May 06, 2013

संस्कृति- प्राचीन वायुयानों के तथ्य Part - 2


भारत के प्राचीन ग्रन्थों में आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व विमानों तथा उन के युद्धों का विस्तरित वर्णन है। सैनिक क्षमताओं वाले विमानों के प्रयोग, विमानों की भिडन्त, तथा ऐक दूसरे विमान का अदृष्य होना और पीछा करना किसी आधुनिक वैज्ञिानिक उपन्यास का आभास देते हैं लेकिन वह कोरी कलपना नहीं यथार्थ है।
प्राचीन वामानों के प्रकार
प्राचीन विमानों की दो श्रेणिया इस प्रकार थीः-
  • मानव निर्मित विमान, जो आधुनिक विमानों की तरह पंखों के सहायता से उडान भरते थे।
  • आश्चर्य जनक विमान, जो मानव निर्मित नहीं थे किन्तु उन का आकार प्रकार आधुनिक ‘उडन तशतरियों’ के अनुरूप है।
विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ
भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या में उपलब्द्ध हैं, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया। प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्हों ने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उन में से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है। विमान विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-
1.     ऋगवेद- इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हे अश्विनों (वैज्ञिानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणत्या तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उन के दोनो ओर पंख होते थे। वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था। इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे। इस में कोई सन्देह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी। याता-यात के लिये ऋग वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-
  • जल-यान – यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 6.58.3)
  • कारा – यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 9.14.1)
  • त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋग वेद 3.14.1)
  • त्रिचक्र रथ – यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता था। (ऋग वेद 4.36.1)
  • वायु रथ – रथ की शकल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 5.41.6)
  • विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 3.14.1).
2.     यजुर्वेद में भी ऐक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिस का निर्माण जुडवा अशविन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्हो मे राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।
3.         विमानिका शास्त्र 1875 ईसवी में भारत के ऐक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की ऐक प्रति मिली थी। इस ग्रन्थ को ईसा से 400 वर्ष पूर्व का बताया जाता है तथा ऋषि भारदूाज रचित माना जाता है। इस का अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के 97 अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा 20 ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तरित जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियाँ अब लुप्त हो चुकी हैं। इन ग्रन्थों के विषय इस प्रकार थेः-
  • विमान के संचलन के बारे में जानकारी, उडान के समय सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी, तुफान तथा बिजली के आघात से विमान की सुरक्षा के उपाय, आवश्यक्ता पडने पर साधारण ईंधन के बदले सौर ऊर्जा पर विमान को चलाना आदि। इस से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विमान में ‘एन्टी ग्रेविटी’ क्षेत्र की यात्रा की क्षमता भी थी।
  • विमानिका शास्त्र में सौर ऊर्जा के माध्यम से विमान को उडाने के अतिरिक्त ऊर्जा को संचित रखने का विधान भी बताया गया है। ऐक विशेष प्रकार के शीशे की आठ नलियों में सौर ऊर्जा को एकत्रित किया जाता था जिस के विधान की पूरी जानकारी लिखित है किन्तु इस में से कई भाग अभी ठीक तरह से समझे नहीं गये हैं। 
  • इस ग्रन्थ के आठ भाग हैं जिन में विस्तरित मानचित्रों से विमानों की बनावट के अतिरिक्त विमानों को अग्नि तथा टूटने से बचाव के तरीके भी लिखित हैं। 
  • ग्रन्थ में 31 उपकरणों का वर्तान्त है तथा 16 धातुओं का उल्लेख है जो विमान निर्माण में प्रयोग की जाती हैं जो विमानों के निर्माण के लिये उपयुक्त मानी गयीं हैं क्यों कि वह सभी धातुयें गर्मी सहन करने की क्षमता रखती हैं और भार में हल्की हैं।
4.         यन्त्र सर्वस्वः – यह ग्रन्थ भी ऋषि भारदूाजरचित है। इस के 40 भाग हैं जिन में से एक भाग ‘विमानिका प्रकरण’के आठ अध्याय, लगभग 100 विषय और 500 सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारदूाजने विमानों को तीन श्रेऩियों में विभाजित किया हैः-
  • अन्तरदेशीय – जो ऐक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
  • अन्तरराष्ट्रीय – जो ऐक देश से दूसरे देश को जाते
  • अन्तीर्क्षय – जो ऐक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते
इन में सें अति-उल्लेखलीय सैनिक विमान थे जिन की विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं। उदाहरणार्थ सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-
  • पूर्णत्या अटूट, अग्नि से पूर्णत्या सुरक्षित, तथा आवश्यक्ता पडने पर पलक झपकने मात्र समय के अन्दर ही ऐक दम से स्थिर हो जाने में सक्ष्म।
  • शत्रु से अदृष्य हो जाने की क्षमता।
  • शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्ष्म। शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृष्यों को रिकार्ड कर लेने की क्षमता।
  • शत्रु के विमान की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना।
  • शत्रु के विमान के चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता।
  • निजि रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता।
  • आवश्यक्ता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता।
  • चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता।
  • स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता।
  • हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बडा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णत्या नियन्त्रित कर सकने में सक्ष्म।
विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ फाईटरऔर उडन तशतरी का मिश्रण ही हो सकता है। ऋषि भारदूाजकोई आधुनिक ‘फिक्शन राईटरनहीं थे परन्तुऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित कर सकता है कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञिानक माडल का विचार कैसे किया। उन्हों ने अंतरीक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती बाडी का ज्ञान भी पूर्णत्या हासिल नहीं कर पाये थे। 
5.         समरांगनः सुत्रधारा – य़ह ग्रन्थ विमानों तथा उन से सम्बन्धित सभी विषयों के बारे में जानकारी देता है।इस के 230 पद्य विमानों के निर्माण, उडान, गति, सामान्य तथा आकस्माक उतरान एवम पक्षियों की दुर्घटनाओं के बारे में भी उल्लेख करते हैं।
लगभग सभी वैदिक ग्रन्थों में विमानों की बनावट त्रिभुज आकार की दिखायी गयी है। किन्तु इन ग्रन्थों में दिया गया आकार प्रकार पूर्णत्या स्पष्ट और सूक्ष्म है। कठिनाई केवल धातुओं को पहचानने में आती है।
समरांगनः सुत्रधारा के आनुसार सर्व प्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था।  पश्चात अतिरिक्त विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-
  • रुकमा – रुकमानौकीले आकार के और स्वर्ण रंग के थे।
  • सुन्दरः –सुन्दर राकेट की शक्ल तथा रजत युक्त थे।
  • त्रिपुरः –त्रिपुर तीन तल वाले थे।
  • शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था।
दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का परिशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुरज़े, उपकरण, चालकों एवम यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये।
ग्रन्थ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबु अथवा सेब या कोई अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।
सात प्रकार के ईजनों का वर्णन किया गया है तथा उन का किस विशिष्ट उद्देष्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊचाई पर उस का प्रयोग सफल और उत्तम होगा। सारांश यह कि प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्द्ध है। विमान आधुनिक हेलीकोपटरों की तरह सीधे ऊची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे पीछ तथा तिरछा चलने में भी सक्ष्म बताये गये हैं 
6.         कथा सरित-सागर – यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वालो विमानों को बना सकते थे। यह रथ-विमान मन की गति के समान चलते थे।
कोटिल्लय के अर्थ शास्त्र में अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सोविकाओं का उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उडाते थे । कोटिल्लय  ने उन के लिये विशिष्ट शब्द आकाश युद्धिनाह का प्रयोग किया है जिस का अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलेट) आकाश रथ, चाहे वह किसी भी आकार के हों का उल्लेख सम्राट अशोक के आलेखों में भी किया गया है जो उस के काल 256-237 ईसा पूर्व में लगाये गये थे।
उपरोक्त तथ्यों को केवल कोरी कल्पना कह कर नकारा नहीं जा सकता क्यों कल्पना को भी आधार के लिये किसी ठोस धरातल की जरूरत होती है। क्या विश्व में अन्य किसी देश के साहित्य में इस विषयों पर प्राचीन ग्रंथ हैं ? आज तकनीक ने भारत की उन्हीं प्राचीन ‘कल्पनाओं’ को हमारे सामने पुनः साकार कर के दिखाया है, मगर विदेशों में या तो परियों और ‘ऐंजिलों’ को बाहों पर उगे पंखों के सहारे से उडते दिखाया जाता रहा है या किसी सिंदबाद को कोई बाज उठा कर ले जाता है, तो कोई ‘गुलफाम’ उडने वाले घोडे पर सवार हो कर किसी ‘सब्ज परी’ को किसी जिन्न के उडते हुये कालीन से नीचे उतार कर बचा लेता है और फिर ऊँट पर बैठा कर रेगिस्तान में बने महल में वापिस छोड देता है। इन्हें कल्पना नहीं, ‘फैंटेसी " कहते हैं

Source - http://hindumahasagar.wordpress.com/2012/09/20/50-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A4%E0%A4%A5%E0%A5%8D/#comment-29

संस्कृति- Aeroplane Invention Part - 3


WRIGHT BROTHERS  vs Pt.SHIVKAR BAPUJI TALPADE



आज राइट बंधु को हवाई जहाज के आविष्कार के लिए श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने 17 दिसम्बर 1903 हवाई जहाज उड़ाने का प्रदर्शन किया था। किन्तु बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि उससे लगभग 8 वर्ष पहले सन् 1895 में संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे ने “मारुतसखा” या “मारुतशक्त ” नामक विमान का सफलतापूर्व क निर्माण कर लिया था, जो कि पूर्णतः वैदिक तकनीकी पर आधारित था। पुणे केसरी नामक समाचारपत्र के अनुसार श्री तलपदे ने सन् 1895 में एक दिन (दुर्भाग्य से से सही दिनांक की जानकारी नहीं है) बंबई वर्तमान (मुंबई) के चौपाटी समुद्रतट में उपस्थित कई जिज्ञासु व्यक्तियों ( जिनमें अनेक भारतीय न्यायविद्/ राष्ट्रवादी सर्वसाधारण जन के साथ ही महादेव गोविंद रानाडे और बड़ौदा के महाराज सायाजी राव गायकवाड़ जैसे विशिष्टजन सम्मिलित थे ) के समक्ष अपने द्वारा निर्मित “चालकविहीन ” विमान “मारुतशक्त ि” के उड़ान का प्रदर्शन किया था। वहाँ उपस्थित समस्त जन यह देखकर आश्चर्यचकि त रह गए कि टेक ऑफ करने के बाद “मारुतशक्त ि” आकाश में लगभग 1500 फुट की ऊँचाई पर चक्कर लगाने लगा था। कुछ देर आकाश में चक्कर लगाने के के पश्चात् वह विमान धरती पर गिर पड़ा था। यहाँ पर यह बताना अनुचित नहीं होगा कि राइट बंधु ने जब पहली बार अपने हवाई जहाज को उड़ाया था तो वह आकाश में मात्र 120 फुट ऊँचाई तक ही जा पाया था जबकि श्री तलपदे का विमान 1500 फुट की ऊँचाई तक पहुँचा था। दुःख की बात तो यह है कि इस घटना के विषय में विश्व की समस्त प्रमुख वैज्ञानिको ं और वैज्ञानिक संस्थाओं/संगठनों पूरी पूरी जानकारी होने के बावजूद भी आधुनिक हवाई जहाज के प्रथमनिर्माण का श्रय राईट बंधुओं को दियाजाना बदस्तूर जारी है और हमारे देश की सरकार ने कभी भी इस विषय में आवश्यक संशोधन करने/ करवाने के लिए कहीं आवाज नहीं उठाई . (हम सदा सन्तोषी और आत्ममुग्ध लोग जो है!)। कहा तो यह भी जाता है कि संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित एवं वैज्ञानिक तलपदे जी की यहसफलता भारत के तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को फूटी आँख भी नहीं सुहाई थी और उन्होंने बड़ोदा के महाराज श्री गायकवाड़, जो कि श्री तलपदे के प्रयोगों के लिए आर्थिक सहायता किया करते थे, पर दबाव डालकर श्री तलपदे केप्रयोगों को अवरोधित कर दिया था। महाराज गायकवाड़ की सहायता बन्द हो जाने पर अपने प्रयोगों को जारी रखने के लिए श्री तलपदे एक प्रकार से कर्ज में डूब गए। इसी बीच दुर्भाग्य से उनकी विदुषी पत्नी, जो कि उनके प्रयोगों में उनकी सहायक होने के साथही साथ उनकी प्रेरणा भी थीं, का देहावसान हो गया और अन्ततः सन् 1916या 1917 में श्री तलपदे का भी स्वर्गवास हो गया। बताया जाता है कि श्री तलपदे के स्वर्गवास हो जाने के बाद उनके उत्तराधिका रियों ने कर्ज सेमुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से “मारुतशक्त ि” के अवशेष को उसके तकनीकसहित किसी विदेशी संस्थान को बेच दिया था। श्री तलपदे का जन्म सन् 1864 में हुआ था। बाल्यकाल से ही उन्हें संस्कृत ग्रंथों, विशेषतः महर्षि भरद्वाज रचित “वैमानिक शास्त्र” (Aeronauti cal Science) में अत्यन्त रुचि रही थी। वे संस्कृतके प्रकाण्ड पण्डित थे। पश्चिम के एकप्रख्यात भारतविद् स्टीफन नैप (Stephen-K napp) श्री तलपदे के प्रयोगों को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। एक अन्य विद्वान श्री रत्नाकर महाजन ने श्री तलपदे के प्रयोगों पर आधारित एक पुस्तिका भी लिखी हैं। श्री तलपदे का संस्कृत अध्ययन अत्यन्त ही विस्तृत था और उनके विमान सम्बन्धित प्रयोगों के आधार निम्न ग्रंथ थेः * महर्षि भरद्वाज रचित् वृहत् वैमानिक शास्त्र * आचार्य नारायण मुन रचित विमानचन्द् रिका * महर्षि शौनिक रचित विमान यन्त्र * महर्षि गर्ग मुनि रचित यन्त्र कल्प * आचार्य वाचस्पति रचित विमान बिन्दु * महर्षि ढुण्डिराज रचित विमान ज्ञानार्क प्रकाशिका स्वामी दयानंद द्वारा वेदों में विज्ञान की अवधारणा को साक्षात् रूप से दर्शन करवाने वाले श्री तलपडे पहले व्यक्ति थे .हमारे प्राचीन ग्रंथ ज्ञान के अथाह सागर हैं किन्तु वे ग्रंथ अब लुप्तप्राय -से हो गए हैं। यदि कुछ ग्रंथ कहीं उपलब्ध भी हैं तो उनका किसी प्रकार का उपयोग ही नहीं रह गया है क्योंकि हमारी दूषित शिक्षानीति हमें अपने स्वयं की भाषा एवं संस्कृति को हेय तथा पाश्चात्य भाषा एवं संस्कृति को श्रेष्ठ समझना ही सिखाती है।


File:Vaimanika Shastra title page.jpg


May 05, 2013

The Taj Mahal during wars

This was how the Taj Mahal was protected from bombers in 1942 during World war II.

It was covered with a huge scaffold, to make it look like a stockpile of Bamboo and misguide any enemy bombers. The camouflaging process is still incomplete in this photo. It is said the whole of Taj Mahal was covered, but this picture shows only the main dome covered. Maybe the British govt didn't allow any photographers later to shoot the final scaffold cover.

During the India-Pakistan war in 1971, it was protected by covering it with a green cloth and making it almost invisible i.e camouflaged within the greenery around it. Even in 2001, after the Sep 11 attack, Archaeological Survey of India took up the precautionary measure to cover it with cloth and it took them more than 20 days to do that.

However these days with the advent of high precision GPS, and satellite imagery an enemy can bomb such precious targets blindly. But the Taj Mahal has actually never been a target of our enemies but rather sadly the thousands of ignorant people who visit the site everyday and damage the structure by touching, scratching and making loud noise. More damage is being done by thousands of industries who freely pollute the Yamuna and the air around Taj Mahal. There have been serious allegations of corruption in the pollution control board.

The archaeological survey of India too needs to wake up and do much more in preserving such a beautiful monument of glorious Indian heritage. Shah Jahan would definitely shed tears if he sees his masterpiece in such a sad state.
 


Yog Pranayam Awakens Kundalini Power






वायु का संबंध आयु से अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' कछुए की साँस लेने और छोड़ने की गति इनसानों से
कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज
भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज
भी यही है।

वायु को योग में प्राण कहते हैं। प्राचीन ऋषि वायु के इस रहस्य को समझते थे तभी तो वे
कुंभक लगाकर हिमालय की गुफा में वर्षों तक बैठे रहते थे।
श्वास को लेने और छोड़ने के दरमियान घंटों का समय
प्राणायाम के अभ्यास से ही संभव हो पाता है। शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र
क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में
पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है
तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु
ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग
और मौत के निकट जा रहे हैं।

हठप्रदीपिका में इसी प्राणरूप वायु के संबंध में कहा गया है
कि जब तक यह वायु चंचल या अस्थिर रहती है, जब तक
मन और शरीर भी चंचल रहता है। इस प्राण के स्थिर होने
से ही स्थितप्रज्ञ अर्थात मोक्ष की प्राप्ति संभव
हो पाती है। जब तक वायु इस शरीर में है, तभी तक जीवन
भी है, अतएव इसको निकलने न देकर कुंभक का अभ्यास बढ़ाना चाहिए, जिससे जीवन बना रहे और जीवन में
स्थिरता बनी रहे।

असंयमित श्वास के कारण :
बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक
श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक
मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और
अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु
का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है। फिर व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता है काम, क्रोध, मद,
लोभ, व्यसन, चिंता, व्यग्रता, नकारात्मता और
भावुकता के रोग से ग्रस्त होता जाता है। उक्त रोग
व्यक्ति की श्वास को पूरी तरह तोड़कर शरीर स्थित
वायु को दूषित करते जाते हैं जिसके कारण शरीर
का शीघ्रता से क्षय होने लगता है।

कुंभक का अभ्यास करें :
हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से
धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने
का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में
स्थिरता आएगी। श्वसन-क्रिया जितनी मंद और सूक्ष्म
होगी उतना ही मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम
होगा। यही कारण है कि श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण
करने तथा पर्याप्त समय तक उसको रोक रखने (कुंभक) से
आयु के भी बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण योग
में कुंभक या प्राणायाम का सर्वाधिक महत्व माना गया है।

सावधानी :
आंतरिक कुंभक अर्थात श्वास को अंदर खींचकर पेट
या अन्य स्थान में रोककर रखने से पूर्व शरीरस्थ
नाड़ियों में स्थित दूषित वायु को निकालने के लिए
बाहरी कुंभक का अभ्यास करना आवश्यक है।
अतः सभी नाड़ियों सहित शरीर की शुद्धि के बाद ही कुंभक का अभ्यास करना चाहिए। वैसे तो प्राणायाम अनुलोम-विलोम के
भी नाड़ियों की शुद्धि होकर शरीर शुद्ध होता है और
साथ-साथ अनेक प्रकार के रोग भी दूर होते हैं, किन्तु
किसी प्रकार की गलती इस अभ्यास में हुई तो अनेक
प्रकार के रोगों के उत्पन्न होने की संभावना भी रहती है।
अतः उचित रीति से ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।


प्राणायाम का रहस्य :
इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्रमुख हैं।
प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियाँ ‍शुद्ध होकर
जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में
किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल
हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर
धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच
फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास
बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।


May 03, 2013

संस्कृति - विमानशास्त्र - The Lavitation Theory Part- 1





विज्ञान प्रसार (वि.प्र.) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार की 

रिपोर्ट
New Evidence of Ancient Indian Science Of Space Travel Source:

Conspiracy Journal#205 April 11, 2003

कुछ सालों पहले चीन पुरातत्त्व सरकार ने ल्हासा तथा तिब्बत में 


संस्कृत दस्तावेजों की खोज की है और उन्हें अनुवाद करने के लिए 

University of Chandigarh भेजा गया है।

इस विश्वविध्यालय की Dr. Ruth Reyna ने बताया कि इन दस्तावेजों 


में विमान का अंतरतारकीय माध्यम के निर्माण करने की बिधि दी है।

अंतरखगोलीय माध्यम या अंतरतारकीय माध्यम हाइड्रोजन और 


हिलीयम के कणों का मिश्रण होता है जो अत्यंत कम घनत्व की स्थिती 

मे सारे ब्रह्मांड मे फैला हुआ रहता है।

अंग्रेज़ी में "अंतरतारकीय" को "इन्टरस्टॅलर" (interstellar) और 


"अंतरतारकीय माध्यम" को "इन्टरस्टॅलर मीडयम" (interstellar 

medium) कहते हैं।

उन्होंने आगे बताया विमान को संचालित करने के लिए गुरुत्वाकर्षण 


विरोधी (anti-gravitational) शक्ति की आवश्यकता होती है और anti-

gravitational की प्रणाली "laghima" शक्ति प्रणाली अनुरूप होती है।

"laghima" की संस्कृत में सिद्धि कहते है और इंग्लिश में levitation 


कहा जाता है। levitation की शक्ति को आप इस विडियो में देख सकते 

हैं जो की anti-gravitational होती है।

यही अंतरतारकीय माध्यम (interstellar medium) विमान के अन्दर 


levitation power को activate करता है और विमान ऊपर की ओर 

उठता है।

http://www.youtube.com/watch?v=SnLj8DMqaC8

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedd


ed&v=tW6pVFOpE6Q#!

http://www.virtualsynapses.com/2010/09/power-of-


levitation-laghima.html#.URjNix04uIA

जैसा की हम अपने ग्रंथो में देखते हैं कि भगवन, ऋषि तथा कई देवता 


वायु मार्ग द्वारा आते थे। ये वही anti-gravitational वाली levitation 

शक्ति का प्रयोग करते थे।

इसी levitation शक्ति (विमानों के लिए) का वर्णन और प्रणाली, चीन 


को उन दस्तावोजों में मिली है। जिसका अनुवाद किया जा रहा है।

levitation power कोई तंत्र विद्या द्वारा नहीं की जाती है। यह एक 


ब्रह्मांडीय शक्ति है। जिसको करने के लिए तप और कई नियमों का पालन 

करना पड़ता है।

http://www.vigyanprasar.gov.in/comcom/vimana.htm


।। जयतु संस्‍कृतम् । जयतु भारतम् ।।

May 01, 2013

Story- -Passionate Parenting

Have you heard of the Cockroach Theory for Self Development? 

At a restaurant, a cockroach suddenly flew from somewhere and sat on a lady. She started screaming out of fear. With a panic stricken face and trembling voice, she started jumping, with both her hands desperately trying to get rid of the cockroach.

Her reaction was contagious, as everyone in her group also got panicky.

The lady finally managed to push the cockroach away but ...it landed on another lady in the group.

Now, it was the turn of the other lady in the group to continue the drama.

The waiter rushed forward to their rescue.
In the relay of throwing, the cockroach next fell upon the waiter.

The waiter stood firm, composed himself and observed the behavior of the cockroach on his shirt.
When he was confident enough, he grabbed it with his fingers and threw it out of the restaurant.

Sipping my coffee and watching the amusement, the antenna of my mind picked up a few thoughts and started wondering, was the cockroach responsible for their histrionic behavior?
If so, then why was the waiter not disturbed?
He handled it near to perfection, without any chaos.

It is not the cockroach, but the inability of the ladies to handle the disturbance caused by the cockroach that disturbed the ladies.

I realized that, it is not the shouting of my father or my boss or my wife that disturbs me, but it's my inability to handle the disturbances caused by their shouting that disturbs me.

It's not the traffic jams on the road that disturbs me, but my
inability to handle the disturbance caused by the traffic jam that disturbs me.

More than the problem, it's my reaction to the problem that creates chaos in my life.

Lessons learnt from the story:
Do not react in life. Always respond.

The women reacted, whereas the waiter responded.

Reactions are always instinctive whereas responses are always well thought of, just and right to save a situation from going out of hands, to avoid cracks in relationship, to avoid taking decisions in anger, anxiety, stress or hurry.

What is your biggest take-away from this story?

-Passionate Parenting

BRAND Archetypes through lens -Indian-Brands

There has been so much already written about brand archetypes and this is certainly not one more of those articles. In fact, this is rather ...