BRAND Archetypes through lens -Indian-Brands

There has been so much already written about brand archetypes and this is certainly not one more of those articles. In fact, this is rather ...