STORY - SKILLFULLY TALK

राजा का भाग्य

एक बार एक ज्योतिषी एक राजा के पास गया| राजा ने उसे बहुत आदर दिया, उसे बिठाया और उसे सम्मान और उपहार दिए| राजा ने उसे अपनी हथेली और अपनी जन्म कुंडली दिखाई| सब कुछ देखकर ज्योतिषी ने राजा से कहा “हे राजन! तुम अपने सारे परिवार को खो दोगो| सब लोग तुम्हारे से पहले मृत्यु को प्राप्त कर लेंगे | तुम्हारी मृत्यु सबसे अंत में होगी”|
राजा यह सुनकर बहुत क्रोधित हो गया और उसने ज्योतिषी को कारागार में डाल दिया| इस समाचार को सुनकर सभी ज्योतिषी डर गए| उन्होंने सोचा “हम तो राजा को सच नहीं बता सकते, अगर हम ऐसा करते हैं तो वे हमें कारागार में डाल देगा, अब हम क्या करें”?
कोई भी व्यक्ति नकारात्मक भविष्यवाणी पसंद नहीं करता| वह निःसंदेह कोई अच्छी और सकारात्मक बात सुनना चाहता है| और ऐसा राजा के लिए भी सच था| राजा ने दूसरे ज्योतिषी को अपने सामने आने के लिए कहा| बहुत से ज्योतिषी राजा के इस निवेदन से पलायन कर गए पर एक वरिष्ठ ज्योतिषी राजा से मिलाने को तैयार हो गया| तो वह राजा के समक्ष प्रस्तुत हुआ, राजा ने उसका भी उसी भाव और उपहारों से स्वागत किया| राजा ने उसको अपनी हथेली दिखाई| ज्योतिषी बोला “हे राजन! आपको तो महान भविष्य का वरदान है! आपका राशिफल तो बहुत अच्छा है| समस्त इतिहास में किसी को भी इस तरह का दीर्घायु होने का सौभाग्य नहीं है जैसा आपका है| सच तो यह है कि आपके राजवंश में कोई भी इतना दीर्घायु नहीं हुआ है जितने आप होंगे”|
ज्योतिषी ने यह नहीं कहा कि राजा अपने राजपरिवार में सभी लोगों से ज्यादा समय तक जीवित रहेगा| उसके बदले में उसने कहा कि उसको दीर्घायु होने का सौभाग्य प्राप्त है और उसका राशिफल बहुत अच्छा है| राजा अपने दीर्घायु होने और अपने अच्छे स्वास्थ्य के बारे में सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ| उसने ज्योतिषी से कहा “आपको जो भी उपहार मुझसे मांगना है मांग लो मैं आपको वह दे दूंगा”| ज्योतिषी ने कहा “कृपया मेरा सहकर्मी जो कारगर में बंद है उसे छोड़ दीजिए”|

संवाद की कुशलता से बहुत फर्क पड़ता है| कन्नड़ भाषा में एक दोहा है, “शब्दों से ही हंसी और मस्ती होती है, और शब्दों से ही शत्रुता भी हो सकती है”| इस लिए, हमारे संवाद से ही द्वंद्व उत्पन्न होता है|


प्रश्न : प्रिय गुरुदेव, आप ने अनेकों बार कहा है छोड़ दो, भूल जाओ पर अगर कोई व्यक्ति वही गलती बार बार, दिन प्रति दिन करता रहे तो क्या करना चाहिए?उत्तर  : आप को उनको बताना चाहिए, सिखाना चाहिए लेकिन उनको अपने दिमाग से बाहर रखना चाहिए | मुक्त रहने का मतलब चुप रहना नहीं है |
अगर कोई गलती कर रहा है और आप उसको कहोगे “ऐसा मत करो, क्योंकि इससे मुझे कष्ट होता है”, तब वे कभी भी उसको करना बंद नहीं करेंगे| उसकी जगह आप उनसे कहें कि “आप का यह गलती करना आप के लिए कष्टदेह हो सकता है” तब वे नहीं करेंगे|तब उस व्यक्ति के अन्दर कुछ हलचल होगी और तब वह आपकी बात सुनेगा| तब वह अपना रास्ता बदल लेगा| याद रखो “एक पीड़ित व्यक्ति कभी किसी दोषी में सुधर नहीं ला सकता और अगर आप किसी में कोई सुधार लाना चाहते हैं और उनको कुछ सिखाना चाहते हैं तो आपके अन्दर एक शिक्षक जैसी उदारता होनी चाहिए| आपके अन्दर सहानभूति, एक खुला दृष्टिकोण और धैर्य होना चाहिए”|
तीन चीज़ें अति आवश्यक हैं, उदारता, धैर्य और कौशल्| तभी आप उनकी गलतियों को आसानी से आत्मसात कर पाओगे|

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